बुधवार, 24 अप्रैल 2013

अध्यात्म ही परम ज्ञान : स्वामी विवेकानन्द

अध्यात्म ही मनुष्य का परम ज्ञान स्वामी विवेकानन्द
 शिक्षा का अर्थ है, उस पूर्णता की अभिव्यक्ति, जो सब मनुष्यों में पहले से ही विद्यमान है।जिस प्रकार बहुत सी नदियां, जिनका उद्रम विभिन्न पर्वतों से होता है, टेढ़ी या सीधी बहकर अंत में समुद्र में ही गिरती हैं, उसी प्रकार ये सभी विभिन्न संप्रदाय तथा धर्म, जो विभिन्न दृष्टि-बिंदुओं से प्रकट होते हैं, सीधे या टेढ़े मार्गों से चलते हुए अंतत: तुम्हीं को प्राप्त होते हैं। किसी एक धर्म का सत्य होना अन्य सभी धर्मों के सत्य होने के ऊपर निर्भर करता है। उदाहरण-स्वरूप, अगर मेरे छ: अंगुलियां हैं और किसी दूसरे व्यक्ति के नहीं हैं, तो तुम कह सकते हो कि मेरे छ: अंगुलियों का होना असामान्य है। यही बात इस तर्क के संबंध में भी कही जा सकती है कि कोई एक धर्म सत्य है और अन्य सभी झूठे हैं। किसी एक धर्म का सत्य होना वैसे ही अस्वाभाविक है, जैसे संसार में किसी एक ही व्यक्ति के छ: अंगुलियों का होना। इस तरह हम देखते हैं कि अगर कोई एक धर्म सत्य है, तो अन्य सभी धर्म भी सत्य हैं। उनके अधारभूत तत्त्वों में अंतर पड़ सकता है, पर तत्त्वत: सभी एक हैं। अगर मेरी पांचों अंगुलियां सत्य हैं, तो वे सिद्ध करती हैं कि तुम्हारी पांचों अंगुलियां भी सत्य हैं।  क्या धर्म को भी स्वयं को उस बुद्धि के आविष्कार द्वारा सत्य प्रमाणित करना है, जिसकी सहायता से अन्य सभी विज्ञान अपने को सत्य सिद्ध करते हैं? ब्राह्म ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जिन अन्वेषण-पद्धतियों का प्रयोग होता है, क्या उन्हें धर्म-विज्ञान के क्षेत्र में भी प्रयुक्त किया जा सकता है? मेरा विचार है कि ऐसा अवश्य होना चाहिए और मेरा विश्वास भी है कि यह कार्य जितना शीघ्र हो, उतना ही अच्छा। यदि कोई धर्म इन अंवेषणों के द्वारा ध्वंस प्राप्त हो जाए, तो वह सदा से निरर्थक धर्म था- कोरे अंधविश्वास का, एवं वह जितनी जल्दी दूर हो जाए, उतना ही अच्छा। मेरी अपनी दृढ़ धारणा है कि ऐसे धर्म का लोप होना एक सर्वश्रेष्ठ घटना होगी। सारा मैल धुल जरूर जाएगा, पर इस अनुसंधान के फलस्वरूप धर्म के शाश्वत तत्त्व विजयी होकर निकल आएंगे। वह केवल विज्ञान सम्मत ही नहीं होगा- कम से कम उतना ही वैज्ञानिक जितनी कि भौतिकी या रसायनशास्त्र की उपलब्धियां हैं- प्रत्युत् और भी अधिक सशक्त हो उठेगा, क्योंकि भौतिक या रसायनशास्त्र के पास अपने सत्यों को सिद्ध करने का अंत:साक्ष्य नहीं है, जो धर्म को उपलब्ध है।धर्म का अध्ययन अब पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक आधार पर होना चाहिए। धर्म संबंधी सभी संकीर्ण, सीमित, युद्धरत धारणाओं को नष्ट होना चाहिए। संप्रदाय, जाति या राष्ट्र की भावना पर आधारित सारे धर्मों का परित्याग करना होगा। हर जाति या राष्ट्र का अपना-अपना अलग ईश्वर मानना और दूसरों को भ्रांत कहना, एक अंधविश्वास है, उसे अतीत की वस्तु हो जाना चाहिए। ऐसे सारे विचारों से मुक्ति पाना होगा। अब प्रश्न आता है कि क्या धर्म सचमुच कुछ कर सकता है? हां कर सकता है। यह मनुष्य को शाश्वत जीवन प्रदान करता है। आज मनुष्य जिस स्थिति में है, वह धर्म ही की बदौलत है और धर्म ही इस मानव पशु को एक ईश्वर बना देगा। यह है धर्म की क्षमता। 

मानव समाज से धर्म को निकाल दो, फिर शेष क्या बचेगा? पशुओं से भरे जंगल के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। जैसे कि मैं अभी कह चुका हूं, इंद्रिय-सुख को मानवता का चरम लक्ष्य मानना महज मूर्खता है, मानव जीवन का लक्ष्य ज्ञान है। पशु जितना आनन्द अपनी इंद्रियों के माध्यम से पाता है, उससे अधिक आनन्द मनुष्य अपनी बुद्धि के माध्यम से अनुभव करता है। साथ ही हम यह भी देखते हैं कि मनुष्य आध्यात्मिक प्रकृति का बौद्धिक प्रकृति से भी अधिक आनन्द प्राप्त करते हैं। इसलिए मनुष्य का परम ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान ही है। इस ज्ञान के होते ही परमानन्द की प्राप्ति होती है। संसार की सारी चीजें मिथ्या, छाया मात्र हैं, वे परम ज्ञान और आनन्द की तृतीय या चतुर्थ स्तर की अभिव्यक्तियां हैं। मुख्य बात है ईश्वर-प्राप्ति की आकांक्षा। 
हमारे सभी स्वार्थों की पूर्ति बाहरी संसार के द्वारा हो जाती है। अत: हमें ईश्वर के सिवा अन्य सभी वस्तुओं की आकांक्षा होती है। अत: जब हमें इस बाह्म संसार के उस पार की चीजों की आवश्यकता होती है, तभी हम उनकी पूर्ति अंत:स्थ स्त्रोत या ईश्वर से करना चाहते हैं। हमारी आवश्यकताएं जब तक इस भौतिक सृष्टि की संकुचित सीमा के भीतर की वस्तुओं तक ही परिमित रहती हैं, तब तक हमें ईश्वर की कोई जरूरत नहीं पड़ती। जब हम यहां के हर एक चीज से तृप्त होकर ऊब जाते हैं, तभी हमारी दृष्टि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इस सृष्टि से परे दौड़ती है। जब आवश्यकता होती है, तभी उसकी मांग भी होती है। इसलिए इस संसार की बालक्रिड़ा से, जितनी जल्दी हो सके निपट लो। तभी तुम्हें इस संसार के परे की किसी वस्तु की आवश्यकता प्रतीत होगी और धर्म के प्रथम सोपान पर तुम कदम रख सकोगे।

वैद्यनाथधाम में मुण्डन-संस्कार


झारखंड के देवघर जिले में स्थित वैद्यनाथधाम में मुण्डन-संस्कार का विशेष महत्त्व है। 12 ज्योतिर्लिंगों में एक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग यहां स्थित हैं। मुण्डन के पश्चात् मन्दिर की परिक्रमा कांवर लेकर करने की परम्परा है। यहां के पण्डे परिक्रमण हेतु कांवर उपलब्ध करवा देते हैं। यहां देखिये चित्रों में वैद्यनाथधाम में मुण्डन-संस्कार। इस सम्बन्ध में कुछ जानकारी भी पाएं जिन्हें स्रोत से प्राप्त किये गए हैं। विदित है कि जीवन में 15 संस्कार और 16वां संस्कार मृत्यु के पश्चात् होता है। इनमें एक मुण्डन-संस्कार भी है जिसके माध्यम से जन्म के साथ आए केशों को सिर से पृथक कर दिया जाता है।





सोलह संस्कार

वैदिक कर्मकाण्ड के अनुसार सोलह संस्कार होते हैं:--

1. गर्भाधान संस्कारः- उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिये प्रथम संस्कार।

2. पुंसवन संस्कारः- गर्भस्थ शिशु के बौद्धि एवं मानसिक विकास हेतु गर्भाधान के पश्चात्् दूसरे या तीसरे महीने किया जाने वाला द्वितीय संस्कार।

3. सीमन्तोन्नयन संस्कारः-
माता को प्रसन्नचित्त रखने के लिये, ताकि गर्भस्थ शिशु सौभाग्य सम्पन्न हो पाये, गर्भाधान के पश्चात् आठवें माह में किया जाने वाला तृतीय संस्कार।

4. जातकर्म संस्कारः- नवजात शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की कामना हेतु किया जाने वाला चतुर्थ संस्कार।

5. नामकरण संस्कारः- नवजात शिशु को उचित नाम प्रदान करने हेतु जन्म के ग्यारह दिन पश्चात् किया जाने वाला पंचम संस्कार।

6. निष्क्रमण संस्कारः- शिशु के दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करने की कामना के लिये जन्म के तीन माह पश्चात् चौथे माह में किया जाने वला षष्ठम संस्कार।

7. अन्नप्राशन संस्कारः- शिशु को माता के दूध के साथ अन्न को भोजन के रूप में प्रदान किया जाने वाला जन्म के पश्चात् छठवें माह में किया जाने वाला सप्तम संस्कार।

8. चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कारः- शिशु के बौद्धिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास की कामना से जन्म के पश्चात् पहले, तीसरे अथवा पाँचवे वर्ष में किया जाने वाला अष्टम संस्कार।

9. विद्यारम्भ संस्कारः- जातक को उत्तमोत्तम विद्या प्रदान के की कामना से किया जाने वाला नवम संस्कार।

10. कर्णवेध संस्कारः- जातक की शारीरिक व्याधियों से रक्षा की कामना से किया जाने वाला दशम संस्कार।

11. यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कारः- जातक की दीर्घायु की कामना से किया जाने वाला एकादश संस्कार।

12. वेदारम्भ संस्कारः- जातक के ज्ञानवर्धन की कामना से किया जाने वाला द्वादश संस्कार।

13. केशान्त संस्कारः- गुरुकुल से विदा लेने के पूर्व किया जाने वाला त्रयोदश संस्कार।

14. समावर्तन संस्कारः- गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से किया जाने वाला चतुर्दश संस्कार।

15. पाणिग्रहण संस्कारः-
पति-पत्नी को परिणय-सूत्र में बाँधने वाला पंचदश संस्कार।

16. अन्त्येष्टि संस्कारः- मृत्योपरान्त किया जाने वाला षष्ठदश संस्कार।

सोलह संस्कारों में आजकल नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म (मुण्डन), यज्ञोपवीत (उपनयन), पाणिग्रहण और अन्त्येष्टि संस्कार ही चलन में बाकी रह गये हैं।


 मुण्डन संस्कार
इसमें पहली बार बालक के सिर के बाल उतारे जाते हैं। यह कार्य जन्म से एक वर्ष या तीन वर्ष बाद या परिवार की परंपरा के आधार पर और बाद में हो सकता है। चरक का विचार है कि केश, श्मश्रु एवं नखों के काटने एवं प्रसाधन से पौष्टिकता, बल, आयुष्य, शुचिता और सौंदर्य की प्राप्ति होती है। इस संस्कार के पीछे स्वास्थ्य एवं सौंदर्य की भावना ही प्रमुख थी। पहले यह घर पर होता था, किंतु बाद में देवालयों में।

काल निर्धारण
चूड़ाकर्म संस्कार, जिसे 'चौलकर्म' भी कहा जाता है, केवल पुत्र संतति के लिए किया जाता है। इसका अर्थ है- शिशु का मुण्डन पूर्वक 'शिखा' ( चूड़ा ) का निर्धारण करना। सभी हिंदू शास्रकारों ने इसका वर्णन किया है। अधिकतर धर्मशास्रकारों ने इसे जन्म से तीसरे वर्ष में किये जाने का प्रस्ताव किया है, किंतु मनु० (2.35 ) के अनुसार उसे जन्म के प्रथम या तृतीय वर्ष में संपन्न किया जाना चाहिए, अन्य उत्तरकालीन 'संस्कारप्रकाश' आदि संस्कारपद्धतियों में कहा गया है कि चौल कर्म के लिए यद्यपि प्रथम, तृतीय या पंचम वर्षों को सर्वाधिक उपयुक्त समझा गया है, किंतु असुविधा होने पर इसे इससे पूर्व या बाद में अथवा उपनयन संस्कार के साथ भी किया जा सकता है। इसीलिए कई सामाजिक वर्गों में इसे उपनयन के साथ ही किये जाने की परिपाटी पायी जाती है। इस संदर्भ में गृह्यसूत्रकारों का यह भी कहना है कि इसके लिए उत्तरायण का समय अधिक उपयुक्त होता है। 'राजमार्तण्ड' के अनुसार, इसके लिए चैत्र तथा पोष को अधिक उपयुक्त माना जाता है, किंतु 'सारसंग्रह' में ज्येष्ठ तथा पौष को इसके लिए वर्जित कहा गया है।

चूड़ाकर्म का महत्व
इस संस्कार का संबंध प्रमुख रुप से शिशु की स्वास्थ्य रक्षा के साथ माना गया है। इससे बालक की आयुवृद्धि होती है, वह यशस्वी एवं मंगल कार्यों में प्रवृत्त होता है। पुरातन आयुर्विज्ञान विशेषज्ञों ने भी इसके स्वास्थ्य संबंधी महत्व को स्वीकार किया है। चरक तथा सुश्रुत दोनों का ही कहना है कि केश, श्वश्रु तथा नखों के केर्तन एवं प्रसाधन से आयुष्य, शारीरिक पुष्टता, बल, शुचिता एवं सौंदर्य की अभिवृद्धि होती है। अर्थात् केशवपन से भी शरीर पुष्ट, नीरोग एवं सौंदर्य सम्पन्न होता है। व्यक्त है कि गर्भजन्य केशों के कारण शिशु के सिर में खाज, फोड़े, फुंसी आदि चर्मरोगों के होने तथा लंबे बालों के कारण सिर में जूं, लीख आदि कृमि- कीटों के उत्पन्न होने की संभावना भी रहती है। साथ ही गर्भजन्य बालों की विषमता के कारण शिशु के बालों का विकास भी समरुप में नहीं हो पाता है। अतः शैशवास्था में एक बार क्षुर (उस्तरे) से उनका वपन आवश्यकता होता है। केशवपन की इस आवश्यकता का अनुपालन, हिंदुओं के अतिरिक्त अन्य धर्मावलम्बियों में भी देखा जाता है।

क्रिया-विधि
गृह्यसूत्रों में इसकी क्रिया-विधि अति सरल एवं संक्षिप्त रुप में पायी जाती है। इस दिन शिशु के माता- पिता इसके निमित्त तीन ब्राह्मणों को भोजन कराने के उपरांत शिशु की माता उसे स्नान कराकर तथा नूतन वस्र पहना कर यज्ञशाला में जाकर गोदी में लेकर, पूर्वाभिमुख होकर यज्ञाग्नि के पश्चिम में जाकर बैठती थी। पति- पत्नी दोनों अग्नि में घी की चौदह आहुतियाँ देकर वहाँ पर रखे गये जल में गरम जल मिलाते थे। तदनन्तर उस जल में नवनीत या घी अथवा दही मिलाते थे। इस मिश्रित जल से शिशु के बालों को गीला करके उन्हें सेही के कांटे से तीन भागों में विभक्त करके उनके बीच में कुशांकुन ग्रथित करते थे। आश्वलापन गृ. सू. में यहाँ पर छुरे की प्रार्थना भी की गयी है। इसके बाद उन्हें पुनः इस जल से गीला करते हुए पहले दक्षिण के भाग को, फिर पश्चिम के भाग को तथा अंत में उत्तर के भाग को काटा जाता था। इस क्रम में छुरे से सिर को तीन बार साफ किया जाता था। केशों को वहाँ पर पहले से ही रखे हुए बैल के गोबर में आरोपिट कर दिया जाता था। केशों को वहाँ पर पहले से ही रखे हुए बैल के गोबर में आरोपित कर दिया जाता था, जिसे अन्त में गोष्ठ में अथवा किसी जलाशय अथवा जल धारा के समीप भूमि में दबा दिया जाता था।

मस्तकलेपन
सर्वप्रथम शीतोष्णजल में गाय के घी, दूध, दही का मिश्रण कर वैदिक मंत्रों के साथ बालक के बालों को गीला किया जाता है, फिर उन्हें 3 भागों (दायां, बायां और मध्यस्थ) में विभक्त कर उनके बीच में मंत्रोच्चार के साथ कुशा के तृण रख कर उन्हें कलावे से जूड़े के रुप में बांधा जाता है। इसमें सृष्टि के सर्ग, स्थिति एवं संहार के तीनों अधिष्ठातृ देवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश से संबंद्ध मंत्रों के द्वारा सृष्टि का संचालन करने वाली इन तीनों महाशक्तियों का आवाहन इस भावना से किया जाता है कि इनके प्रभाव से बालक के मस्तिष्क में सत्कार्यों की सृष्टि, उनका पोषण एव असत्यकार्यों के विनाश की प्रवृतियों का संचार हो सके।

क्षुरपूजन
इसके बाद बालक के माता- पिता क्षुर (उस्तरे) की मूठ पर कलावा बांधकर रोली, अक्षत, धूप, दीप से वैदिक मंत्रों के साथ उसका पूजन करते हैं। तदनन्तर यज्ञ कुण्ड में पांच आहुतियां देकर बालक को यज्ञ स्थल से बाहर ले जाकर उसके बाल उतारे जाते हैं तथा उन्हें गोबर या आटे के पिण्ड में लपेट कर स्वच्छ भूमि में गाड़ दिया जाता है। बालक को स्नान करा कर पीतवस्र धारण कराये जाते हैं तथा उसके मुंडित सिर पर रोली या चन्दन से ऊँ का या स्वस्तिक का चिह्म बनाया जाता है। इसके बाद स्वस्तिवाचन तथा आशीर्वचन के साथ इसकी आनुष्ठानिक प्रक्रिया पूरी हो जाती है। तदनन्तर बधाई, भोज आदि का कार्य होता है। केशबन्धन के समान ही केशवपन के समय भी तीनों ग्रंथियों के अधिष्ठातृ देवों से सम्बद्ध मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।
बौधा० शांखायन आदि गृह्यसूत्रों में नापित का कोई उल्लेख न होने से व्यक्त है कि पहले यह कार्य बालक के पिता के द्वारा ही किया जाता था, किन्तु आगे चलकर इसके लिए नापित का भी सहयोग लिया जाने लगा। (संस्काररत्नमाला, पृ० 901 )

केशाधिवासन

उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में जहां कि यह उपनयन के साथ किया जाता है, प्रचलित संस्कार पद्धतियों में इसके आनुष्ठानिक स्तर पर अनेक रुपों की भिन्नता पायी जाती है, यथा, केशाधिवासन। यह क्रिया मुण्डन संस्कार की पूर्वसन्ध्या में की जाती है, इसमें गणेशपूजन के उपरान्त एतदर्थ पीले वस्रखण्डों में हल्दी, दूब, सरसों, अक्षत आदि मंगल द्रव्यों को रख कर उन्हें कलावे से बांध कर नौ पोटलियां बनायी जाती हैं और एक अलग से दसवीं भी बना ली जाती है। तदनन्तर बालक के माता - पिता संकल्प पूर्वक गणेशपूजन करके मुडन संस्कार के निमित्त प्रधान संकल्प लेते हैं, और उन पोटलियों को बालक के बालों को थोड़ा - थोड़ा इकट्ठा करके उन पर बांधते हैं।
पोटलियों को बांधने का क्रम इस प्रकार होता है-
सबसे पहले तीन पोटलियां दाहिने पक्ष की ओर, फिर तीन पीछे की ओर तथा अन्त में तीन बायें पक्ष की ओर और एक शिखा पर। इसके अतिरिक्त दो पोटलियाँ और भी बनाई जाती हैं जिनमें से एक को उस्तरे पर तथा एक को सेही के कांटों पर बांधा जाता है। वहाँ पर एक तांबे की परात में या कांसे की थाली में बैल का गोबर, गाय का घी, दूध, दही, तीखी धारवाला क्षुर, तीन-तीन करके त्रिगुणित सूत्र से लपेटे हुए कुशा के नौ तृणांकुरों को रख कर दक्षिणासंकल्प के साथ ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर पोटलियों को यथावत् सुरक्षित रखने के लिए बालक के सिर पर एक कपड़ा बांध दिया जाता है। इस प्रकार केशाधिवासन का अनुष्ठान किया जाता है। केश मानव शरीर के अंग होने के कारण इनके माध्यम से किसी प्रकार के जादू-टोने के परिहार के निमित्त ही इन्हें गोबर में स्थापित कर भूमि के गर्भ में रखा जाता है।
अगले दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर यज्ञशाला में जाकर संकल्प पूर्वक आचार्य का वरण करके यथाविधि वैदिक मंत्रों के साथ आज्यहोम तथा उसके बाद चूड़ांगहोम किया जाता है। तदनन्तर ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार एतदर्थ नियत मुहूर्त में लग्नदानसंकल्प करके वैदिक मंत्रों के साथ पूर्वोक्त रुप में केशकर्तन तथा शिखा को छोड़कर शीर्ष मुंडन किया जाता है। इसकी आनुष्ठानिक प्रक्रिया मैदानी भागों की प्रक्रिया की अपेक्षा अधिक विस्तृत है। अपिच, बटुक का कर्णवेध संस्कार भी इसी के साथ किया जाता है।

शिखासंचयन
यह कोई पृथक् संस्कार तो नहीं, किन्तु चूड़ाकर्म संस्कार का एक महत्त्वपूर्ण अंग होता है। जहां पर बालक का चौलकर्म बाल्यावस्था में सम्पूर्ण केशवपन के रुप में किया जाता है वहां पर शिखाचयन/शिखा स्थापन का कार्य उसके बाद केशवृद्धि हो जाने पर किसी भी दिन कर दिया जाता है और जहां पर चूड़ाकर्म का संस्कार कौमारावस्था में उपनयन के साथ ही किया जाता है वहां पर शिखास्थापन का कार्य उसी के साथ किया जाता है।
धर्मशास्रों के अनुसार बालक की शिखा के स्वरुप तथा उसके स्थापन के स्थान का निर्धारण उसके गोत्र एवं प्रवर के अनुसार किया जाना चाहिए। केशों का संचयन कुलधर्म के अनुरुप किया जाना चाहिए। वीरमित्रोदय में दिए गये विवरण के अनुसार, वशिष्ठ गोत्री लोग सिर के मध्य में केवल एक शिखा रखते थे। अत्रि एवं कश्यप के वंशज सिर के दोनों पक्षों पर दो शिखाएँ रखते थे, अंगिरस गोत्रानुयायी लोग पाँच शिखाएँ रखते थे और भृगु के वंशज कोई शिखा नहीं रखते थे अर्थात् पूर्ण रुप से मुंडित शीर्ष होते थे। ज्ञातव्य है कि गौड़ देशीय ब्राह्मण भृगु गोत्री माने जाते हैं। उत्तर भारत में तो शिखा स्थापना संबंधी इस शास्रीय विधान का अनुपालन संभवतः मध्यकाल में ही शिथिल हो चुका था, फलतः सिर के शीर्ष स्थान पर केवल एक चोटी रखने की परंपरा चल पड़ी थी, किंतु दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में पर्याप्त रुप में इस शास्रीय विधान का अनुपालन किया जाता था।

शिखासंचयन का महत्व
शिखासंचयन का संबंध हमारे शरीर के संचालन केंद्र मस्तिष्क की सुरक्षा के साथ होता है। शीर्ष के ऊपरी भाग को मस्तिष्क का मर्म स्थल माना जाता है। ब्रह्मरंध्र की स्थिति भी यहीं पर होती है और यही स्थान होता है, द्विदलीय आज्ञाचक्र का भी। आधुनिक चिकित्साविज्ञानियों का भी कहना है कि बालक को कौमारावस्था से किशोरावस्था की ओर अग्रसर करने वाली तथा हारमोंस के माध्यम से प्रत्येक आयु के व्यक्ति की चिंतन प्रक्रिया का नियमन करने वाली "पीनियल' नामक ग्रंथि भी यहीं पर होती है। मानव के इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण मर्मस्थल को सभी प्रकार के आघातों से बचाये रखने के लिए ही शास्रों में गोखुर प्रमाण शिखा रखने का विधान किया गया था। आचार्य सुश्रुत का कहना है- हमारे मस्तक के अंदर उसके शीर्ष भाग में शिरा संबंधी सन्निपात होता है वहीं पर हमारे मस्तिष्क का नियामक केंद्र भी होता है इस स्थान के आहत होने पर तत्काल मृत्यु हो सकती है।

चेतना जागृति तथा प्रतिज्ञापालन का प्रतीक
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में शिखा को चेतना जागृति तथा प्रतिज्ञापालन का प्रतीक भी माना जाता रहा है। यही कारण था कि लोग किसी व्रत या प्रतिज्ञा को करते समय शिखा का स्पर्श करते थे, उन्हें निरवच्छिन्न रुप में अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण बना रहे, इसलिए उसे बंधनमुक्त कर डालते थे। नंदवंश का नाश करने के लिए शिखामोक्ष के रुप में चाणक्य द्वारा की गयी प्रतिज्ञा का प्रसंग सर्वविदित है ही। पुराणों में इस प्रकार के अनेक संदर्भ पाये जाते हैं, जिसमें ॠषि- मुनि लोगों को क्रुद्ध होने पर संबद्ध व्यक्ति को अभिशप्त करने के लिए शिखामोक्ष करते हुए वर्णित किया गया है। मध्यकाल में हिंदुओं के लिए शिखा एक प्रकार से धर्मध्वजा की प्रतीक थी, जिसकी रक्षा वे अपने प्राणपण से किया करते थे किंतु आज की बदलती परिस्थितियों में यह एक आनुष्ठानिककृत्य मात्र रह गया है।


शनिवार, 20 अप्रैल 2013

राँची में रामनवमी पर निकाली गई झाँकियाँ

राँची में रामनवमी (19 अप्रील 2013) पर निकाली गई झाँकियों में शामिल रामभक्त



दे डालिये अंतिम श्रद्धांजलि पुलिस, कानून, राजनीतिक व्‍यवस्‍था और मानवता को


देश की राजधानी नई दिल्‍ली दरिंदगी से एक बार फिर दहल गई है। पिछले साल दिल्‍ली में चलती बस में हुए गैंगरेप के बाद लोगों का गुस्‍सा जब सड़क पर फूटा तो लगा कि क्रांति आ जाएगी। समाज बदल जाएगा। कानून का राज साकार हो जाएगा। लेकिन अब तो इंतहा हो गई है। पांच साल की एक मासूम के साथ जिस तरह की हैवानियत की गई, उससे ऐसा लगता है कि वसंत विहार गैंगरेप की शर्मनाक घटना से किसी ने सबक नहीं लिया। धीरे-धीरे सबकुछ पुराने ढर्रे पर चल पड़ा। ताजा घटना से ऐसा लगता है कि कुछ भी नहीं बदला है। गुनाह करने वालों को किसी तरह के कानून का डर नहीं है। सियासतदानों पर भी ऐसी घटनाओं का कुछ खास असर नहीं पड़ता दिख रहा है। ऐसी घटनाएं सामने आने पर जिम्‍मेदारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं होता बल्कि सत्‍ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक राजनीति करने में जुट जाता है। 16 दिसम्‍बर 2012 के पहले जैसे हालात थे वैसे अब भी हैं। ऐसा लगता है कि समाज में पुलिस, कानून, राजनीतिक व्‍यवस्‍था और मानवता का कोई अस्तित्‍व ही नहीं बचा है। तो सवाल है कि जब इनका कोई वजूद ही नहीं है तो क्‍यों न इन्‍हें अंतिम श्रद्धांजलि दे दी जाए?

इस बार अस्पताल में एक मासूम जिंदगी के लिए संघर्ष नहीं कर रही है बल्कि मानवता की सांस अटकी है। यह मौत से पहले की अंतिम हिचकी है और जिंदगी का अंतिम मौका भी। इस बार कोई विकल्प नहीं है। या तो हम हमेशा के लिए शून्य में चले जाएंगे या फिर जिस व्यवस्था में हम जी रहे हैं वह पूरी तरह बदल जाएगी। क्योंकि अब बीच का कोई रास्ता नहीं है।
इस घटनाक्रम के बाद इस बार हम हैरान, आक्रोशित या शर्मिंदा नहीं है। बल्कि हम सुन्न, बेबस, गुमसुम, बेचारे और आशाहीन नजर आ रहे हैं। क्योंकि हमारी सारी कोशिशें, सारे अभियानों का नतीजा शून्य है। 2012 में दिल्‍ली में रेप के 706 मामले सामने आए थे। एक जनवरी से 31 मार्च तक रेप के 393 मामले दर्ज किए गए। पिछले साल की तुलना में रेप के मामलों में 160 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2013 में प्रतिदिन औसतन चार से ज्‍यादा बलात्‍कार के मामले सामने आए हैं। अप्रैल में ही दिल्‍ली-एनसीआर में रेप के आठ मामले सामने आए हैं। 16 दिसंबर की वीभत्स घटना के बाद जब जनता 'दामिनी' को इंसाफ दिलाने के लिए सड़कों पर उतरी थी तब बदलाव की एक रोशनी नजर आई थी। लगा था कि युवा पीढ़ी समाज और व्यवस्था को बदलने के लिए मजबूर कर देगी। लेकिन तीन महीनों में ही उम्मीद की वह किरण नाउम्मीदी और बेबसी के धुंधलके में खो गई है।
दिल्‍ली में रेप पीडित बच्ची के पेट से मोमबत्ती और बोतल निकलने के एक दिन पहले ही तो एक लड़की ने पत्थर से लिखकर बताया था कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। और हम पथरीले मन और आंखों से बस देखते रहे थे। उससे भी एक दिन पहले ही तो एक नाबालिग छात्रा को बलात्कार के बाद कार से फेंक दिया गया था और सुबह की ब्रेकिंग न्यूज शाम के बुलेटिन से गायब हो गई थी। कितनी पीड़िताएं, कितने रेप, कितने पुलिस के लाठीचार्ज? क्या कोई गिनती है या गिनती करने का कोई फायदा? क्या यह सच नहीं कि बुलंदशहर में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवाने गई बच्ची को ही लॉकअप में बंद कर दिया गया, महाराष्ट्र के भंडारा में तीन सगी बहने बलात्कार के बाद कुएं में फेंक दी गई। सच तो यह है कि आज हम 16 दिसंबर से भी पीछे चले गए हैं। दामिनी की दास्तान जब सामने आई थी तो कम से कम हमारे पास आक्रोश और शर्म तो थी। अब तो यह भी नहीं है।
16 दिसंबर की घटना के बाद सरकार ने यौन हिंसा से जुड़े कानून में बदलाव किए। नए कानून के मुताबिक दुष्कर्म के ऐसे जघन्य मामले, जिनमें पीड़ित की मौत हो जाती है या फिर वह मरणासन्न हालत में पहुंच जाती है, उन मामलों में दोषियों को सजा-ए-मौत दी जा सकेगी। लेकिन ताजा घटना से ऐसा लगता है कि इस कानून का भी डर नहीं है। ऐसा लगता है कि बीते तीन महीनों में देश एक शून्य में चला गया है। न उम्मीद है, न आशा है और न ही बदलाव के संकेत। ऐसे में अब हमारे पास विकल्प क्या हैं? सड़क पर उतरें, लाठियां खाएं, नारे लगाए और बदलाव की उम्मीद में घर चले जाएं। और फिर जब किसी और बच्ची से रेप हो तो पुलिसवाले एफआईआर दर्ज करने के बजाए बच्ची के परिवार को मुंह बंद करने के लिए रिश्वत दें। ऐसा क्यों है कि आजादी के 66 साल बाद भी बलात्कार जैसी घटनाओं की एफआईआर दर्ज नहीं हो रही है और एसीपी स्तर के अधिकारी बेशर्मी की तमाम हदों को पार करते हुए कैमरे के सामने ही लड़कियों के मुंह पर तमाचा मारने की हिम्मत कर पा रहे हैं? हर गुजरते वक्त के साथ हम शून्य और अंधकार की ओर बढ़ते जा रहे हैं। क्या यह संवेदनहीनता की इंतहा नहीं कि इतनी वीभत्स घटना की जानकारी दिए जाने पर महिला आयोग की अध्यक्ष तत्‍काल कार्रवाई का भरोसा देने के बजाय छुट्टी होने का हवाला देती हैं।
सवाल यह भी उठता है कि हम किस समाज में जी रहे हैं। यहां नैतिक मूल्‍यों का ह्रास हो रहा है। दिल्‍ली की ताजा घटना पर पीएम मनमोहन सिंह भी बेहद आहत हैं और वह समाज को खुद के भीतर झांकने की नसीहत दे रहे हैं। लेकिन मुर्दा हो चुकी व्यवस्था की जिंदा हकीकत यह है कि इंडिया गेट पर लगे नारे हवा हो गए हैं, बदलाव की उम्मीद निराशा के अंधेरे में बदल गई है। आक्रोश के लिए जरूरी ऊर्जा बेबसी की थकान में बदल चुकी है। एक विचार जो मन में आता है वह यही है कि अब इस देश का कुछ नहीं हो सकता। बस इस देश के सिस्टम को दी जाए अंतिम श्रद्धांजलि और स्वयं ही कुछ किया जाए। (Bhaskar)

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

वैद्यनाथधाम मंदिर में अरघा व्यवस्था का हुआ प्रयोग

2013 श्रावणी मेले में अरघा के माध्यम से भोलेनाथ पर होगा जलार्पण












 झारखंड में देवघर स्थित प्रसिद्ध बाबा वैद्यनाथधाम मंदिर में रामनवमी के दिन शुक्रवार को नई पूजा व्यवस्था का प्रयोग किया गया। रामनवमी के मौके पर श्रद्धालुओं ने बाबा भोलेनाथ पर ’अरघा व्यवस्था’ के तहत जलार्पण किया। इस व्यवस्था के तहत श्रद्धालुओं कोे बाबा मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश के बजाय दूर से ही ’अरघा’ के माध्यम से जलार्पण करने की अनुमति दी गयी। इस वर्ष श्रावणी मेले में अरघा व्यवस्था के माध्यम से ही श्रद्धालुओं को जलार्पण की अनुमति मिल सकेगी। इसके तहत भक्त द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को स्पर्श किये बिना दूर से ही शिवलिंग पर जलार्पण कर सकेंगे। 12 फुट लंबे इस अरघे को विशेष तौर पर दिल्ली से मंगाया गया और शुक्रवार को जिला प्रशासन की मौजूदगी में मंदिर प्रबंधन की ओर से इसका सफल प्रयोग किया गया। नई व्यवस्था के प्रयोग के दौरान जिले के उपायुक्त व मंदिर प्रबंधन समिति के प्रमुख राहुल पुरवार भी उपस्थित थे। उन्होंने इस व्यवस्था को सफल बताया। अरघा व्यवस्था के तहत श्रद्धालुओं को बाबा मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश नहीं कराया जाता है, बल्कि गर्भ गृह, जहां शिवलिंग है, वहां से लेकर दरवाजे तक अरघे की व्यवस्था की गयी है। उस अरघे में भक्तों ने जल व फूल डाला और वह जल व फूल अरघे के ढलान के माध्यम से गर्भगृह में स्थित ज्योतिर्लिंग पर गिरा और दूर से ही भक्त बाबा भोलेनाथ का दर्शन कर पाये। मंदिर प्रबंधन का दावा है कि इस व्यवस्था से अधिक-से-अधिक संख्या में भक्त जल अर्पित कर पाएंगे। मंदिर प्रबंधन का दावा है कि नई पद्धति में एक घंटे में 4 से 5 हजार श्रद्धालु जल अर्पित कर पाएंगे।

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

सरहुल : सूरज से धरती के विवाह का अद्भुत नजारा


प्रकृति की पूजा का पर्व और सूरज से धरती के विवाह का प्रतीक सरहुल का झारखण्ड में अद्भुत नजारा रहता है। झारखंड में प्रकृति की उपासना का पर्व सरहुल आज चैत्र शुक्ल तृतीया शनिवार को धूमधाम से मनाया गया जा रहा है। विभिन्न अखाड़ों और सरना स्थलों पर लोग शनिवार को सुबह सरहुल की पूजा-अर्चना के लिए जमा हुए। पूजा-अर्चना के बाद विभिन्न मुहल्लों व आसपास के गांवों से शोभा यात्र्ाा निकाली जाती है। सरना धर्मावलंबियों की ओर से एक दिन पहले उपवास रखा जाता है और शाम में सरना स्थलों पर घड़ों में जल भी रखा जाता है। इन घड़ों के जलस्तर को देख कर पाहन यानी आदिवासियों के पुरोहित ने इस वर्ष होने वाली बारिश की भविष्यवाणी की। पूजा-अर्चना के बाद सरहुल शोभा यात्र् में विभिन्न इलाकों से सरना समितियां झंडे के साथ शामिल होती हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। रांची में शोभायात्र् में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चों तथा युवक-युवतियां भी मौजूद थीं। सरना स्थल में पहुंचकर शोभा यात्र्एं वापस अपने-अपने क्षेत्र् में लौट गयीं। शोभा यात्र् को लेकर शहर के प्रमुख मार्गा के किनारे सरना झंडे लगाए गए थे। जुलूस में कई आकर्षक झांकियां भी शामिल थीं। शोभा यात्र्में शामिल लोगों के लिए जगह-जगह पेयजल की भी व्यवस्था की गयी थी। अल्बर्ट एक्का चौक के निकट बने पंडाल के निकट एक मंच भी बनाया गया था। उसमें आकर्षक झांकियां और बेहतर खेल दिखाने वाले खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया गया। इस मौके पर मांदर और ढोल की थाप पर लोग देर रात तक झूमते रहे।
यहां देखिये रांची में सरहुल के नजारे-