बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

भृगु संहिता

भारतवर्ष में भृगु संहिता की कई हस्तलिखित प्रतियां पंडितों के पास उपलब्ध हैं, किन्तु वे अपूर्ण हैं। भृगु संहिता में मनुष्यों की जितनी भी संभावित जन्म पत्रियां हो सकती हैं, उनमें प्रत्येक जन्मपत्री के तीन जन्म का विस्तारपूर्वक वर्णन है, हर काल में जन्‍म लेने वालों का भविष्‍य लिखा हुआ है। इस महान् ग्रंथ की सत्यता निर्विवाद है। श्री केएम मुंशी जैसे बड़े-बड़े विद्वान इस ग्रंथ का निरीक्षण-परीक्षण कर चुके हैं एवं इसको कसौटी पर खरा पाया। आज भी दुनियां के विद्वान इस अनोखे ग्रंथ को देख दातों तले उगली दबाते हैं। ज्‍योतिष में थोडी भी रूचि रखनेवालों ने भृगुसंहिता का नाम अवश्‍य सुना होगा। जैसा कि नाम से ही स्‍पष्‍ट है , यह ज्‍योतिष के क्षेत्र में महर्षि भृगु द्वारा रचित एक ऐसी कालजयी पुस्‍तक है , जिसमें हर काल में जन्‍म लेने वालों का भविष्‍य लिखा हुआ है। जिनलोगों ने जन्‍म भी नहीं लिया है, उसके बारे में भी भविष्‍यवाणी कर पाना भला कैसे संभव है? इस पुस्‍तक की मूल पांडुलिपि के बारे में सही बता पाना मुश्किल है, पर भृगु रचित विशाल ग्रंथ `भृगु संहिता´ आज भी उपलब्ध है, जिसकी मूल प्रति नेपाल के पुस्तकालय में ताम्रपत्र पर सुरक्षित है। भृगुसंहिता के अनुसार हमें प्रभावित करने वाले 7 आकाशीय पिंडों और दो महत्‍वपूर्ण बिन्दुओं ( राहू और केतु ) को मिलाकर 9 ग्रह माने गए। इन 9 ग्रहों की 12 राशियों में स्थिति 9 गुणा 12 = 108 तरह के फलादेश दे सकती है। यदि लग्‍न के आधार पर विभिन्‍न भावों को देखते हुए गणना की जाए, तो 12 लग्‍नवालों के लिए पुन: 108 गुणा 12 = 1296 प्रकार के फलादेश होंगे। इन फलादेशों को 1296 अनुच्‍छेदों में लिखकर रखा जाए, तो किसी भी बच्‍चे के जन्‍म के बाद उस बच्‍चे की जन्‍मकुंडली में 9 ग्रहों की स्थिति को देखते हुए भृगुसंहिता में से 9 अनुच्‍छेदो को चुनकर भविष्‍यवाणी किया जा सकता है। भृगु संहिता´ आज भी उपलब्ध है, मूल प्रति नेपाल के पुस्तकालय में ताम्रपत्र पर सुरक्षित है। इस विशाल ग्रंथ को कई बैलगाड़ियों पर लाद कर ले जाया गया था। Please read this Article and send to your friends.

महर्षि भृगु

भृगु शब्द संस्कृत के ``भ्राज्´´ धातु से बना है। भ्राज् का अर्थ है ``प्रकाशित होना´´ अत: भृगु का अर्थ है ``प्रकाशमान´´ भृगु का अर्थ ``पापों को नष्ट करने वाले´´ या ``अग्नि´´ के जलने के रूप में भी किया गया है। भृगु के अवतरण का समय सृष्टि की रचना के प्रारम्भ से ही जुड़ा हुआ है। जब आदि शक्ति परब्रह्म ने सृष्टि रचने का विचार किया, तब उन्होंने सर्वप्रथम मानस पुत्रों को उत्पन्न किया। मन से उत्पन्न होने के कारण इनका नाम `मनु´ पड़ा और ये सभी आदि पुरुष माने गये। भृगु भी इन्हीं मानस पुत्रों में से एक हैं। कुछ विद्वान इन्हें वरुण का पुत्र भी मानते हैं। कुछ विद्वानों द्वारा इन्हें अग्नि से उत्पन्न बताया गया है, तो कुछ ने इन्हें ब्रह्मा की त्वचा एवं हृदय से उत्पन्न बताया है। शास्त्रों में इन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र ही माना जाता है। महर्षि भृगु ने ब्रह्मविद्या वरुण से प्राप्त की। वरुण के उपदेश से इन्होंने कठोर तप किया और ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया। ये ज्योतिष, आयुर्वेद, शिल्पविद्या, विज्ञान, दर्शनशास्त्र आदि के उच्च कोटि के ज्ञाता थे। भृगुरचित विशाल ग्रन्थ हैं `भृगु संहिता। महर्षि भृगु के वंशज `भार्गव´ कहलाते हैं।
भृगु महान् ज्योतिष, त्रिकालदर्शी तथा अपनी ज्योतिष विद्या के लिए थे। ज्योतिष की जातक पद्धति भृगुक्त बतायी जाती है। भृगु रचित विशाल ग्रंथ `भृगु संहिता´ आज भी उपलब्ध है जिसकी मूल प्रति नेपाल के पुस्तकालय में ताम्रपत्र पर सुरक्षित रखी है। इस विशाल कार्य ग्रंथ को कई बैलगाड़ियों पर लाद कर ले जाया गया था। भारतवर्ष में भी कई हस्तलिखित प्रतियां पंडितों के पास उपलब्ध हैं किन्तु वे अपूर्ण हैं। इसमें मनुष्यों की जितनी भी संभावित जन्म पत्रिया हो सकती हैं, उनमें प्रत्येक जन्मपत्री के तीन जन्म का विस्तारपूर्वक वर्णन है। इस महान् ग्रंथ की सत्यता निर्विवाद मान्य है। श्री केएम मुंशी जैसे बड़े-बड़े विद्वान इस ग्रंथ का निरीक्षण एवं परीक्षण कर चुके हैं एवं इसको कसौटी पर खरा पाया। आज भी दुनियां के विद्वान इस अनोखे ग्रंथ को देख दातों तले उगली दबाते हैं।
महर्षि भृगु अग्नि के उत्पादक थे, समस्त संसार उनका ऋणी है। वे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने पृथ्वी पर अग्नि को प्रदीप्त किया था। ऋग्वेद में वर्णन है कि उन्होंने मातरिश्वन् से अग्नि ली और उसको पृथ्वी पर लाये। किन्तु आज के संदर्भ में इसका तात्पर्य यह भी निकलता है और समीचीन भी हो कि भृगु एक महान वैज्ञानिक थे जिन्होंने सर्वप्रथम पृथ्वी पर अग्नि को उत्पादित किया था। आज भी पारसी लोग महिर्ष भृगु की अथवन् के रूप में पूजा करते हैं।
भृगु का उल्लेख संजीवनी विद्या प्रवर्तक के रूप में भी है। उन्होंने संजीवनी बूटी खोजी थी और मृत प्राणी को जिन्दा करने का उन्होंने ही उपाय खोजा था। परम्परागत यह विद्या उनके पुत्र शुक्राचार्य को प्राप्त हुई। इस संबंध में महाभारत एवं पुराण में कथा उपलब्ध होती है। पद्यपुराण के अनुसार भृगु ने लगभग 1000 वर्ष तक हिमालय के निकुंज में होम का धुंआ पीकर कठोर तपस्या द्वारा भगवान शंकर की आराधना की। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर यह विद्या इनको प्रदान की।
भृगु का उल्लेख महान् धर्मवेत्ता के रूप में भी है। मानव धर्म निरुपण का प्रमुख ग्रंथ `मनृस्मृति´ महर्षि भृगु द्वारा ही कही गई थी। अत: उसे `भृगु स्मृति´ भी कहते हैं। इस संबंध में मनुस्मृति का श्लोक द्रष्टव्य है-- इति मानव धर्मशास्त्र भृगु प्रोक्तंपठन् द्विज:
महर्षि भृगु का आयुर्वेद से घनिष्ठ संबंध था। अथर्ववेद एवं आयुर्वेद संबंधी प्राचीन ग्रंथों में इनको प्रामाणिक आचार्य की भाति उल्लिखित किया गया है। आयुर्वेद में प्राकृतिक चिकित्सा का भी महत्व है। भृगु ऋषि ने सूर्य की किरणों द्वारा रोगों के शमन की चर्चा की है। वर्षा जल सूर्य की किरणों से प्रेरित होकर आता है। वह शल्य के समान पीड़ा देने वाले रोगों को दूर करने में समर्थ है।
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भृगु की दो पत्नी बताई गई हैं। पहली पत्नी असुरों के पुलोम वंश की कन्या पौलोमा थी। इसकी सगाई पहले अपने ही वंश के एक पुरुष से, जिसका नाम महाभारत शान्तिपर्व अध्याय 13 के अनुसार दंस था, हुई थी। परन्तु उसके पिता ने यह संबंध छोड़कर उसका विवाह भृगु से कर दिया। जब च्यवन उसके गर्भ में थे, तब भृगु की अनुपस्थिति में, एक दिन अवसर पाकर दंस (पुलोमासर) उसको हर ले गया। शोक और दुख के कारण उसका गर्भपात हो गया और शिशु पृथ्वी पर गिर पड़ा, इस कारण यह च्यवन (गिरा हुआ) कहलाया। कहा गया है कि सूर्य के समान दिव्य शिशु को गर्भ से च्युत देख कर असुर ने पुलोमा को छोड़ दिया और स्वयं जलकर भस्म हो गया। तत्पश्चात् पुलोमा रोती हुई, शिशु को गोद में उठाकर आश्रम लौटी। तब उसके अश्रुओं से एक नदी बह चली, जिसका नाम ब्रह्मा ने `वधूसरा´ रखा। ऋषि च्यवन ने अपना आश्रम इसी के तट पर बनाया था। पौलोमा की और संतान विख्यात ऋषि शुक्र हुए। यह असुरों के गुरु थे। महाभारत तथा पुराणों में उनको भृगु का पुत्र बताया गया है, परन्तु ऋग्वेद से ज्ञात होता है वह भृगु के पौत्र और कवि ऋषि के सुपुत्र थे। शुक्र ऋषि के दो विवाह हुए थे। पहली स्त्री इन्द्र की पुत्री जयन्ती थी, जिसके गर्भ से देवयानी ने जन्म लिया था। देवयानी का विवाह चन्द्रवंशीय क्षत्रिय राजा ययाति से हुआ। उसके पुत्र यदु और मर्क तुर्वसु थे। शुक्र ऋषि की दूसरी स्त्री का गोधा थी, जिसके गर्भ से त्वष्ट्र, वतुर्ण शंड और मक उत्पन्न हुए थे। पौलोमा के गर्भ से पांच और पुत्र बताये गये हैं। भृगु की दूसरी पत्नी थी यज्ञ और दक्षिण की पुत्री ख्याति। उसके दो पुत्र हुए धाता और विधाता और एक पुत्री लक्ष्मी। धाता के आयती नाम की स्त्री से प्राण, प्राण के धोतिमान और धोतिमान के पुत्र वर्तमान हुए। विधाता के नीति नाम की स्त्री से मृकंड, मृंकंड के मार्कण्डेय और उनसे वेदश्री नाम के पुत्र हुए। इनसे भृगु वंश बढ़ा। भृगु के सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है-- `महिर्षणाम भृगुरहम्´

बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

यम

"मार्कण्डेय पुराण" दक्षिण दिशा के दिक्पाल और मृत्यु के देवता को यम कहता है। वेदों में "यम" और "यमी" दोनों देवता मंत्रद्रष्टा ऋषि माने गए हैं। वेदों के "यम" का मृत्यु से कोई संबंध नहीं था। पर वे पितरों के अधिपति माने गए है। पुराणों में यमराज के बारे में वर्णन मिलता है- इनका रंग हरा है। यमराज लाल वस्त्र पहनते हैं। यम का वाहन भैंसा है। यमराज के मुंशी "चित्रगुप्त" हैं। ये जीव के पाप-पुण्य का हिसाब रखते हैं। चित्रगुप्त की बही "अग्रसन्धानी" में प्रत्येक जीव के पाप-पुण्य का हिसाब है। इनकी नगरी को "यमपुरी", और राजमहल को "कालीत्री" कहते हैं। यमराज के सिंहासन का नाम "विचार-भू" है। महाचण्ड और कालपुरूष इनके शरीर रक्षक और यमदूत इनके अनुचर है। वैध्यत यमराज का द्वारपाल है। चार आंखें तथा चौड़े नथुने वाले दो प्रचण्ड कुत्ते यम द्वार के संरक्षक हैं।
स्मृतियों के अनुसार 14 यम माने गए हैं- यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त। "धर्मशास्त्र संग्रह" के अनुसार 14 यमों को उनके नाम से 3-3 अंजलि जल तर्पण में देते हैं। इनका संसार "यमलोक" के नाम से जाना जाता है। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा के गर्भ से उत्पन्न सूर्य के पुत्र को भी यम कहा गया है। एक मान्यता में यम की बहन "यमी" को यमुना नदी कहा गया है। यम और यमी यमज यानी जुड़वां थे। यम के लिए पितृपति, कृतांत, शमन, काल, दंडधर, श्राद्धदेव, धर्म, जीवितेश, महिषध्वज, महिषवाहन, शीर्णपाद, हरि और कर्मकर विशेषणों का प्रयोग होता है। अंग्रेजी में यम को प्लूटो कहते हैं। "योग सूत्र" में साधना के आठ अंगों यानी अष्टांग योग में यम का स्थान पहला है। संयम, आत्मनियंत्रण और दमन के अर्थ में यम शब्द का प्रयोग हुआ है।
यम
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में धर्मराज के रूप में देवत्व और यमराज के रूप में पितृत्व के दोनों अंश विद्यमान है। इसलिए इन्हें तर्पण में काले तिल और सफेद तिल अर्पित किए जाते हैं। भाई दूज को यम द्वितीया कहते हैं। "स्कन्दपुराण" में कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी को दीये जलाकर यम को प्रसन्न किया जाता है। एक धर्मशास्त्र का नाम भी यम है।

चित्रगुप्त

जो व्यक्ति के जीवन को नियमित करती है, अच्छे-बुरे कर्मो का फल प्रदान करती है, न्याय करती है। उसी दिव्य देव शक्ति का नाम चित्रगुप्त है।" चित्रगुप्तजी कायस्थों के जनक हैं। एक बार जब ब्रह्मा ध्यानस्थ थे, उनके अंग से अनेक वर्णों से चित्रित लेखनी और मसि पात्र लिए एक पुरुष उत्पन्न हुआ, इन्हीं का नाम चित्रगुप्त था। ब्रह्मा की काया से उत्पन्न होने के कारण इन्हें कायस्थ भी कहते हैं। चित्रगुप्त ने ब्रह्मा से अपने कार्य के सम्बन्ध में पूछा। ब्रह्मा पुन: ध्यानस्थ हो गये। योग निद्रा के अवसान के उपरान्त ब्रह्मा ने चित्रगुप्त से कहा कि यमलोक में जाकर मनुष्यों के पाप और पुण्य का लेखा तैयार करो। उसी समय से ये यमलोक में पाप और पुण्य की गणना करते हैं। अम्बष्ट, माथुर तथा गौड़ आदि इनके बारह पुत्र हुए। गरुड़ पुराण में यमलोक के निकट ही चित्रलोक की भी कल्पना की गयी है। कार्तिक मास की शुक्ल द्वितीया को इनकी पूजा होती है। इसीलिए इसे यमद्वितीया भी कहा जाता है। शापग्रस्त राजा सुदास इसी तिथि को इनकी पूजा करके स्वर्ग के भागी हुए। भीष्म पितामह ने भी इनकी पूजा करके इच्छा मृत्यु का वर प्राप्त किया था। चित्रगुप्त के पिता मित्त नामक कायस्थ थे। इनकी बहन का नाम चित्रा था, पिता के देहावसान के उपरान्त प्रभास क्षेत्र में जाकर सूर्य की तपस्या की, जिसके फल से इन्हें ज्ञानोपलब्धि हुई। यमराज ने इन्हें न्यायालय में लेखक का पद दिया। उसी समय से ये चित्रगुप्त नाम से प्रसिद्ध हुए। यमराज ने इन्हें धर्म का रहस्य समझाया। चित्रलेखा की सहायता से चित्रगुप्त ने अपने भवन की इतनी अधिक सज्जा की कि देवशिल्पी विश्वकर्मा भी स्पर्धा करने लगे। वर्तमान समय में कायस्थ जाति के लोग चित्रगुप्त के ही वंशज कहे जाते हैं।
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