बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

गोधरा कांड पर फैसला उचित / Decision on Godhra proceedings


-शीतांशु कुमार सहाय
गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा गोधरा कांड पर दिये गये फैसले का अर्थ इतना ही है कि विशेष एसआईटी न्यायालय द्वारा जिन ३१ लोग को दोषी माना गया वे वाकई दोषी थे। हाँ, ११ फाँसी की सजा पाये अभियुक्तों को उम्र कैद में बदलने का मतलब हुआ कि अदालत इन के गुनाह को विरलतम नहीं मानती। मृत्युदंड के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने विरलों में विरलतम का आधार तय किया हुआ है। हालाँकि २७ फरवरी, २००२ को गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस की एक बोगी एस ६ में आग लगाकर जिस तरह ५९ लोग को मरने के लिए विवश किया गया, उस से जघन्यतम अपराध कोई और नहीं हो सकता। गुजरात दंगों पर गठित नानावती आयोग ने भी माना था कि उस बोगी में स्वयं आग नहीं लगी थी, उसे साजिशन जलाया गया था जिस में केवल एक समुदाय के लोग मरे थे। देश उस कांड को कभी नहीं भूल सकता जिस की प्रतिक्रिया में गुजरात में भीषण दंगे हुए और उस में करीब १२०० लोग मारे गये। हालाँकि एक वर्ग गुजरात दंगों पर तो छाती पीटता रहा है लेकिन गोधरा पर चुप रहता है। 
पहले एसआईटी की जाँच, फिर एसआईटी न्यायालय का फैसला और अब उच्च न्यायालय के फैसले के बाद उन्हें यह तो स्वीकारना होगा कि अपराधियों के एक वर्ग ने जान-बूझकर अयोध्या से लौटते कारसेवकों को जलाकर मार डाला तथा ऐसी स्थिति नहीं छोड़ी कि वे अपनी जान बचा सकें। इन के खिलाफ आपराधिक साजिश, ज्वलनशील पदार्थ जुटाने और समुदाय विशेष के लोग पर हमला करके मार डालने का आरोप साबित हुआ है। वैसे, दोनों न्यायालयों ने ६३ आरोपितों को बरी भी किया है। इन में मौलाना उमरजी शामिल हैं, जिन्हें एसआईटी ने मुख्य साजिशकर्ता माना था। इस को इसलिए बरी किया गया; क्योंकि पुख्ता सुबूत रखने में एसआईटी विफल रही। मृत्युदंड की जगह ११ लोग को उच्च न्यायालय ने उम्रकैद दी तो इस का कारण भी यही है कि इन का साजिश में शामिल होना तो साबित हुआ लेकिन इस के मुख्य साजिशकर्ताओं की सटीक पहचान नहीं हो सकी। फैसले का एक महत्त्वपूर्ण पहलू गोधरा कांड में मारे गए लोग के परिजनों को सरकार द्वारा १०-१० लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश है। न्यायालय की टिप्पणी बिल्कुल उचित है कि राज्य सरकार एवं रेलवे प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाये रखने में विफल रहे।

उच्चतम न्यायालय का निर्णय : नाबालिग पत्नी से सेक्स बलात्कार / Supreme Court Verdict : sex with Underage Wife is Rape

-शीतांशु कुमार सहाय
उच्चतम न्यायालय ने बड़ा निर्णय देते हुए कहा कि अठारह वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना रेप हो सकता है, यदि नाबालिग पत्नी इस की शिकायत एक वर्ष में करती है उच्चतम न्यायालय ने कहा कि शारीरिक संबंधों के लिए उम्र अठारह वर्ष से कम करना असंवैधानिक हैन्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३७५ के अपवाद को अंसवैधानिक करार दिया अगर पति १५ से १८ वर्ष की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाता है तो बलात्कार माना जायेगा ऐसे मामले में एक वर्ष के भीतर यदि महिला शिकायत करती है तो पति पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज हो सकता है
इस पूरे मामले में उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार की तमाम दलीलों को ठुकरायान्यायालय ने कहा कि महज इसलिए कि बाल विवाह की कुरीती सदियों से चली आ रही है, इसे कानूनी जामा नहीं पहनाया जा सकता, ये गैरकानूनी है और अपराध हैउच्चतम न्यायालय ने कहा कि संसद ने ही कानून बनाया कि १८ से कम उम्र की बच्ची न तो कानूनन विवाह कर सकती है न ही सेक्स के लिए सहमति दे सकती हैसंसद ने ही कानून के जरिये बाल विवाह को अपराध बनाया

उच्चतम न्यायालय ने कहा, नाबालिग बच्ची का बाल विवाह हो जाय और पति जबरन सेक्स करे तो वह अपराध नहीं, यह कहना बिल्कुल बेतुका और असंवैधानिक है१८ साल से कम की उम्र में विवाह बच्ची के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। ऐसा होना संविधान के अनुछेद १४ के तहत बराबरी के हक और अनुछेद २१ के तहत जीने के अधिकार का भी हनन करता हैकोर्ट ने कहा, ये पॉस्को कानून के भी खिलाफ हैउच्चतम न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि भारतीय दण्ड संहिता (आईपीसी) की धारा ३७५ का वह प्रावधान असंवैधानिक है जिस के तहत पति को छूट है कि अगर वह १५-१८ वर्ष की पत्नी से शारीरिक संबंध बनायेगा तो वह बलात्कार नहीं कहलायेगा

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : नवम् सिद्धिदात्री / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Navam Siddhidatri

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के अन्तिम नवम् दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के नवम् स्वरूप ‘सिद्धिदात्री’ की आराधना की जाती है। सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने के कारण ही इन्हें ‘सिद्धिदात्री’ कहा गया। सभी देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और मनुष्य निरन्तर इन की उपासना में संलग्न हैं। 
चार भुजाओंवाली माँ सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। कहीं-कहीं माँ कमल पुष्प पर भी आसीन दीखती हैं। माँ की ऊपरवाली दायीं भुजा में गदा और नीचे की दायीं भुजा में चक्र है। इसी तरह ऊपरवाली बायीं भुजा में कमल और निचली बायीं भुजा में शङ्ख है। इन्हें नवम् दुर्गा भी कहते हैं। 
माँ सिद्धिदात्री समस्त सिद्धियाँ अपने भक्तों को प्रदान करती हैं। ‘ब्रह्मवैवर्त्तपुराण’ में श्रीकृष्ण के जन्मखण्ड में अठारह सिद्धियाँ बतायी गयी हैं- 
१ .अणिमा,
२ .लघिमा, 
३ .प्राप्ति,      
४ .प्राकाम्य, 
५ .महिमा,
६ .ईशित्व-वशित्व, 
७ .सर्वकामावसायिता,     
८ .सर्वज्ञत्व, 
९ दूरश्रवण,    
१० .परकायप्रवेशन, 
११ .वाक्सिद्धि,            
१२ .कल्पवृक्षत्व, 
१३ .सृष्टि,                    
१४ .संहारकरणसामर्थ्य, 
१५ .अमरत्व,    
१६ .सर्वन्यायकत्व, 
१७ .भावना और          
१८ .सिद्धि। 
एक अन्य ग्रन्थ ‘मार्कण्डेयपुराण’ में सिद्धियों की संख्या मात्र आठ बतायी गयी है- 
१ . अणिमा,
२ . महिमा, 
३ . गरिमा,
४ . लघिमा, 
५ . प्राप्ति,                
६ . प्राकाम्य, 
७ . ईशित्व और 
८  वशित्व। 
नवम् दुर्गा माता सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव को समस्त सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी। ऐसा ‘देवीपुराण’ ग्रन्थ में उल्लेख है। ग्रन्थ के अनुसार, सिद्धिदात्री की अनुकम्पा से शिव का आधा शरीर देवी का हो गया था। इस प्रकार महादेव को ‘अर्द्धनारीश्वर’ भी कहा जाने लगा। 
सभी तरह की मनोकामनाओं और सिद्धियों को प्रदान कर माँ सिद्धिदात्री अपने भक्तों की उच्चस्तरीय परीक्षा लेती हैं। वास्तव में ये दोनों कामना व सिद्धि मुक्ति के मार्ग के प्रलोभन हैं। इन्हें प्राप्त करने पर प्रायः गर्व का अनुभव होता है और अहंकार प्रकट हो जाता है। गर्व और अहंकार दोनों ही पतन के कारक हैं। एक बार पतन होने पर पुनः शिखर पर पहुँचना अत्यन्त दुष्कर हो जाता है। अतः मुक्ति के मार्ग पर चलते हुए जब सि़िद्धयाँ प्राप्त होने लगे तो उन में उलझने से अच्छा है, एकाग्रचित होकर आगे बढ़ते रहना। 
माँ सिद्धिदात्री के चरणों पर ध्यान लगाने से अहंकार का शमन होता है। 
ब्रह्माण्ड पर पूर्ण विजय का आशीर्वाद देनेवाली माता सिद्धिदात्री के चरणों में सिर झुकाते हुए हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : अष्टम् महागौरी / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Ashtam Mahagauri

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के अष्टम् दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के अष्टम् स्वरूप ‘महागौरी’ की आराधना की जाती है। एक बार पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में आदिशक्ति प्रकट हुईं। पार्वती ने शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। हजारों वर्षों की तपस्या के कारण पार्वती का शरीर पूर्णतः काला हो गया था। उन की तपस्या सफल हुई और शिव ने पत्नी के रूप में उन्हें स्वीकार कर लिया। भगवान शिव ने पवित्र गङ्गाजल से पार्वती के शरीर को धोया तो वह निर्मल होकर अत्यन्त गौर (गोरा) हो गया। अत्यन्त कान्तियुक्त तथा सर्वाधिक गौरवर्णा माँ का यह स्वरूप ‘महागौरी’ कहलाया। इन्हें अष्टम् दुर्गा भी कहा जाता है।
माँ महागौरी की गौरता (गोरापन) की उपमा शङ्ख, चन्द्र और कुन्द के पुष्प से की गयी है। इन के समस्त आभूषण भी श्वेत हैं और वस्त्र भी श्वेत ही धारण करती हैं। अतः इन्हंे ‘श्वेताम्बरा’ भी कहा जाता है। 
अष्टम् दुर्गा महागौरी वृषभ (साँढ़) पर सवार रहती हैं। माता की चार भुजाएँ हैं। ऊपरी दाहिनी भुजा को अभयमुद्रा में रखती हैं और भक्तों को भयमुक्त बनाती हैं। निचली दायीं भुजा में त्रिशूल धारण करती हैं। माँ की बायीं तरफ की ऊपरी भुजा में डमरू और निचली भुजा वरमुद्रा में है। चतुर्भुजा श्वेताम्बरा माता महागौरी का विग्रह अत्यन्त सौम्य और शान्त है। 
महागौरी के रूप में माँ ने कठिन परिश्रम कर शिव को प्राप्त किया। अतः माँ महागौरी परिश्रम कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। परिश्रम के दौरान कष्ट होते ही हैं। इन कष्टों को माँ पार्वती की तरह सहन करने से महागौरी की तरह लक्ष्य की प्राप्ति होती है। लक्ष्य प्राप्त हो जाने पर समस्त कष्ट प्रेरणास्वरूप प्रतीत होने लगते हैं और तब सुख की प्राप्ति होती है। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए महागौरी देवी की उपासना अवश्य करनी चाहिये। 
देवी महागौरी की उपासना करने से समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। भौतिक और आध्यात्मिक जीवन सुखमय व्यतीत होता है। असम्भव को भी सम्भव करनेवाला माता दुर्गा का अष्टम् स्वरूप बहुविध कल्याणकारी है। माता पूर्वजन्म के पापों को नष्ट कर भविष्य को मोक्षगामी बना देती हैं। 
दुःख और दरिद्रता को समाप्त कर अक्षय पुण्य का अधिकार प्रदान करनेवाली माता महागौरी के चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

बुधवार, 27 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : सप्तम् कालरात्रि / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Saptam Kalratri

-शीतांशु कुमार सहाय 
नवरात्र के सप्तम दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के सप्तम् स्वरूप ‘कालरात्रि’ की आराधना की जाती है। घनी काली रात्रि की तरह काला वर्णवाली माता ही ‘कालरात्रि’ कहलाती हैं। काल भी इन्हीं के वश में है। इन्हें सप्तम् दुर्गा भी कहते हैं। 
माँ कालरात्रि की केश-राशि बिखरी हुई है। गले में विद्युत की तरह चमकीली माला है। इस रूप में माता के तीन नेत्र हैं। अतः इन्हें ‘त्रिनेत्रा’ भी कहते हैं। माता के तीनों नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं। इन नेत्रों से विद्युत के समान चमकवाली किरणें अनवरत् निकलती रहती हैं। 
गर्दभ (गदहा) पर सवार माँ कालरात्रि का स्वरूप अत्यन्त भयानक है। बिखरे बाल, गोल-गोल अत्यन्त चमकीले नेत्र और व्याघ्रचर्म पहनी हुई माँ का यह विकराल रूप देखकर असुर काँप उठते हैं। असुरों और दुर्गुणों का नाश करने के लिए माता ने बायीं तरफ के ऊपरवाले हाथ में लोहे का काँटा व नीच के हाथ में खड्ग अर्थात् कटार धारण किया है। 
असुरों के लिए भयानक होने पर भी माँ कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल ही प्रदान करती हैं। अतः इन्हें ‘शुभङ्करी’ भी कहा जाता है। भक्तों को वरदान देने के लिए माता शुभङ्करी ने ऊपर के दायें हाथ को वरमुद्रा मंे रखा है। निचले दायें हाथ से माँ कालरात्रि भक्तों को अभय प्रदान कर रही हैं; क्योंकि यह हाथ अभयमुद्रा में है। इस तरह माँ सदैव स्नेह बरसाती रहती हैं। उन के भयङ्कर रूप से न घबराते हुए उन से कृपा की याचना करनी चाहिये। 
सप्तम् दुर्गा की पूजार्चना के दौरान योगीजन सहस्रार चक्र में ध्यान लगाते हैं। सहस्रार चक्र एक हजार (सहस्र) पंखुड़ियोंवाला कमल है। इन पंखुड़ियों पर कई मन्त्र अंकित हैं। इस चक्र के मध्य में अत्यन्त उज्ज्वल शिवलिंग है जो पवित्र और उच्चतम चेतना का प्रतीक है। सहस्रार चक्र के इष्टदेव शिव और देवी शक्ति हैं जिन का समस्त शक्तियों तथा तत्त्वों पर अधिकार है। इस चक्र में समस्त शक्तियाँ निहित हैं जिन का सम्बन्ध पचास बीजमन्त्रों की शक्ति के बीस गुणक (50 गुणा 20 बराबर 1000) से है। यहीं शिव-शक्ति का मिलन होता है, आत्मा का परमात्मा में विलय होता है। इस चक्र में ध्यान लगवाकर माँ कालरात्रि सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त कर देती हैं और अपने चरणांे में स्थान दे देती हैं। 
दुष्टों का विनाश करनेवाली माँ कालरात्रि की उपासना करनेवाला बाधाओं में नहीं फँसता, वह निर्भय हो जाता है। कालरात्रि देवी के आराधक को आग, जल, जन्तु, शत्रु और अन्धकार का भय नहीं सताता। ऐसे साधक को ग्रह-बाधा से भी मुक्ति मिल जाती है। मन, कर्म, वचन और शारीरिक शुद्धता-पवित्रता से इन की आराधना करनी चाहिये। 
भय से मुक्ति का आशीर्वाद देनेवाली माँ कालरात्रि के चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी।।

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : षष्टम् कात्यायनी / Navaratr : Nine Forms of Maa Durga : Shashtam Katyayani

-शीतांशु कुमार सहाय 
नवरात्र के षष्टम् दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के षष्टम् स्वरूप ‘कात्यायनी’ की आराधना की जाती है। महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में प्रकट होने के कारण इन्हें ‘कात्यायनी’ कहा गया। भक्तों को वरदान के साथ अभय देनेवाली माँ कात्यायनी सिंह पर सवार रहती हैं। इन्हें षष्टम् दुर्गा भी कहते हैं। 
प्राचीन काल में कत ऋषि हुए थे। उन के पुत्र भी ऋषि हुए जिन का नाम कात्य था। कात्य के गोत्र में ही महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए। आदिशक्ति के उपासक थे कात्यायन। कात्यायन ने इस उद्देश्य से तपस्या की कि आदिशक्ति उन की पुत्री के रूप में जन्म लें। माता आदिशक्ति ने उन की यह प्रार्थना स्वीकार की। यों महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में अवतरित होने के कारण इन्हें ‘कात्यायनी’ कहा गया। 
कात्यायन ऋषि की पुत्री के रूप में माँ कात्यायनी का अवतरण आश्विन कृष्णपक्ष चतुर्दशी को हुआ। इन्होंने आश्विन शुक्ल पक्ष सप्तमी, अष्टमी व नवमी तिथि को कात्यायन ऋषि की त्रिदिवसीय पूजा स्वीकार की और दशमी को भयंकर महिषासुर का वध किया। छठी दुर्गा माता कात्यायनी के प्रथम पुजारी ऋषि कात्यायन ही थे। 
नवरात्र के छठे दिन माँ कात्यायनी की आराधना के लिए योगी आज्ञा चक्र में ध्यान लगाते हैं। यह चक्र मेरुदण्ड के शीर्ष पर भू्रमध्य (भौंहों) के बीच के सीध में स्थित है। आज्ञा चक्र हल्के भूरे या श्वेत रंग का दो पंखुड़ियोंवाला कमल है। इन पंखुड़ियों पर हं और क्षं मन्त्र अंकित हैं। इस के मध्य में बीज मन्त्र ऊँ है। आज्ञा चक्र के इष्टदेव परमशिव हैं और हाकिनी देवी हैं जिन का मन पर अधिकार है। 
आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाकर माँ कात्यायनी के चरणों में सर्वस्व अर्पित कर देना चाहिये। ऐसा करने से ही माँ षष्टम् दुर्गा दर्शन देती हैं और भक्त को परमपद की प्राप्ति होती है। 
चारों पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्रदान करनेवाली माँ कात्यायनी की आराधना करके ही ब्रजवासी गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पतिरूप में प्राप्त किया था। कालिन्दी (यमुना) नदी के तट पर गोपियों ने उन की उपासना की थी, इसलिए माता कात्यायनी को ब्रजमण्डल की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। ब्रजवासी प्राचीन काल से उन की उपासना करते आ रहे हैं। 
सिंह पर सवार माँ कात्यायनी की चार भुजाएँ हैं। दाहिनी तरफ की ऊपरी भुजा अभयमुद्रा में व निचली भुजा वरमुद्रा में हैं। ऊपरवाली बायीं भुजा में तलवार और नीचेवाली भुजा में कमल सुशोभित हैं। स्वर्ण के समान चमकीले और भास्वर वर्णवाली माता भक्तों को वर भी देती हैं और भयमुक्त भी बनाती हैं।
जन्म-जन्मान्तर के समस्त कष्टों को समाप्त करनेवाली माँ कात्यायनी के चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानवघातिनी।।

सोमवार, 25 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : पंचम् स्कन्दमाता / Navaratra : Nine Forms of Mother Durga : Fifth Skandamata

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के पंचम दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के पंचम स्वरूप ‘स्कन्दमाता’ की आराधना की जाती है। भगवान कार्त्तिकेय का एक अन्य नाम ‘स्कन्द’ भी है। स्कन्द को उत्पन्न करने के कारण माँ दुर्गा के पाँचवें रूप को ‘स्कन्दमाता’ कहा गया। इन्हें पंचम दुर्गा भी कहा जाता है। 
इस स्वरूप में माँ सिंह पर बैठी हैं। उन की गोद में भगवान स्कन्द अपने बालरूप में स्थित हैं। चार भुजाओंवाली देवी स्कन्दमाता खिले कमल के समान सदैव प्रसन्नता का प्रसाद बाँटती हैं। माता अपनी ऊपरवाली दायीं भुजा से गोद में बैठे पुत्र स्कन्द को पकड़ी हुई हैं। दाहिनी तरफ की नीचेवाली भुजा जो ऊपर की ओर मुड़ी हुई है, उस में कमल है। इसी तरह बायीं तरफ की ऊपरी भुजा वरमुद्रा में है। निचली बायीं भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उस में कमल है।
दो हाथों में कमल धारण करनेवाली माता सदैव भक्तों को कमल की तरह आनन्द प्रदान करने को तत्पर हैं। वह कमल के ही आसन पर विराजमान हैं, अतः इन्हें ‘कमलासना’ देवी अथवा ‘पद्मासना’ देवी भी कहते हैं। इन के शरीर का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है।
नवरात्र के पाँचवें दिन योगीजन आदिशक्ति का ध्यान विशुद्धि चक्र में लगाते हैं। गर्दन के निकट यह चक्र स्थित है। सिद्ध योगी खेचरी मुद्रा से यहीं अमृत का पान करते हैं। शुद्धिकरण का प्रतीक है विशुद्धि चक्र जो सोलह पंखुड़ियोंवाला कमल है। इस कमल का रंग जामुनी मिश्रित धुएँ के रंग का है। विशुद्धि चक्र के सोलह पंखुड़ियों पर क्रमशः अं, आं, इं, ईं, उं, ऊं, ऋं, ऋंृ, लृं, लृं, एं, ऐं, ओं, औं, अं, अंः मंत्र अंकित हैं। इस कमल के मध्य श्वेत वृत्त है। विशुद्धि चक्र का बीजमन्त्र हं है और वाहन श्वेत गज (उजला हाथी) है जो आकाश का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव अर्द्धनारीश्वर तथा देवी साकिनी हैं जिन का अधिकार अस्थियों पर है।
विशुद्धि चक्र पर ध्यान केन्द्रित कर स्कन्दमाता की आराधना करनी चाहिये। देवी स्कन्दमाता अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। वह भक्त के दोषों को क्रमशः दूर करती जाती हैं और अन्ततः शुद्ध कर विशुद्धि चक्र की सिद्धि प्रदान करती हैं।
सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण माँ स्कन्दमाता की आराधना से सूर्य के समान अद्भुत तेज व कान्ति की प्राप्ति होती है। इन की पूजा करने से स्वतः ही बालरूप भगवान कार्त्तिकेय अर्थात् स्कन्द की भी पूजा हो जाती है। अतः स्कन्दमाता की पूजार्चना अवश्य करनी चाहिये।
भक्तों के आभामण्डल को सुदृढ़ और अभेद्य बनानेवाली माँ स्कन्दमाता को हाथ जोड़कर चरणों में प्रणाम करें-
सिंहासन नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।

रविवार, 24 सितंबर 2017

नवरात्र : माता दुर्गा के नौ रूप : चतुर्थ कूष्माण्डा / Navaratra : Nine Forms of Maa Durga : Fourth Kushmanda

-शीतांशु कुमार सहाय
नवरात्र के चतुर्थ दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप कूष्माण्डा की आराधना की जाती है। जब आदिशक्ति ने अपनी मन्द मुस्कान से अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया तब उन्हंे ‘कूष्माण्डा’ कहा गया। इसी रूप में माता समस्त जड़-चेतन की पूर्वज हैं, सब का आदि हैं मगर उन का आदि कोई नहीं। भयानक अन्धकार के बीच आदिशक्ति कूष्माण्डा ने प्रसन्न मुद्रा में अपनी मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना की और सृष्टि क्रम को आरम्भ किया। 
माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप के नामकरण का एक अन्य कारण है। संस्कृत शब्द ‘कूष्माण्डा’ का हिन्दी अर्थ कुम्हड़ा या कोहरा है। यह एक प्रकार की सब्जी है जिस की बलि माता को अत्यन्त प्रिय है। अतः इन्हें कूष्माण्डा कहा गया। इन्हंे चतुर्थ दुर्गा भी कहते हैं। 
आठ भुजाओंवाली माँ कूष्माण्डा सिंह पर सवार हैं। इन की सात भुजाओं में क्रमशः कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल, अमृत से भरा कलश, चक्र व गदा हैं। माता ने इस रूप में आठवीं भुजा में समस्त निधियों और सिद्धियों को देनेवाला जपमाला धारण किया है।
योगीजन माता के इस स्वरूप का ध्यान अनाहत चक्र पर करते हैं। यह चक्र बारह पंखुड़ियोंवाला नीला कमल है। इन पंखुड़ियों पर क्रमशः कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ´ं, टं, ठं मन्त्र अंकित हैं। मध्य में षट्कोण आकृति है जो दो त्रिभुजों के मिलने से बनी है। अनाहत चक्र का बीजमन्त्र यं है और वाहन शीघ्रगामी काला हिरन है जो वायु का प्रतीक है। इस चक्र के इष्टदेव ईशा हैं और देवी काकिनी हैं जो तैलीय तत्त्व पर अधिकार रखती हैं। 
नवरात्र के चौथे दिन आराधक को अनाहत चक्र में ध्यान लगाना चाहिये। योगीजन ध्यान के माध्यम से माँ कूष्माण्डा का दर्शन-पूजन अनाहत चक्र में ही करते हैं। 
माता अपने उपासकों के समस्त रोग व शोक हर लेती हैं और आयुष्य, बल, यश और आरोग्य का वरदान देती हैं। कूष्माण्डा देवी की शरण में पूर्ण निष्ठाभाव से आनेवाले भक्तों का कल्याण सुनिश्चित हो जाता है। ऐसे साधक सुगमतापूर्वक परमधाम को प्राप्त कर लेते हैं। अतः माँ कूष्माण्डा की भक्ति अवश्य करनी चाहिये। 
माता दुर्गा अपने चौथे रूप में सूर्यमण्डल या सूर्यलोक में निवास करती हैं। माता कूष्माण्डा के शरीर कीे कान्ति और प्रभा से ही ब्रह्माण्ड के सभी सूर्य (प्रकाश उत्पन्न करनेवाले तारे) चमक रहे हैं। असंख्य सूर्यों के तेज से भी अधिक उज्ज्वल स्वरूपा माता अपनी स्थायी मुस्कान से भक्तों को प्रसन्न व आनन्दित करती रहती हैं। समस्त प्रकाश पुंजों में देवी कूष्माण्डा का ही तेज समाहित है। इन्हीं का तेज सभी प्राणियों व निर्जीवों में प्रसारित हो रहा है।
कष्टनिवारिणी माता कूष्माण्डा को हाथ जोड़कर चरणों में प्रणाम करें-
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।

शनिवार, 23 सितंबर 2017

नवरात्र : माँ दुर्गा के नौ रूप : तृतीय चन्द्रघण्टा / Navaratra : Nine Forms of Mother Durga : Third Chandraghanta

-शीतांशु कुमार सहाय 
नवरात्र के तीसरे दिवस को आदिशक्ति दुर्गा के तृतीय स्वरूप चन्द्रघण्टा की आराधना की जाती है। इन के मस्तक में घण्टे के आकारवाला अर्द्धचन्द्र है। अतः इन्हें ‘चन्द्रघण्टा’ कहा जाता है। स्वर्ण के समान आभावाला यह स्वरूप परमशान्ति देनेवाला है। ये शीघ्र ही भक्तों का कल्याण करती हैं। इन्हें तृतीय दुर्गा भी कहते हैं।
माँ चन्द्रघण्टा दस भुजाओंवाली हैं जो भक्तों के कल्याण के लिए कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को धारण करती हैं। माँ ने इस रूप में तीर, धनुष, तलवार, गदा, त्रिशूल, कमल, कमण्डलु, जप माला, आशीर्वाद मुद्रा व ज्ञान मुद्रा धारण किया है। इस रूप में माँ सदा असुरों से युद्ध के लिए तैयार हैं। सिंह की सवारी करनेवाली चन्द्रघण्टा देवी के घण्टे की विचित्र ध्वनि से असुर सदा भयभीत रहते हैं। अतः माता दुर्गा के इस तीसरे स्वरूप की पूजा-उपासना करनेवाले भक्तों को दुर्गुण, व्याधि व विविध प्रकार के कष्टों के असुर तंग नहीं करते।
माता चन्द्रघण्टा की असीम कृपा से भक्त प्रसन्न रहते हैं, पाप मिट जाते हैं और बाधाएँ प्रबल नहीं हो पातीं। भक्त सिंह की तरह पराक्रमी व निर्भय हो जाते हैं और उन में सौम्यता व विनम्रता का विकास होता है। माँ दुर्गा के इस तीसरे स्वरूप का उपासक कान्तिवान और ऊर्जावान हो जाता है। उस के स्वर में अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है और मुखमण्डल पर प्रसन्नता छायी रहती है। ऐसे साधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। इस कारण उस के सम्पर्क में आनेवाले लोग को भी अत्यन्त लाभ होता है।
दुर्गा के तीसरे रूप चन्द्रघण्टा को जब भी कोई भक्त पुकारता है, उन्हें स्मरण करता है, उन की स्तुति करता है या उन की शरण में जाता है तो माता का घण्टा प्रकम्पित हो उठता है। यों भक्त शीघ्र ही कष्टमुक्त हो जाता है।
योग के माध्यम से माँ चन्द्रघण्टा को मणिपुर चक्र में स्थित मानकर आराधना करनी चाहिये। मणिपुर चक्र दस पंखुड़ियोंवाला पीला कमल है जिस पर डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं और फं मन्त्र अंकित हैं। इस के मध्य में लाल रंग का उल्टा त्रिभुज है। इस चक्र का बीजमन्त्र रं और वाहन चमकदार भेड़ है जो आघात पहुँचानेवाले चौपाये पशु का प्रतीक है। मणिपुर चक्र के इष्टदेव रुद्र और देवी लाकिनी हैं जिन का अधिकार मांसपेशियों पर है।
नवरात्र के तीसरे दिन भक्त को मणिपुर चक्र पर ही ध्यान लगाना चाहिये। ऐसा करने से भक्त को कई दिव्य व अलौकिक अनुभूतियाँ होती हैं। दिव्य सुगन्ध, दिव्य दर्शन, दिव्य संगीत व दिव्य ज्ञान का लाभ भक्तों को प्राप्त होता है। ध्यान के दौरान प्राप्त होनेवाले इन लाभों पर अहंकार में वृद्धि नहीं हो, इस के लिए भक्त को निरन्तर सावधान रहना चाहिये। भव-बाधा को समाप्त कर कल्याण का मार्ग प्रशस्त करनेवाली ममतामयी माता चन्द्रघण्टा का हाथ जोड़कर नमन करें-
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।