सोमवार, 29 जुलाई 2013

100 करोड़ का सांसद


    शीतांशु कुमार सहाय
याद होगा सुधी पाठकों को कि कुछ दिनों पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त ने कहा था कि राजनीतिक दल भी सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आते हैं। लिहाजा उन्हें अपनी आय व व्यय के अलावा अन्य जानकारी माँगने पर उपलब्ध करवानी चाहिये। इतना सुनते ही काँग्रेस बौखला गयी। उसने अपने को सूचना का अधिकार कानून के बाहर रहने की घोषणा कर दी। काँग्रेस के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने भी काँग्रेस का साथ दिया और कहा था कि ऐसा करने से कई व्यावहारिक अड़चनें उत्पन्न होंगी। इस संदर्भ में पक्ष व विपक्ष के सभी दलों के सुर एक हो गये, कट्टर विरोधी भारतीय जनता पार्टी भी इस मामले में काँग्रेसी पाले में नजर आयी। दलों की ऐसी ‘एकता’ का राज केवल यही है कि उनकी अवैध कमाई को जनता जान जाएगी, चन्दे की मोटी आय सार्वजनिक हो जाएगी। लोग यह भी जान जाएंगे कि चुनाव के दौरान किस कम्पनी ने भविष्य में ‘लाभ’ लेने के लिए और किस नेता ने चुनावी टिकट के एवज में कितनी मोटी राशि दल के कोष में जमा करायी है। वैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक वर्ग यह कहता आ रहा है कि विभिन्न दलों द्वारा विधायक व सांसद का चुनावी टिकट मनमाने दाम पर बेचा जाता है। इसी बात को और पुष्ट किया है राज्य सभा के काँग्रेसी सांसद चौधरी वीरेन्द्र सिंह ने। बकौल चौधरी राज्य सभा की सीटें 100 करोड़ रुपये में बिकती हैं। यह है भारतीय लोकतन्त्र का एक और सच, कड़वा सच जिसकी घँूट से जनता का हाजमा बिगड़ता है मगर नेताओं के गालों की लाली बढ़ती है।
    चहुंओर से भ्रष्टाचार में घिरी काँग्रेस व उसके नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार चौधरी वीरेन्द्र सिंह के बयान से और पसोपेश में पड़ गयी है। अभी केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल व योजना आयोग के बीच गरीबी वाला विवाद शान्त भी नहीं पड़ा कि उसे अपने बयान बहादुरों को चौधरी के बयान पर सफाई देने के लिए लगाना पड़ा है। बयान बहादुरों के बीच सफाई देने स्वयं चौधरी भी सामने आए और कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया। पर, बयानों से पलटने वाले वरिष्ठ नेताओं को हमेशा अपने जमाने के प्रिण्ट मीडिया वाला ही जमाना याद रहता है जिस वक्त ‘तोड़-मरोड़कर छापा गया’ कहकर बयान से पलटना आसान था। पर, अब त्वरित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जमाना है जिसमें कैमरा सच को ही दिखाता है। शायद कैमरे की इस सच्चाई को भूल जाते हैं बयानबाज नेता। पर, लोकतान्त्रिक शर्म को ताक पर रखकर निर्लज्जतापूर्वक कैमरे की सच्चाई को भी नकारने से बाज नहीं आते कथित वरिष्ठ नेता। ऐसा ही किया है हरियाणा के चर्चित काँग्रेसी नेता चौधरी वीरेन्द्र ने। वास्तव में उनके बयान को मीडिया ने बिना छेड़छाड़ किये ही छापा और दिखाया। उन्होंने समझाकर कहा कि राज्य सभा के एक सांसद ने उन्हें बताया कि उनके राज्य सभा में सांसद बनने का बजट 100 करोड़ रुपयों का था पर काम 80 करोड़ रुपये में ही हो गया और 20 करोड़ रुपये की ‘बचत’ हो गयी। चौधरी के शब्दों में और तल्खी आयी और उन्होंने अपने गृह राज्य हरियाणा के यमुना नगर में पत्रकारों को समझाया कि जो 100 करोड़ में सांसद की सीट खरीदेगा, क्या वह गरीबों का भला सोचेगा! अपनी पार्टी पर भी भड़ास निकालते हुए उनकी जुबान ने कहा कि प्रदेश काँग्रेस में वे पहले पायदान पर हैं पर पार्टी में पायदान से नहीं, ‘अन्य दानों’ से कुर्सी मिलती है। क्या इतने शब्दों को मीडिया ने गढ़ा? क्या कैमरे में रिकॉर्ड उनके शब्द गलत हैं? आखिर किस तकनीक से यह सम्भव हो सका कि उन्होंने कहा कुछ और कैमरे ने रिकॉर्ड किया कुछ और? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर न चौधरी दे सकते हैं, न उनकी पार्टी काँग्रेस और न ही पार्टी के बयान बहादुर। वैसे वे बंसल के बाद रेल मंत्री बनने वाले थे और राष्ट्रपति की चिट्ठी भी आ गयी थी, वे ‘गोल’ करने वाले ही थे कि ‘रेफरी’ ने सीटी बजा दी और पत्ता साफ हो गया। ऐसे में जज्बात की पटरी पर उनकी जुबान की रेल ऐसी चली कि पंजे वाली पार्टी का हलक सूख गया। पर, इस बार भी जरूर उसी रेफरी ने सीटी बजायी होगी तभी तो अपनी प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाकर बयान से पलटना पड़ा। नहीं पलटते तो 100 करोड़ रुपये की सांसदी जाती। इस महंगाई में भी एक अरब रुपये का मोल तो है ही!  
    इस बीच भाजपा ने चुटकी लेते हुए इसे काँग्रेस की संस्कृति बतायी। सूचना का अधिकार के तहत न आने पर अड़ी और इस बाबत काँग्रेस के साथ दीखने वाली भाजपा चौधरी के बयान पर मिशन 2014 को ध्यान में रखकर ही काँग्रेस का विरोध कर रही है। इस संदर्भ में एक अन्य गंभीर प्रश्न उभरता है कि मनमोहन सरकार में मात्र सांसद बनने की लागत एक अरब रुपये है तो मंत्री बनने की कीमत क्या होगी?

रविवार, 28 जुलाई 2013

तेलंगाना के गठन से घटेंगी नहीं, बढ़ेंगी समस्याएँ


शीतांशु कुमार सहाय
 छोटे राज्यों के गठन से समस्याएँ बढ़ती हैं या घटती हैं? तेलंगाना प्रकरण के बहाने यह टटोलने का अवसर एक बार फिर से आया है। आखिर राज्यों को भौगोलिक रूप से नन्हा बनाने का कारण क्या हो सकता है? इस पर समर्थक राजनीतिज्ञों का एकमात्र कथन यही है कि इससे विकास अधिक होगा। जनसमस्याओं के निराकरण तेजी से होंगे। छोटा राज्य होने से विधि-व्यवस्था की कठिनाइयाँ उत्पन्न नहीं होंगी। जनता के प्रति जनप्रतिनिधि अपेक्षाकृत अधिक उत्तरदायी हो पाएंगे। इन तर्कांे के अलावा भी ढेर सारे तर्क समर्थन में दिये जाते हैं। किसी बड़े राज्य के विखण्डन के समय भोली-भाली जनता को अपने पक्ष में करने के लिए संभावित नये राज्य का नाम लेकर यह प्रचारित किया जाता है कि अब उसका कायापलट हो जाएगा, विकास की रफ्तार बुलेट ट्रेन को मात दे देगी। पर, सच्चाई की कसौटी पर जब ये तर्क सही नहीं ठहरते तब माहौल के मद्देनजर दूसरा तर्क खोज लेते हैं राजनीति के खिलाड़ी और लगातार चलता रहता है उनका पंचवर्षीय लोकतान्त्रिक-तानाशाह।

दरअसल, जब देश स्वतन्त्र हुआ तब प्रशासनिक सुदृढ़ता के लिए राज्यों का पुनर्गठन करना आवश्यक था। इसके लिए 22 दिसम्बर 1953 को न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ जिसने 30 सितम्बर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। वैसे राज्य पुनर्गठन आयोगों का इतिहास 110 वर्ष पुराना है। सबसे पहले सन् 1903 ईश्वी में तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार के गृह सचिव हर्बर्ट रिसले की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन समिति गठित की गयी थी। इस समिति ने भाषाई आधार पर बंगाल के विभाजन की सिफारिश की थी जिसके चलते 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ था। इसके बाद 1911 में लार्ड हार्डिंग की अध्यक्षता में एक आयोग बना जिसने बंगाल विभाजन को खत्म करने का सुझाव दिया। 1918 में मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड समिति की रपट आयी जिसने विधिवत् आयोग की तरह कार्य नहीं किया लेकिन प्रशासनिक सुधारों के बहाने छोटे राज्यों के गठन का सुझाव दिया था। उसने भाषाई व जातीय आधार पर राज्य गठन को नामंजूर कर दिया था। फिर करीब 10 वर्षों बाद मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी जिसे काँग्रेस का समर्थन था। उस समिति ने भाषा, जनेच्छा, जनसंख्या, भौगोलिक और वित्तीय स्थिति को राज्य के गठन का आधार माना। 1947 में स्वतन्त्रता मिलते ही भारत के सामने 562 देसी रियासतों के एकीकरण व पुनर्गठन की समस्या थी। इसे ध्यान में रखते हुए उसी वर्ष पहले एसके दर आयोग का गठन किया गया फिर जेवीपी (जवाहर लाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, पट्टाभिसीतारमैया) आयोग का गठन किया गया। दर आयोग ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का विरोध किया था। उसका मुख्य जोर प्रशासनिक सुविधाओं को आधार बनाने पर था। हालाँकि तत्कालीन जनाकांक्षाओं को देखते हुए तत्काल जेवीपी आयोग बना जिसने प्रभावित जनता की आपसी सहमति, आर्थिक और प्रशासनिक व्यवहार्यता पर जोर देते हुए भाषाई राज्यों के गठन का सुझाव दिया। पर, सरकार में आने पर जवाहर लाल के सुर बदल गये और वे भाषाई आधार पर राज्य गठन का विरोध करने लगे। सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामालू की मद्रास से आंध्र प्रदेश को अलग किये जाने की माँग को लेकर 58 दिन के आमरण अनशन के बाद मौत हो गयी पर अपने हठ पर जवाहर लाल डटे रहे। तब संयुक्त मद्रास में साम्यवादी दलों के बढ़ते वर्चस्व ने उन्हें अलग तेलुगू भाषी राज्य बनाने पर मजबूर कर दिया था। अब आंध्र प्रदेश से ही पृथक तेलंगाना बनाने की प्रक्रिया बतौर काँग्रेस अन्तिम चरण में है।

तेलंगाना के गठन के बाबत भी वही पुरानी बात दुहराई जा रही है कि अब विकास तीव्र होगा। पर, हश्र सामने है कि असम को विभाजित कर छोटे-छोटे राज्य बने मगर विकास कम और हªास अधिक हुआ। पूर्वोत्तर के तमाम राज्य अब भी विकास में पिछड़े हैं और विधि-व्यवस्था इतनी लचर है कि वहाँ आतंकवाद और बांग्ला देशी घुसपैठ की समस्या चरम पर है। पहले अवतरण में वर्णित तर्कों के आधार पर ही सन् 2000 के नवम्बर में भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार ने उत्तर प्रदेश से उत्तरांचल, मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ और बिहार से पृथक झारखण्ड राज्य बनाया। केन्द्र में काँग्रेस की सरकार बनने के बाद उसने उत्तरांचल का नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया जिस पर करोड़ों रुपये बेकार ही खर्च हुए। इस विखण्डन का नतीजा सामने है कि कुछ पूर्व मुख्य मंत्रियों और मंत्रियों की सुविधाभोगी संख्या अवश्य बढ़ी मगर विकास की रफ्तार जापान की बुलेट ट्रेन को नहीं ही पछाड़ पायी, अलबत्ता भारतीय रेल की सवारी गाड़ी की गति को भी छू नहीं सकी। .... तो फिर बनने दीजिए तेलंगाना को भी और रहिए तैयार उसका परिणाम देखने के लिए!

शनिवार, 27 जुलाई 2013

लालू ने पगला बाबा के जोड़े हाथ, मिली गाली


मिर्जापुर| बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव शुक्रवार 26 जुलाई 2013 को विंध्यधाम क्षेत्र में पहुंचने के बाद मंदिर बाद में पहले बाबाओं के आश्रम में गए। घमहापुर स्थित विभूति नारायण उर्फ पगला बाबा और महुवारी कला स्थित देवराहा हंस बाबा के आश्रम में उन्होंने पांच घंटे से भी अधिक समय गुजारा। आश्रम में आशीर्वाद लेने के बाद उन्होंने रात में मां विंध्यवासिनी देवी का दर्शन-पूजन किया। शुक्रवार शाम करीब चार बजे लालू अपने लाव-लश्कर के साथ सबसे पहले विभूति नारायण बाबा के आश्रम में पहुंचे। यहां पर बाबा ने अपने चिरपरिचित अंदाज में उन्हें खूब गाली दी, जिसे बाबा का आशीर्वाद समझ लालू मुस्कराते रहे। फिर बाबा ने आश्रम में स्थित शिवलिंग की पूजा लालू से कराई। विभूति नारायण बाबा के आश्रम से होते हुए लालू महुवारी कला स्थित देवराहा हंस बाबा के आश्रम में पहुंचे। यहां पर भी उन्होंने बाबा का आशीर्वाद लिया।(Amar Ujala)

रविवार, 21 जुलाई 2013

गुरु की कृपा का दिन गुरु पूर्णिमा

 गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
गुरु अंतःकरण के अंधकार को दूर करते हैं। आत्मज्ञान के युक्तियाँ बताते हैं। गुरु प्रत्येक शिष्य के अंतःकरण में निवास करते हैं। वे जगमगाती ज्योति के समान हैं जो शिष्य की बुझी हुई हृदय-ज्योति को प्रकट
करते हैं। 'गु' का अर्थ है- अंधकार या मूल अज्ञान और 'रु' का अर्थ है- उसका निरोधक। गुरु अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता है। जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है, वैसी ही गुरु के लिए भी। गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। आज विश्वस्तर पर जितनी भी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, उनका मूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
(गीताः ४ / ३४)('उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत्-प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्व को भलीभाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे।') यह दिन
'महाभारत' के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है। कृष्ण द्वैपायन व्यास संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। व्यासका शाब्दिक संपादक है। वेदों का व्यास यानी विभाजन भी संपादन की श्रेणी में आता है। कथावाचक शब्द भी व्यास का पर्याय है। कथावाचन भी देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप पौराणिक कथाओं का विश्लेषण भी संपादन है। भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, 18 पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। महाभारतकी रचना इसी पूर्णिमा के दिन पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ 'ब्रह्मसूत्र' का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया और तभी से 'व्यास पूर्णिमा' अर्थात 'गुरु पूर्णिमा' मनायी जा रही है।
द्वापर युग के अंतिम भाग में वेदव्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा। व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं। इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं। धार्मिक ग्रंथों में महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित
'शिव-पुराण' को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की भक्ति महिमा का उल्लेख है। इसमें शिव के अवतार आदि विस्तार से लिखे गए हैं। 'वेद' और 'उपनिषद' सहित 'विज्ञान भैरव तंत्र', 'शिव पुराण' और 'शिव संहिता' में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की। इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।
भारत में गुरु पूर्णिमा पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। आषाढ़ की पूर्णिमा को ही 'गुरु पूर्णिमा' कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। वैसे तो देश भर में एक से बड़े एक अनेक विद्वान हुए हैं, परंतु उनमें महर्षि वेद व्यास, जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, उनका पूजन आज के दिन किया जाता है।
इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था, तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति, अपने सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था।

हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यासजी ही हैं, अतः वे हमारे आदिगुरु हुए। इसीलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनकी स्मृति हमारे मन मंदिर में हमेशा ताजा बनाए रखने के लिए हमें इस दिन अपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पाद-पूजा करनी चाहिए तथा अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए गुरु का आशीर्वाद जरूर ग्रहण करना चाहिए। साथ ही केवल अपने गुरु-शिक्षक का ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

गुरु पूर्णिमा के दिन खासकर करें : -
* प्रातः घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके तैयार हो जाएं।
* घर के किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाना चाहिए।
* फिर हमें 'गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये' मंत्र से पूजा का संकल्प लेना चाहिए।
* तत्पश्चात दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ना चाहिए।
* फिर व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम, मंत्र से पूजा का आवाहन करना चाहिए।
* अब अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा करके उन्हें यथा योग्य दक्षिणा देना चाहिए।
* गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।
* यह पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वास के आधार पर नहीं।
* इस दिन वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर गुरु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
* गुरु का आशीर्वाद सभी-छोटे-बड़े तथा हर विद्यार्थी के लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्द्धक होता है।
* इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

यह तन विष की बेलरी
, गुरु अमृत की खान।शीश दियो जो गुरु मिले
, तो भी सस्ता जान॥-कबीरदास

गुरु की कृपा का दिन गुरु पूर्णिमा

 गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
गुरु अंतःकरण के अंधकार को दूर करते हैं। आत्मज्ञान के युक्तियाँ बताते हैं। गुरु प्रत्येक शिष्य के अंतःकरण में निवास करते हैं। वे जगमगाती ज्योति के समान हैं जो शिष्य की बुझी हुई हृदय-ज्योति को प्रकट
करते हैं। 'गु' का अर्थ है- अंधकार या मूल अज्ञान और 'रु' का अर्थ है- उसका निरोधक। गुरु अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता है। जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है, वैसी ही गुरु के लिए भी। गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। आज विश्वस्तर पर जितनी भी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, उनका मूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
(गीताः ४ / ३४)('उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत्-प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्व को भलीभाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे।') यह दिन
'महाभारत' के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है। कृष्ण द्वैपायन व्यास संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। व्यासका शाब्दिक संपादक है। वेदों का व्यास यानी विभाजन भी संपादन की श्रेणी में आता है। कथावाचक शब्द भी व्यास का पर्याय है। कथावाचन भी देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप पौराणिक कथाओं का विश्लेषण भी संपादन है। भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, 18 पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। महाभारतकी रचना इसी पूर्णिमा के दिन पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ 'ब्रह्मसूत्र' का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया और तभी से 'व्यास पूर्णिमा' अर्थात 'गुरु पूर्णिमा' मनायी जा रही है।
द्वापर युग के अंतिम भाग में वेदव्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा। व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं। इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं। धार्मिक ग्रंथों में महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित
'शिव-पुराण' को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की भक्ति महिमा का उल्लेख है। इसमें शिव के अवतार आदि विस्तार से लिखे गए हैं। 'वेद' और 'उपनिषद' सहित 'विज्ञान भैरव तंत्र', 'शिव पुराण' और 'शिव संहिता' में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की। इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।
भारत में गुरु पूर्णिमा पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। आषाढ़ की पूर्णिमा को ही 'गुरु पूर्णिमा' कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। वैसे तो देश भर में एक से बड़े एक अनेक विद्वान हुए हैं, परंतु उनमें महर्षि वेद व्यास, जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, उनका पूजन आज के दिन किया जाता है।
इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था, तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति, अपने सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था।

हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यासजी ही हैं, अतः वे हमारे आदिगुरु हुए। इसीलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनकी स्मृति हमारे मन मंदिर में हमेशा ताजा बनाए रखने के लिए हमें इस दिन अपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पाद-पूजा करनी चाहिए तथा अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए गुरु का आशीर्वाद जरूर ग्रहण करना चाहिए। साथ ही केवल अपने गुरु-शिक्षक का ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

गुरु पूर्णिमा के दिन खासकर करें : -
* प्रातः घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके तैयार हो जाएं।
* घर के किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाना चाहिए।
* फिर हमें 'गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये' मंत्र से पूजा का संकल्प लेना चाहिए।
* तत्पश्चात दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ना चाहिए।
* फिर व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम, मंत्र से पूजा का आवाहन करना चाहिए।
* अब अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा करके उन्हें यथा योग्य दक्षिणा देना चाहिए।
* गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।
* यह पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वास के आधार पर नहीं।
* इस दिन वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर गुरु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
* गुरु का आशीर्वाद सभी-छोटे-बड़े तथा हर विद्यार्थी के लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्द्धक होता है।
* इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

यह तन विष की बेलरी
, गुरु अमृत की खान।शीश दियो जो गुरु मिले
, तो भी सस्ता जान॥-कबीरदास

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

किस्मत चमकाने का खास दिन है 19 जुलाई


हर वर्ष विक्रम संवत् (हिन्दी पंचांग) के अनुसार आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष में एक बहुत ही खास दिन आता है. इस दिन कुछ बातों का ध्यान रख लिया जाए तो व्यक्ति की किस्मत रातोंरात बदल सकती है. इस साल 2013 में यह खास दिन 19 जुलाई, शुक्रवार को आ रहा है. यह बेहद खास योग है और इस योग में किए गए खास उपाय बुरे समय को शुभ समय में बदल सकते हैं. यहां कुछ ऐसी बातें बताई जा रही हैं जो स्त्री और पुरुषों के लिए स्वास्थ्य और किस्मत की दृष्टि से काफी उपयोगी हैं. आगे जानिए 19 जुलाई को कौन सा खास दिन है और इस योग में हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए...
देवशयन एकादशी के दिन से कार्तिक शुक्ल दशमी तक किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य करना वर्जित किए गए हैं. मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, विवाह, मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा, यज्ञ-हवन, किसी भी प्रकार के संस्कार आदि. इन सभी कार्यों में भगवान श्रीहरि की विशेष उपस्थिति अनिवार्य होती है. ऐसे में जब भगवान के शयन का समय होता है तब वे इन कार्यों में उपस्थित नहीं होते हैं. इसी वजह से इन चार माह में मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए.
शास्त्रों के अनुसार इस सृष्टि के पालनहार श्रीहरि यानि भगवान विष्णु हैं और उनकी पूजा से देवी लक्ष्मी के साथ ही सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है. क्या आप जानते हैं कि श्रीहरि भी प्रतिवर्ष कुछ निश्चित समय के लिए विश्राम करते हैं, शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं. जी हां, यह सत्य है कि भगवान विष्णु भी आराम करते हैं. ऐसी पौराणिक मान्यता है कि भगवान श्रीहरि चार माह के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं. इस वर्ष श्रीहरि के सोने का समय 19 जुलाई से प्रारंभ हो रहा है. अत: यह दिन बेहद खास और इस दिन कुछ खास उपाय किए जाने चाहिए.

देवशयनी एकादशी के संबंध में शास्त्रों में कई कथाएं बताई गई हैं. यहां जानिए उन्हीं कथाओं में से एक कथा. यह काफी प्रचलित है. कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन रूप में दैत्यराज बलि से तीन पग धरती मांगी थी. तब राजा बलि ने उन्हें तीन पग जमीन देने का वचन दिया. वामन अवतार ने एक पग में पृथ्वी, दूसरे पग में आकाश और सभी दिशाओं को नाप लिया. तब राजा बलि ने तीसरा पग रखने के लिए स्वयं का शीश आगे कर दिया. इससे श्रीहरि प्रसन्न हो गए. तब उन्होंने राजा से वरदान मांगने को कहा.... राजा बली ने वरदान में श्रीहरि को ही मांग लिया और कहा अब आप मेरे यहां निवास करेंगे. तब महालक्ष्मी ने अपने पति श्रीहरि को बलि के बंधन से मुक्त करवाने के लिए राजा के हाथ पर रक्षासूत्र बांधा और उसे भाई बना लिया. महालक्ष्मी ने राजा को भाई बनाकर निवेदन किया कि वे भगवान विष्णु को उनके वचन से मुक्त करें. राजा बलि ने श्रीहरि को मुक्त कर दिया लेकिन उनसे चार माह तक सुतल लोक में रहने का वचन ले लिया. तभी से भगवान विष्णु के साथ ही ब्रह्मा और शिव भी इस वचन का पालन करते हैं. मान्यताओं के अनुसार विष्णु के बाद महादेव महाशिवरात्रि तक और ब्रह्मा शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक, चार-चार माह सुतल यानी भूमि के अंदर निवास करते हैं.
बारिश के दिनों में पत्तेदार सब्जियां हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकती हैं. अत: इन सब्जियों का त्याग करना चाहिए. इन दिनों बारिश की वजह से सूर्य और चंद्रमा दोनों के ही दर्शन नहीं हो पाते हैं. ना ही इनसे मिलने वाली ऊर्जा हम तक पहुंच पाती है. इसी वजह से बारिश के दिनों में हमारी पाचन शक्ति बहुत कम हो जाती है. सूर्य और चंद्र से मिलने वाली ऊर्जा हमारे पाचन तंत्र को मजबूती प्रदान करती है. इसके साथ ही वर्षा के कारण हम अधिक शारीरिक श्रम भी नहीं कर पाते हैं. जिससे भोजन ठीक से पच नहीं पाता है. जो कि स्वास्थ्य के हानिकारक है. इसी वजह से इन दिनों में व्रत-उपवास का काफी महत्व है. ऐसा खाना न खाएं जो आसानी से पचता नहीं है.
देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए. पूजन के लिए श्रीहरि की प्रतिमा को सुंदर वस्त्रों से सजाएं. गादी एवं तकिए पर श्रीविष्णु की प्रतिमा को शयन करवाएं. इस दिन भक्त व्रत रखना चाहिए. जो भी व्यक्ति इस एकादशी पर व्रत रखता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं. महालक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है. देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक हमें मधुर स्वर के लिये गुड़, लंबी उम्र एवं संतान प्राप्ति के लिये तेल, शत्रु बाधा से मुक्ति के लिये कड़वे तेल, सौभाग्य के लिये मीठा तेल आदि का त्याग करना चाहिए. इसी प्रकार वंश वृद्धि के लिये दूध का और बुरे कर्म के अशुभ फल से मुक्ति के लिये उपवास करना चाहिए.
एक वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं और इन दिनों में उपवास या व्रत रखने की परंपरा है. देवशयनी एकादशी पर व्रत रखा जाता है. व्रत रखने के साथ कुछ और भी नियम हैं जिनका पालन करना चाहिए. वर्तमान में वर्षा ऋतु चल रही है और इस समय में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां अधिक होती हैं. क्योंकि हम खान-पान में सावधानी नहीं रखते हैं. देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक चार माह होते हैं. इन चार माह को चातुर्मास कहा जाता है. चातुर्मास में खाने-पीने की कई चीजें स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकती हैं. अत: आगे जानिए इस समय में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए. (Samay)