मंगलवार, 27 अगस्त 2013

जान तो लीजिये श्रीकृष्ण को




शीतांशु कुमार सहाय
    सुनी-सुनायी बातों के आधार पर बिना सन्दर्भों को पढ़े-समझे ही किसी के बारे में अवधारणा बना ली जाती है। यह बड़ा आसान है और इन दिनों अधिकतर ऐसा ही हो रहा है। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अल्पज्ञानियों के वक्तव्यों या अल्पज्ञों के लिखितनामे के अनुसार अपनी अवधारणा बना लेते हैं। अधिकतर लोग उक्त अवधारणा को ही आधार बनाकर श्रीकृष्ण के बारे में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। आज जन्माष्टमी के पावन अवसर पर मनन करने का दिन है, श्रीकृष्ण को जानने-समझने का मौका है। कोई उन्हें चोर कहते हुए स्वयं भी ‘चोरी’ करता है और अन्ततः अपने को उनका भक्त भी बताता है। कोई उन्हें धूर्त्त बताते हुए महाभारत के प्रसंग भी वाचता है। दो कदम आगे बढ़कर कोई भक्त तो भगवान श्रीकृष्ण को भयानक षड्यन्त्रकारी बताने से भी गुरेज नहीं करता है। उनपर बहुपत्नीवाद का भी आरोप लगाया जाता है। साथ ही रासलीला के बहाने उनके चरित्र पर भी अँगुली उठती रही है। ऐसे आरोप लगाने वाले भी अन्ततः श्रीकृष्ण को भगवान मानते हैं और उनकी आराधना करते हैं। पर, आवश्यक है प्रामाणिक ग्रन्थों के अध्ययन कर सच को जानने की; ताकि ऐसे विरोधाभास से बच सकें।
    युग-गणना के अनुसार, तीसरे युग द्वापर में विष्णु ने ही श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। वह द्वापर का अन्तिम चरण था। उनके प्रस्थान के तत्काल बाद ही काल परिवर्तन हुआ और वर्तमान कलियुग का प्रवेश हुआ। इसलिये उस समय के अधिकतर विचार आज की ही तरह के प्रतीत होते हैं। आम तौर पर एक युग में लोगों के विचार समान होते हैं। साथ ही युग-सन्धि के समय का विचार अगले युग के विचार से मेल खाते हैं। यही कारण है कि श्रीकृष्ण के विचार वर्तमान विचार से मेल खाते हैं और उनकी कारगुजारियों को सर्वाधिक आलोचनाओं का शिकार होना पड़ता है। उनके जीवन की शुरुआत ही माखन चोरी से सम्बद्ध है। यह प्रवृत्ति लड़कपन की है। चूँकि वह सन्धि युग का काल था और कलियुग आने वाला था, लिहाजा उन्होंने माखन चोरी के माध्यम से सन्देश दिया कि अब यह प्रवृत्ति बढ़ेगी अतः सम्पत्ति की सुरक्षा की जानी चाहिये। मक्खन खाकर भी यह कहना कि उन्होंने खाया नहीं, यह विदित करता है कि आने वाले समय में झूठ का बोलवाला होगा। लोग सहज ही झूठ बोलेंगे और बच्चों में यही प्रवृत्ति डालेंगे। झूठ बोलना भी हास्य का पर्याय हो जाएगा। सच बोलने वाले घट जाएंगे। सच को भी प्रमाण की आवश्यकता होगी मगर झूठ बोलने या आरोप लगाने के लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं। क्या इन दिनों ऐसा नहीं हो रहा? यों उन्होंने एक दिन युद्ध के समय अपनी शक्ति से धंुध उत्पन्न कर सूर्य को ढँका और एक विशेष योद्धा को मरवाया। इस प्रकरण में भगवान श्रीकृष्ण पर षड्यन्त्र का आरोप लगाया जाता है। यहाँ इस रहस्य से पर्दा उठाया गया है कि जो दीखता है वह सच नहीं भी हो सकता है। विश्वास करने से पहले सच को भी परख लें। दृष्टि-भ्रम कभी भी और कहीं भी हो सकता है। फर्श की जगह जल और जल की जगह फर्श का आभास हुआ था उस दुर्योधन को जो ज्ञान-विज्ञान में माहिर ही नहीं; बल्कि साँस लिए बिना जल में रहने का अभ्यस्त भी था। जल से इतनी अभिन्नता के बाद भी दुर्योधन जल को पहचानने में विफल रहा। अपने ज्ञान पर अतिविश्वसनीसता घातक है। सर्वज्ञ होने के बावजूद सन्दीपन ऋषि से 64 कलाओं का ज्ञान प्राप्त कर उन्होंने गुरु की महत्ता कायम रखी। महाभारत का युद्ध टालने का भी उन्होंने भरसक प्रयास किया। राजनीति के 6 अंगों सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध व आश्रय के अनुसार समझौते का भरपूर प्रयास किया पर युद्धोन्मादी कौरव नहीं माने।
    श्रीकृष्ण पर आयत होता है कि वे बहुपत्नीवादी थे। उनकी 16,108 रानियों में 8 पटरानियाँ थीं। वास्तव में तत्कालीन एक शासक व्यभिचारी था जो युवतियों से दुष्कर्म कर उन्हें कारागार में डाल देता था। सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए उन सभी महिलाओं को मुक्त कर श्रीकृष्ण ने पति के रूप में अपना नाम दिया। चूँकि महाभारत के पश्चात् पुरुषों की संख्या काफी घट गयी अतः उन्होंने सभी रानियों से 10-10 पुत्र प्राप्त किये। ये सभी प्रजनन अलैंगिक थे जिसे काल्पनिक नहीं कहा जा सकता। परखनली शिशु की उत्पत्ति अलैंगिक प्रजनन का ही रूप है। यों हजारों असहाय महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो पायी। रासलीला के कारण उन पर कामुकता फैलाने का आरोप लगाया जाता है। वास्तव में रासलीला के कई गूढ़ार्थ हैं। गोपबालाओं के साथ उनका नृत्य यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जो लोकप्रिय होते हैं, उनके चाहने वाले उनकी यादों के साथ हँसते हैं, बोलते हैं, नाचते हैं, गाते हैं और न जाने क्या-क्या करते हैं! ऐसी स्थिति में जब गोकुल से पलायन कर चुके श्रीकृष्ण की यादों में ही जीवन गुजारने का निर्णय लेती हैं गोपिकाएँ तो उन्हें समझाने आते हैं उद्धव। यों उद्धव को रासलीला व प्रेम का सच्चा अर्थ समझ में आता है। इस प्रकरण को पढ़ने वाले श्रीकृष्ण पर कामुकता फैलाने का आरोप नहीं लगाते। उन्होंने ‘श्रीमद्भग्वद्गीता’ का ऐसा सन्देश दिया जो मानव जीवन का प्रायोगिक सत्य उद्घाटित करता है। आत्मान्वेषण से समस्त कार्य सम्भव हैं जो ‘श्रीमद्भग्वद्गीता’ के गहन अध्ययन-मनन-चिन्तन से सम्भव है। योगेश्वर श्रीकृष्ण को कोटिशः नमन! 

रविवार, 25 अगस्त 2013

लाल हिंसा में झारखंड सर्वाधिक लाल


शीतांशु कुमार सहाय

    येन-केन-प्रकारेण झारखण्ड में सरकार बनी और शनिवार को मन्त्रिमण्डल का विस्तार भी पूरा हो गया। कहने को जनता की सरकार झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के हेमन्त सोरेन के नेतृत्व में पूरी तरह सत्तासीन हो गयी। पर, एक मुख्य बात की ओर अब तक सरकार का ध्यान कमतर है और वह है नक्सलियों का लाल आतंक। इस आतंक के साये में राज्य के 24 में से 18 जिलों के लोग जीने को मजबूर हैं। कब उन्हें इस मजबूरी से मुक्ति मिलेगी, यह बताने में झामुमो, काँग्रेस व राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की तिकड़ी वाली राज्य की सरकार असमर्थ है। यह समस्या सरकार की प्राथमिकता में शामिल होनी चाहिये मगर सरकारी तौर पर यह गौण है। केवल अपराध संगोष्ठियों में ही इस पर विचार होता है। विचार से उभरे निष्कर्षों पर कोई सार्थक पहल नहीं हो पाती। लिहाजा हर दिन लाल आतंकियों यानी नक्सलियों का प्रसार बढ़ रहा है। इसने अब अपनी पहुँच राजधानी राँची और उपराजधानी दुमका में भी दर्ज करा दी है। इसका प्रमुख कारण है नियमित विकास का अभाव। राज्य का गठन जब सन् 2000 के 15 नवम्बर को हुआ था तब आधार यही बताया गया था कि अनियमित विकास नहीं अब नियमित होगा। पर, अब तक ऐसा न हो पाया। जो भी सरकारें राज्य में आयीं वह जनविकास से ज्यादा सरकार को स्थिर रखने में ही व्यस्त रहीं। वर्तमान सरकार का भी गठन इतनी पैंतरेबाजी के बाद हुआ कि झामुमो, काँग्रेस व राजद की सारी ऊर्जा सरकार को संभालने में ही खर्च हो जा रही है। उनका ध्यान लाल आतंक से जनता को मुक्ति दिलाने पर जा ही नहीं रहा है।
    झारखण्ड के गठन से अब तक यहाँ 426 सुरक्षाकर्मियों सहित करीब 1,100 लोगों को नक्सलियों ने मौत के घाट उतारा है। नक्सलियों के हमले में जान गँवाने वालों में लोकसभा के एक सदस्य, राज्य के 2 विधायकों तथा भारतीय आरक्षी सेवा के एक अधिकारी भी हैं। 2 जुलाई को काठीकुंड के जंगल में घात लगाकर नक्सलियों ने पाकुड़ के आरक्षी अधीक्षक अमरजीत बलिहार और 5 अन्य पुलिसकर्मियों को मार डाला। यों जनवरी 2005 में नक्सलियों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी लेनिनवादी (भाकपा-माले) के विधायक महेंद्र सिंह की गिरीडीह में हत्या कर दी थी। लाल आतंकियों ने मार्च 2007 में झामुमो के लोकसभा सदस्य सुनील महतो की हत्या कर दी। वर्ष 2008 में पूर्व मंत्री व जनता दल (युनाइटेड) के विधायक रमेश सिंह मुंडा की हत्या कर दी गयी। राज्य में पिछले 5 वर्र्षांे में नक्सली हमले व इसमें जान गँवाने वालों की संख्या बढ़ी है। वर्ष 2008 में 57, 2009 में 138, 2010 में 70, 2011 में 130 और वर्ष 2012 में 169 लोगों को लाल आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया। इनसे ग्रामीण अधिक प्रभावित हैं। जब कभी नक्सलियों के एक समूह को लगता है कि लोग प्रतिद्वन्द्वी समूह की मदद कर रहे हैं तो वे ग्रामीणों को निशाना बनाते हैं। राज्य में 6 से अधिक नक्सली गिरोह हैं और आम लोग उनके आपस के झगड़े में मारे जा रहे हैं। इस बीच सरकार कहती है कि विकास के हथियार से लाल आतंकियों की समस्या समाप्त की जाएगी। पर, इसमें सच नजर नहीं आता है। यदि यह सच होता तो वर्ष 2000 में जिस राज्य के केवल 8 जिले नक्सल प्रभावित थे अब उसके 24 में से 18 जिलों में लाल गतिविधियाँ प्रसारित हो चुकी हैं। नये आँकड़े में झारखण्ड में सर्वाधिक नक्सल घटनाएँ दर्ज की गयीं। वर्ष 2013 की पहली छमाही में झारखण्ड में पिछले वर्ष के मुकाबले नक्सली घटनाओं में कमी आयी है। यह कमी कुल 101 घटनाओं (गत वर्ष जनवरी से जून तक 302 नक्सली घटनाएँ हुईं) की है। साथ ही इस वर्ष झारखण्ड में अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक नक्सली वारदातें हुईं। नक्सली वारदातों के मामले में दूसरे स्थान पर छत्तीसगढ़ जबकि बिहार तीसरे स्थान पर है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, झारखण्ड में इस वर्ष 30 जून तक 201 नक्सली वारदातों को अंजाम दिया गया। वहीं देशभर में 593 घटनाएँ हुई हैं। देशभर में हुई नक्सली वारदातों में से 33.89 प्रतिशत केवल झारखण्ड में हुए। लाल हिंसा में आम लोगों की मौतें भी सर्वाधिक झारखण्ड में ही हुई हैं। इस वर्ष की पहली छमाही में राज्य में 58 आम लोग नक्सलियों केे शिकार बने। यह संख्या देशभर में नक्सली हिंसा में मारे गये आम लोगों की संख्या 140 का 41.42 प्रतिशत है।
    सूचना का अधिकार के तहत केन्द्रीय गृह मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2003 से 2012 के बीच झारखण्ड में नक्सली हिंसा में 1275 नागरिक मारे गये और 328 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। इस अवधि में राज्य में 193 नक्सली मारे गये। देश में नक्सली हिंसा में प्रतिदिन औसतन एक से अधिक आम नागरिक मारे जा रहे हैं। 2003 से 2012 तक 10 वर्ष के दौरान लाल हिंसा में 8494 लोग मारे गये जिनमें 4952 आम लोग, 1840 सुरक्षाकर्मी व 1702 नक्सली थे। इस कोहराम के पीछे निश्चय ही असमान विकास का हाथ है। झारखण्ड में 72 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे है। 73 प्रतिशत महिलाएँ रक्ताल्पता से पीड़ित हैं और 52 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। पिछले 12 वर्षों में सरकार ने दर्जनों ऐसी योजनाओं को हरी झंडी दी है जो आदिवासियों को उन्हीं की जमीन से बेदखल और संविधान के तहत उनके हक के सारे प्रश्नों को हाशिये पर ढकेलती हैं। कॉरपोरेट, पैसे और योजनाओं में मुनाफे के खेल ने समूचे झारखण्ड को ही ताक पर रख दिया। वैसे झारखण्ड सरकार ने राज्य के नक्सलग्रस्त क्षेत्रों के सभी बेरोजगारों को तकनीकी व कौशल विकास प्रशिक्षण देने का निर्णय मई के दूसरे सप्ताह में लिया। यों लाल क्षेत्र सरयू में ‘सरयू विकास योजना’ चलायी जा रही है। ये पहल प्रशंसनीय हैं। ऐसी ही पहल लाल हिंसा को कम या खत्म का सकती हैं।

शनिवार, 24 अगस्त 2013

झारखंड को चाहिये विशेष दर्जा





-शीतांशु कुमार सहाय
    विश्व में सबसे आसान कार्य है किसी से कुछ मॉँगना, मॉँगकर वर्तमान को सुधारना व भविष्य को संवारना। पर, इससे भी आसान कार्य है एक! वह कार्य है अनसुना करना। कोई कितना भी आर्त्तनाद करे, मॉँग-पर-मॉँग रखे, चाहे उस मॉँग के पूरा न होने पर मॉँगने वाले की ऐसी-की-तैसी हो जाये पर अपनी ही मस्ती में मस्त रहना कितना आसान, कितना सुहाना लगता है! दरअसल, इन दिनों दोनों आसान कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है। पहले आसान कार्य को राज्य की सरकारें कर रही हैं। इसके ठीक विपरीत दूसरे आसान कार्य को केन्द्र सरकार, विशेषकर वर्तमान केन्द्र सरकार कुछ यों अंजाम दे रही है मानो उस पर उसका सर्वाधिकार हो। मतलब यह कि ओड़िशा, राजस्थान और बिहार के सुर-में-सुर मिलाकर झारखण्ड ने भी केन्द्र से मॉँग ही लिया विशेष राज्य का दर्जा। झारखण्ड के मुख्य मंत्री हेमन्त सोरेन ने सोचा कि केन्द्र में कॉँग्रेस नेतृत्व वाली सरकार उनकी मॉँग पर विचार करेगी; क्योंकि राज्य सरकार में कॉँग्रेस भी भागीदार है। इसलिये पहला कार्य करने में राज्य ने देरी नहीं की। तुरन्त ही केन्द्र ने दूसरा कार्य करते हुए झारखण्डी मॉँग को अनसुना कर दिया। लिहाजा जोर का झटका लगा हेमन्त को। राज्य में गलबंहिया करने वाले ने केन्द्र में कन्धे का सहारा न दिया। दो टूक बयान में केन्द्रीय योजना राज्यमंत्री राजीव शुक्ला ने वृहस्पतिवार को राज्य सभा में कहा कि झारखण्ड विशेष राज्य का दर्जा पाने का असल हकदार है ही नहीं।
    वास्तव में हाल के वर्षों में विशेष राज्य का दर्जा मॉँगने की परम्परा-सी चल पड़ी है। 11 राज्य पहले से विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त कर चुके हैं। ऐसे राज्यों को केंद्र से 90 प्रतिशत अनुदान मिलता है, विशेष योजना सहायता व विशेष केंद्रीय सहायता मिलती है। केंद्रीय योजनाओं में इनकी भागीदारी बहुत कम होती है। कुल केंद्रीय सहायता का 56.25 प्रतिशत 11 विशेष राज्यों को और शेष 43.75 प्रतिशत राशि शेष 17 राज्यों में बॉँटी जाती है। यही लाभ लेना चाहते थे हेमन्त मगर उस पर पानी फिर गया। शुक्ला ने वृहस्पतिवार को सरदार सुखदेव सिंह ढींढसा के प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्य सभा को यह जानकारी दी कि झारखंड, ओड़िशा व राजस्थान विशेष दर्जा प्राप्त करने हेतु पात्र नहीं हैं। शुक्ला के अनुसार, इस वर्ष जनवरी में झारखंड को और मई में ओड़िशा व राजस्थान को सूचित किया गया कि उन्हें विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिल सकता।
    इस बीच मुख्य मंत्री हेमन्त सोरेन ने केन्द्र सरकार से विशेष राज्य के लिए बनाये गये मापदंडों पर पुनर्विचार की गुहार लगायी है। यों केन्द्र ने स्वीकारा कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल सकता है। इस पड़ोसी राज्य के आवेदन पर केन्द्र में मंथन जारी है। वैसे सम्बद्ध कई शर्त्तों को झारखंड पूरा करता है। विशेष दर्जे का फैसला राष्ट्रीय विकास परिषद करता है। झारखण्ड लम्बे समय से विशेष राज्य का दर्जा मॉँग रहा है। पर, इसकी मॉँग अनसुनी की जा रही है। यों शुक्ला का बयान हेमन्त सहित पूर्व मुख्य मंत्री अर्जुन मुण्डा व पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो को नागवार गुजरा। जहॉँ तक आँकड़ों की बात है तो झारखण्डवासी अत्यन्त ही निर्धन हैं। विकास का पहिया घूम नहीं पा रहा है। ऐसे में राज्य व केन्द्र के बीच खिंचतान की भेंट चढ़ता जा रहा है विकास।
जानिए नई वेबसाइट से ट्रेनों का रनिंग स्टेटस और बहुत कुछ
KNOW RUNNING STATUS OF TRAINS AND MORE BY NEW WEBSITE

सेंटर फॉर रेलवे इन्फर्मेशन सिस्टम (क्रिस) ने रेल यात्रियों को खास तोहफा दिया है। रनिंग ट्रेनों का स्टेटस जानने के लिए क्रिस ने एक और वेबसाइट http://enquiry.indianrail.gov.in बनाई है। यह मौजूदा वेबसाइट www.trainenquiry.com से फास्ट तो है ही, इसके अलावा इस पर कई नई सुविधाएं भी हैं। नई साइट पर कैंसल्ड ट्रेनों, री-शेड्यूल्ड ट्रेनों से लेकर डायवर्ट ट्रेनों की भी जानकारी दी जा रही है। फिलहाल इस साइट का ट्रायल चल रहा है। आने वाले दिनों में इसे ओर बेहतर बनाने पर जोर दिया जाएगा। शटल ट्रेनों से सफर करने वाले दैनिक यात्रियों के लिए भी वेबसाइट http://enquiry.indianrail.gov.in खास है।
इस वेबसाइट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस पर यात्रियों को छोटी-छोटी जानकारी तक दी जा रही है। साइट पर रनिंग ट्रेन का स्टेटस जानने के लिए ट्रेन का नाम या नंबर डालने का ऑप्शन है। इसे डालते ही ट्रेन का टाइम टेबल सामने आ जाएगा। इसके बाद जिस स्टेशन से आप बैठना चाहते हैं, उस स्टेशन का नाम और तारीख चुननी है। आपके स्टेशन पर ट्रेन कितने बजे तक पहुंचेगी और ट्रेन ने फिलहाल कौन सा स्टेशन पार किया है, इसकी जानकारी आपके सामने होगी।
दूसरा ऑप्शन स्टेशन का दिया गया है। स्टेशन का नाम लिखते ही दो घंटे के भीतर स्टेशन पर पहुंचने वाली सभी ट्रेनों की जानकारी आ जाएगी। जिस ट्रेन में आप सफर करना चाहते हैं, उस ट्रेन पर क्लिक करते ही ट्रेन का रनिंग स्टेटस भी उपलब्ध हो जाएगा। तीसरा ऑप्शन स्टेशंस के बीच ट्रेन का आता है, जिसकी मदद से यह जानकारी ली जा सकती है कि दो स्टेशनों के बीच 24 घंटे में कितनी ट्रेन सर्विस हैं। उसके बाद कैंसल, री-शेड्यूल और डायवर्ट रूट से चल रही ट्रेनों की जानकारी के लिए ऑप्शंस दिए गए हैं।
यह वेबसाइट एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ट्रेनों के यात्रियों के लिए ही नहीं, शटल ट्रेनों से सफर करने वाले दैनिक यात्रियों के लिए भी खास है। इस पर शटल ट्रेनों का भी स्टेटस मिलेगा। खास बात यह कि शटल ट्रेन में कितने कोच हैं, इसकी भी जानकारी दी जा रही है, ताकि यात्री अपने कोच पोजिशन के मुताबिक प्लैटफॉर्म पर खड़े हो सकें। यह खास जानकारी क्रिस की मौजूदा वेबसाइट पर नहीं दी जा रही है। मौजूदा वेबसाइट पर भी नई वेबसाइट का लिंक दिया जा रहा है।

छिपा ही रहेगा नेताजी का राज


-शीतांशु कुमार सहाय
    कुछ राज ऐसे होते हैं जिन्हें बताने में कोई गुरेज नहीं पर कुछ राज ऐसे भी हैं जिन्हें नहीं बताया जा सकता, कभी नहीं! ऐसा ही राज है नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की कथित मौत से सम्बन्धित! इस राज पर से केन्द्र सरकार पर्दा नहीं उठाना चाहती। वह डरती है। सफाई देनी पड़ रही है सरकार को कि यदि ऐसा किया गया तो देश संकट में पड़ जाएगा, सम्प्रभुता खतरे में पड़ जाएगी। कई देशों से सम्बन्ध बिगड़ जाएंगे। सूचना का अधिकार (आरटीआइ) के एक आवेदन को खारिज करते हुए प्रधान मंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने कहा है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पत्नी एमिली शेंकल और बेटी अनीता बोस पर खुफिया संचिकाएँ सार्वजनिक नहीं की जा सकतीं। इसकी धमक शुक्रवार को राज्य सभा में महसूस की गयी। तृणमूल कॉँग्रेस के कुणाल कुमार घोष ने शून्यकाल में यह मामला उठाते हुए पीएमओ द्वारा आरटीआइ के तहत मॉँगी संचिकाओं की जानकारी न देने को आड़े हाथों लिया। उन्होंने प्रधान मंत्री और गृह मंत्री से पूछा कि यह जानकारी सार्वजनिक करने से दूसरे देशों के साथ भारत के सम्बन्ध किस प्रकार प्रभावित होंगे और यह देश की सम्प्रभुता के लिए भी किस तरह खतरा पैदा कर सकता है? उन्होंने मॉँग रखी कि सरकार को गोपनीय दस्तावेजों के बारे में स्पष्ट नीति बनानी चाहिये। इस तरह की नीति न होने के कारण आजादी की लड़ाई के नायक रहे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के अंतिम दिनों के बारे में लोगों को जानकारी नहीं है। विदित हो कि सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में अपनी सेक्रेटरी और आस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। उन दोनों की अनीता नाम की एक बेटी हुई जो वर्तमान में जर्मनी में सपरिवार रहती हैं।
    दरअसल, वेबसाइट डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट सुभाषचन्द्रबोस डॉट ओआरजी चलाने वाले तथा सुभाष चन्द्र बोस की जीवनी पर पुस्तक लिख रहे चन्द्रचूड़ घोष ने आरटीआइ के तहत सरकार को लिखे गये नेताजी की पत्नी और बेटी के पत्र तक पहुँच मॉँगी थी। पीएमओ ने अपने उत्तर में कहा कि सम्बन्धित 3 संचिकाएँ अति गोपनीय हैं और उनके दस्तावेजों को प्रकट करने से कुछ देशों के साथ सम्बन्ध प्रभावित होंगे। इस पर पीएमओ के निदेशक राजीव टोपनो का हस्ताक्षर है। उत्तर में कहा गया है कि आरटीआइ अधिनियम, 2005 की धारा 8(1-ए) व धारा 8(बी) के साथ ये प्रकटीकरण से मुक्त हैं। घोष ने कहा कि 1945 में लापता हुए नेताजी का जीवन और समय रहस्यमय है; क्योंकि उनसे जुड़ी अनेक संचिकाएँ विभिन्न सरकारी विभागों के पास हैं। इससे पहले दिल्ली की शोध संस्थान मिशन नेताजी की एक आरटीआइ अपील पर पीएमओ ने स्वीकार किया था कि उसके पास नेताजी की 33 गोपनीय संचिकाएँ हैं। इसके पूर्व अक्तूबर 2009 में चन्द्रचूड़ घोष द्वारा 34 महीने पूर्व आरटीआइ के तहत मॉँगी गयी एक सूचना पर मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला ने केन्द्रीय गृह मंत्रालय को आदेश दिया था कि नेताजी की मौत से जुड़ी जो भी जानकारियॉँ उसके पास हैं, उन्हें 20 कार्यदिवसों में सार्वजनिक करे। वास्तव में चन्द्रचूड़ ने नेताजी से जुड़ी जो जानकारियॉँ मुखर्जी आयोग ने जुटायी थीं, उन्हें सार्वजनिक करने की गुहार लगायी थी। पर, अब तक ऐसा नहीं हो पाया। यहॉँ यह जानना आवश्यक है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित मुखर्जी आयोग ने यह माना था कि नेताजी की मौत 1945 की विमान दुर्घटना में नहीं हुई। हालॉँकि संसद के दोनों सदनों ने मई 2006 में बहस के बाद इसे खारिज कर दिया था। मुखर्जी आयोग ने 14 नवंबर 2005 को रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी।
    यहॉँ जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वो यह कि 14 अगस्त 1947 की रात को ब्रिटिश सरकार की तरफ से लार्ड माउण्ट बेटन व भारत की तरफ से जवाहरलाल नेहरू ने समझौते के जिन बिन्दुओं पर हस्ताक्षर किये थे, उनके आधार पर नेताजी को राजद्रोही करार दिया गया। यह शर्मनाक है कि जिस व्यक्ति ने देश की स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया, अँग्रेजों के दाँत खट्टे किये, देश की सरकार ने उसे राजद्रोही करार दिया। उन्हें अब भी सरकारी तौर पर राजद्रोही ही माना जाता है। विदित हो कि ब्रिटेन नेताजी से हुए युद्ध को अपने तमाम युद्धों में सबसे घातक मानता है। वर्ष 1944 में इम्फाल और कोहिमा के नजदीक नेताजी के नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज और जापान की संयुक्त सेना को पीछे हटाने के लिए लेफ्टिनेंट जनरल विलियम स्लिम के नेतृत्व में ब्रिटेन की सेना को काफी संघर्ष करना पड़ा था। इसमें जापान व आजाद हिंद फौज के करीब 53 हजार सैनिक मारे गये और कई लापता हुए थे। इम्फाल में ब्रिटेन के 12,500 सैनिक हताहत हुए जबकि कोहिमा में अन्य 4 हजार सैनिक मारे गये थे। 1944 में इम्फाल की लड़ाई मार्च-जुलाई तक चली थी जबकि कोहिमा की लड़ाई अप्रैल में शुरू होकर जून में समाप्त हुई थी। लन्दन के चेल्सी स्थित नेशनल म्यूजियम में 20 अप्रैल 2013 को आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में 100 से अधिक हस्तियों ने इस युद्ध के पक्ष में मतदान किया। इसलिये ब्रिटेन को नेताजी नहीं सुहाते। वह कभी नहीं चाहेगा कि उनसे सम्बन्धित सच उजागर हो। सो विदेश से सम्बन्ध तो गड़बड़ हो ही सकता है। ...तो इशारों को अगर समझो राज को राज रहने दो!

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

लुट गया रुपया, हुआ 65 पार


    शीतांशु कुमार सहाय
    दरअसल, आर्थिक सुधारों का अभाव, बेलगाम भ्रष्टाचार, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी जैसे कुछ प्रमुख कारण हैं जिन्होंने भारत के रुपये को रसातल पर पहुँचा दिया। देश गहरे आर्थिक संकट में है, आर्थिक विकास का उभरता हुआ, बड़ा होता हुआ बुलबुला फोड़ दिया गया है। जब जुलाई में भारतीय मुद्रा रुपया अमेरिकी मुद्रा डॉलर के मुकाबले लुढ़ककर 60 रुपये प्रति डॉलर की दर से भी नीचे पहुँच गया था तब लगा कि उसके गिरने की यही अन्तिम सीमा है। पर, उसे और अधिक गिरना था और भारतीयों को और अधिक मनोवैज्ञानिक सदमे सहने थे। सो 16 अगस्त से अब तक के बीच वह 61.81 से गिरकर 65 रुपये प्रति डॉलर से भी कम मूल्य पर आ गया। ब्रिटेन की मुद्रा पाउण्ड के मुकाबले तो इसकी कीमत 100 से भी कम हो गयी है। एक समय था जब सरकार द्वारा रुपये का अवमूल्यन किया जाना बड़ा राजनीतिक व आर्थिक निर्णय माना जाता था। उस पर सरकार की स्थिरता निर्भर करती थी। बात अब वैसी नहीं रही। हर दिन रुपये का अवमूल्यन हो रहा है। उसे संभालने के प्रयत्नों के असर नहीं हो रहे हैं। जनवरी से अब तक रुपये का मूल्य 17 प्रतिशत गिरा। यों आयात महंगा होता जा रहा है, महंगाई बढ़ती जा रही है। मतलब यह कि रुपये के अवमूल्यन से सर्वाधिक हानि आम जनता को हो रही है। ऐसे में सरकार को कम ब्याज दर और रुपये की स्थिरता में से किसी एक को चुनना चाहिये। उसने दोनों को चुना। लिहाजा उसे मुँह की खानी पड़ी। सरकार को व्यापार, वित्त व खाता उदारीकरण के क्षेत्र में आर्थिक सुधारों की दिशा को विपरीत घुमाने वाले नीतिगत निर्णयों को वापस लेना होगा। पर, आर्थिक नीति के क्षेत्र में विचारों के अभाव की स्थिति यह है कि पिछले सप्ताह विदेशी मुद्रा के बाहर जाने को रोकने के लिए सरकार ने 71 वर्ष बाद ऐसे नियन्त्रण लगाये जिन्हें द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश सरकार ने लगाये थे। इससे मुद्रा बाजार में गलत संकेत गया और रुपये के लुढ़कने की गति तेज हो गयी। विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार पूँजी निकासी से बाजार पस्त है। हालाँकि ब्राजील के रियाल और अर्जेंटीना के पीसो का भी ऐसा ही हाल है। वैसे वृहस्पतिवार को रिजर्व बैंक के 8000 करोड़ रुपये के बॉण्ड खरीदने से रुपये की गिरावट कुछ समय के लिए रूकी मगर दोपहर बाद पुनः रुपया लुढ़कने लगा। यों प्रतिभूतियों की बिकवाली बढ़ने से सेंसेक्स व निफ्टी में भी सुधार हुआ जिसे स्थाई नहीं कहा जा सकता।
    इस बीच देश आर्थिक रूप से बदहाल होता जा रहा है। यदि शीघ्र ही रुपये की ढलान को रोका नहीं गया तो हालात वर्ष 1991 जैसे हो सकते हैं। अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री की ‘आर्थिक सूझ-बूझ’ अब निशाने पर है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद व पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री यशवन्त सिन्हा का कहना है कि सरकार की साख ही खत्म हो गयी है। देश की अर्थव्यवस्था उसके नियन्त्रण से बाहर जा रही है, वह कोई उपाय करने में असमर्थ है। तभी तो बुधवार को डॉयचे बैंक की रिपोर्ट कि रुपया एक-दो महीने में 70 के पार जा सकता है, पर विश्वास होने लगा है। हालाँकि मनमोहन सिंह वर्तमान आर्थिक संकट का कारण अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति को बता रहे हैं। यह तर्क गले नहीं उतरता; क्योंकि विश्व अर्थव्यवस्था संकट से उबर चुकी है और उसमें उछाल दीख रहा है। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास दर गिरकर अब केवल 5 प्रतिशत के निकट है। उसके 6 प्रतिशत तक पहुँचने के कोई आसार नहीं हैं। ऐसे में मुद्रा बाजार की आवाज को सुनने के बजाय भारतीय रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय ने उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। चालू खाते में घाटा बहुत अधिक है, ऊपर से रुपये की परिसम्पत्तियों को खरीदने में लोगों की दिलचस्पी कम हो गयी; क्योंकि सरकार अनेक तरह के नियन्त्रणों से रुपये की कीमत को स्थिर रखने की नाकाम कोशिश में लगी थी और लगी है। लोगों के लिए मुद्रा बाजार के जोखिम को कम करने के रास्ते बन्द हो गये हैं। नतीजतन वित्तीय बाजार के उदारीकरण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता संदिग्ध हो गयी। वैसे रुपये का लुढ़कना रोग नहीं, रोग का लक्षण है। जब तक इसका निदान नहीं होगा, लक्षण बार-बार प्रकट होंगे और अर्थव्यवस्था स्वस्थ नहीं रहेगी।
न बीवी न बच्चा, न बाप बड़ा न मइया, द होल थिंग इज दैट कि भइया सबसे बड़ा रुपइया..... महमूद की फिल्म ‘सबसे बड़ा रुपइया’ का यह गाना वर्ष 1976 में सबकी जुबान पर था जब एक डॉलर की तुलना में रुपया 8.50 के लगभग था। आज यह 65 रुपये को पार कर गया है। भारतीय मुद्रा में लगातार गिरावट जारी है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। यों केन्द्र की काँग्रेस नेतृत्व वाली सरकार लगातार स्थिति संभालने का आश्वासन दे रही है मगर रुपया उबर नहीं पा रहा। कुछ दिनों पहले ही प्रधान मंत्री ने रिजर्व बैंक के वर्तमान व भावी गवर्नर के साथ एक महत्त्वपूर्ण बैठक कर देशवासियों को बताया कि उनपर भरोसा रखें, वे स्थिति को संभाल लेंगे। पर, कुछ भी संभलता हुआ नहीं दीख रहा। उनके आश्वासन के अगले ही दिन रुपया और लुढ़क गया और लुढ़कता ही जा रहा है। प्रधान मंत्री स्वयं अर्थशास्त्री हैं और रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रह चुके हैं। ऐसे में लगता है कि कोई ‘शक्ति’ उन्हें रुपये को संभालने से रोक रही है! यदि ऐसा है तो उसका पर्दाफाश होना चाहिये।
विकीलीक्स से 160 गुना बड़ा पर्दाफाश : टैक्स चोरों के नए ठिकाने
प्रस्तुति- शीतांशु कुमार सहाय


स्विट्जरलैंड और लिश्टेनश्टाइन जैसे छोटे देशों में टैक्स चोरों के पैसे होने की बात पुरानी. वर्जिन आइलैंड, समोआ और ऐसे छोटे द्वीप अब इनके नए पनाहगाह बन रहे हैं. खोजी पत्रकारों ने भारतीयों सहित कई रईसों का पर्दाफाश किया है. भारत की अर्थव्यवस्था का 17 से 42 फीसदी हिस्सा काले धन के रूप में है, जिसका रिकॉर्ड सरकार के पास नहीं है. इस साल के बजट में भारत सरकार ने एलान किया कि देश में सिर्फ 42,800 लोगों की सालाना आमदनी एक करोड़ रुपये से ज्यादा है. हालांकि दिल्ली के कई इलाके हैं, जहां सिर्फ एक घर की कीमत 10 करोड़ रुपये से ज्यादा होती है. लगभग सवा अरब की आबादी वाले भारत में सिर्फ तीन फीसदी लोग आय कर देते हैं यानी चार करोड़ लोग से कम.
भारत के धनी सांसद और शराब कारोबारी विजय माल्या का नाम भी टैक्स चोरों में शामिल है. उनके अलावा सांसद विवेकानंद गद्दाम सहित 612 भारतीय हैं. लेकिन यह पूरा तंत्र व्यापक रूप में फैला है, जिसमें 170 देशों के कच्चे चिट्ठे को उजागर किया गया है.
यह अपनी तरह का पहला खुलासा है, जिसमें दुनिया भर के खोजी पत्रकारों ने हिस्सा लिया. अमेरिका की खोजी पत्रकारिता की संस्था आईसीआईजे ने इस मुहिम को पूरा करने में सवा साल का वक्त लिया. इसमें नामी गिरामी नेताओं के अलावा महंगी कारों पर सवार होने वाले अमीर लोग भी हैं.
जिन भारतीयों का नाम आया है, उन पर आय कर और भारतीय रिजर्व बैंक के अलावा सीबीआई के मामले बन सकते हैं. जर्मन सरकार ने इस खोजी मुहिम में शामिल सभी पत्रकारों से अपील की है कि वे अपने दस्तावेज सरकारों को सौंपें ताकि टैक्सचोरों पर कार्रवाई हो सके.
पत्रकारों ने जो दस्तावेज जमा किए हैं, उनमें 25 लाख खुफिया फाइलें हैं, जिन्हें जमा करने के लिए कंप्यूटर में 260 गीगाबाइट स्पेस की जरूरत होगी. विकीलीक्स ने 2010 में जो खुलासे किए थे, यह उससे करीब 160 गुना ज्यादा बड़ा है.
इस अभियान में दुनिया भर के 38 देशों ने हिस्सा लिया, जिनमें वॉशिंगटन पोस्ट, गार्डियन और बीबीसी के अलावा भारतीय हिस्सेदारी के रूप में इंडियन एक्सप्रेस शामिल था. एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि खुफिया दस्तावेजों में उन रकमों का जिक्र है, जो ट्रांसफर किए गए. इसमें कंपनियों के बीच का गड़बड़झाला भी बताया गया है.
जिस तरह भारत में एयरलाइन के लिए पैसे नहीं जुटा पाने वाले विजय माल्या के काले पैसे का जिक्र है, उसी तरह दीवालिया हो रहे यूरोपीय देश ग्रीस के लोगों का भी गैरकानूनी पैसा इन जगहों पर जमा है. खुलासे के बाद ग्रीक सरकार ने कहा है कि वह 100 से ज्यादा बैंक खातों की पड़ताल करेगी. अंतरराष्ट्रीय खुलासे में लगभग सवा लाख खातों का जिक्र है.
जांच में पता चला है कि ये लोग सिंगापुर की पोर्टकुलिस ट्रस्टनेट और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड की कॉमनवेल्थ ट्रस्ट लिमिटेड की मदद से दूसरे देशों में फर्जी कंपनियां बनाते थे, जिसके बाद फर्जी बैंक खाते खोले जाते थे. इन खातों तक पहुंच पाना बहुत मुश्किल है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि हर साल दुनिया भर में 1000 अरब से 1600 अरब डॉलर का गैरकानूनी लेन देन होता है.
एक अनुमान के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था का 17 से 42 फीसदी हिस्सा काले धन के रूप में है, जिसका रिकॉर्ड सरकार के पास नहीं है. आरोप हैं कि ये पैसे जाने माने रईसों का है, जो स्विट्जरलैंड और दूसरे देशों में फर्जी नामों से बैंक खाता रखते हैं. कई गैरसरकारी संगठन इस पैसे को देश लाने का दबाव बनाते रहे हैं.
इस साल के बजट में भारत सरकार ने एलान किया कि देश में सिर्फ 42,800 लोगों की सालाना आमदनी एक करोड़ रुपये से ज्यादा है. हालांकि दिल्ली के कई इलाके हैं, जहां सिर्फ एक घर की कीमत 10 करोड़ रुपये से ज्यादा होती है. लगभग सवा अरब की आबादी वाले भारत में सिर्फ तीन फीसदी लोग आय कर देते हैं यानी चार करोड़ लोग से कम. (dw.de)

सोमवार, 19 अगस्त 2013

भगत ‘शहीद’ नहीं, गाँधी ‘राष्ट्रपिता’ नहीं

शीतांशु कुमार सहाय
उसे यह फिक्र है हरदम, नया तर्ज-ए-जफा क्या है?
हमें यह शौक देखें, सितम की इन्तहां क्या है?

    गजल की इन पंक्तियों को महान स्वतन्त्रता सेनानी भगत सिंह ने तब लिखा था जब उन्हें अँग्रेजों के सितम की इन्तहां देखनी थी। अब उनकी रुह देख रही है भारत सरकार के ‘जुल्म’ की इन्तहां! जिस देश की आजादी के लिए वे मात्र 23 वर्ष की अवस्था में हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ गये, उन्हें देश की सरकार आजादी के 67 वर्ष बाद भी ‘शहीद’ का तमगा न दे सकी। देश के लिए मर-मिटने वालों के लिए इससे बड़ा सितम हो ही नहीं सकता! उन्होंने विवाह नहीं किया था पर उनके भाई के पौत्र यादवेन्द्र सिंह ने सूचना का अधिकार के तहत केन्द्र सरकार से जानना चाहा कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को कब शहीद का दर्जा दिया गया था। मई में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने जवाब दिया कि कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं है कि इन तीनों को कब शहीद का दर्जा दिया गया। स्वाधीनता सेनानियों की बेइज्जती का यह पहला उदाहरण नहीं है। पिछले वर्ष सूचना का अधिकार के तहत ही केन्द्र सरकार ने कहा था कि महात्मा गाँधी को सरकार ने ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा नहीं दिया है। मनमोहन सिंह की काँग्रेसी सरकार ने यहाँ तक कहा कि गाँधी को ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा दिया भी नहीं जा सकता। विश्वास हो या न हो पर यही सच है।
    पिछले वर्ष जब केन्द्र सरकार ने कहा कि महात्मा गाँधी राष्ट्रपिता नहीं हैं तो पूरा देश हतप्रभ रह गया था। लखनऊ की 11वीं कक्षा की छात्रा ऐश्वर्या पराशर द्वारा माँगी गयी सूचना पर सरकार ने उपर्युत जवाब दिया तो ऐयवर्या ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा कि गाँधी को राष्ट्रपिता घोषित करने के लिए अधिसूचना जारी करें। तब केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने कहा कि संविधान में ऐसी व्यवस्था नहीं है कि सरकार गाँधी को राष्ट्रपिता की उपाधि दे सके। यह सच है कि संविधान की धारा 8(1) के तहत शैक्षणिक व सैन्य एपाधियों के अलावा कोई अन्य उपाधि देने की इजाजत सरकार को नहीं है। जब सांसदों की सुविधा बढ़ानी हो तो तुरन्त कानून बन जाता है, सरकार आफत में पड़े तो संविधान संशोधित हो जाता है। पर, गाँधी को राष्ट्रपिता की उपाधि देने के लिए संविधान में संशोधन नहीं हो सकता। आश्चर्य है कि विपक्षियों ने भी बापू को राष्ट्रपिता की उपाधि से नवाजे जाने के लिए आवाज नहीं उठायी! गाँधी की तरह का हश्र सरकार ने भगत सिंह के साथ भी किया। भगत सिंह के भतीजे बाबर सिंह, राजगुरु और सुखदेव को सरकार ने शहीद घोषित नहीं किया है तो देशवासियों को पिछले वर्ष की तरह ही झाटका लगा। शें गृह मंत्रालय के बचाव में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह उतरे। उन्होंने शनिवार को कहा कि भगत सिंह किसी सरकारी रिकॉर्ड के मोहताज नहीं हैं। राज्यसभा में विभिन्न दलों के सदस्यों की आपत्ति पर संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ला ने सफाई दी कि सरकार उन्हें शहीद मानती है और सरकारी रिकॉर्ड में सुधार किया जाएगा।
    यों राज्यसभा में जदयू सदस्य केसी त्यागी ने चर्चित नेता राजनारायण का नाम स्वतन्त्रता सेनानियों की सूची में नहीं होने का भी जिक्र किया। राजनारायण के त्याग को सरकार इसलिए भूली कि वे 1977 के काँग्रेस विरोधी आन्दोलन में प्रमुख राजनीतिक हस्ती थे। यहाँ यह भी जानिये कि जब जवाहर लाल नेहरू ने 14 अगस्त 1947 की रात को 1935 के अधिनियम की लाचारगी स्वीकारने वाले स्वाधीनता के बिन्देओं पर हस्ताक्षर किया तो गाँधी ने विरोध जताया था। प्रथम स्वाधीनता दिवस के दिन दिल्ली के जश्न में शामिल न होकर नोआखाली में थे गाँधी और वहीं से विज्ञप्ति जारी की कि जो कथित आजादी आ रही है उसे उन्होंने नहीं लाया; बल्कि सत्ता के लालचियों ने लाया है। इसी खिलाफत की सजा काँग्रेस ने महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता की उपाधि न देकर दी है। यही नहीं महात्मा गाँधी के खून से सनी घास एवं मिट्टी, उनका चश्मा और चरखा सहित उनसे जुड़ी 29 वस्तुएँ ब्रिटेन में नीलाम हो गयीं और मनमोहन सरकार देखती रही। विदित हो कि 2008 में जब अम्बिका सोनी केन्द्रीय संस्कृति मंत्री थीं तो भगत सिंह के गाँव नवांशहर से उनके सम्मान में 2 सिक्के जारी किये थे जिन पर भगत सिंह का जिक्र था। साथ ही नवांशहर का नाम ‘शहीद भगत सिंह नगर’ रखा गया। पर, यह अनिश्चय के गर्त्त में ही है कि महात्मा गाँधी, भगत सिंह, राजगुरुस सुखदेव व राजनारायण पर उचित निर्णय लिया जाएगा या नहीं। अन्त में भगत सिंह की उसी गजल के दूसरे पायदान को याद करते हैं-
दहर से क्यों खफा रहें, चर्ख का क्यों गिला करें।
सारा जहां अदू (शत्रु) सही, आओ मुकाबला करें।

बुधवार, 14 अगस्त 2013

ये भी है स्वतन्त्रता की सच्ची कहानी / TRUE STORY OF INDIAN FREEDOM


प्रस्तुति- शीतांशु कुमार सहाय / SHEETANSHU KUMAR SAHAY

मेरे प्रिय मित्रों, इसे ध्यानपूर्वक पढ़ें-

1. 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन को ब्रिटिश सरकार कुछ ही हफ्तों में कुचल कर रख देती है।
2. 1945 में ब्रिटेन विश्वयुद्ध में ‘विजयी’ देश के रुप में उभरता है।
3. ब्रिटेन न केवल इम्फाल-कोहिमा सीमा पर आजाद हिन्द फौज को पराजित करता है, बल्कि जापानी सेना को बर्मा से भी निकाल बाहर करता है।
4. इतना ही नहीं, ब्रिटेन और भी आगे बढ़कर सिंगापुर तक को वापस अपने कब्जे में लेता है।
5. जाहिर है, इतना खून-पसीना ब्रिटेन ‘भारत को आजाद करने’ के लिए तो नहीं ही बहा रहा है। अर्थात् उसका भारत से लेकर सिंगापुर तक अभी जमे रहने का इरादा है।
6. फिर 1945 से 1946 के बीच ऐसा कौन-सा चमत्कार होता है कि ब्रिटेन हड़बड़ी में भारत छोड़ने का निर्णय ले लेता है?
       हमारे शिक्षण संस्थानों में आधुनिक भारत का जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसके पन्नों में सम्भवतः इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा। हम अपनी ओर से भी इसका उत्तर जानने की कोशिश नहीं करते- क्योंकि हम बचपन से ही सुनते आये हैं- दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल। इससे आगे हम और कुछ जानना नहीं चाहते।
(प्रसंगवश- 1922 में असहयोग आन्दोलन को जारी रखने पर जो आजादी मिलती, उसका पूरा श्रेय गाँधीजी को जाता। मगर “चौरी-चौरा” में ‘हिंसा’ होते ही उन्होंने अपना ‘अहिंसात्मक’ आन्दोलन वापस ले लिया, जबकि उस वक्त अँग्रेज घुटने टेकने ही वाले थे! दरअसल गाँधीजी ‘सिद्धान्त’ व ‘व्यवहार’ में अन्तर नहीं रखने वाले महापुरूष हैं, इसलिए उन्होंने यह फैसला लिया। हालाँकि एक दूसरा रास्ता भी था- कि गाँधीजी ‘स्वयं अपने आप को’ इस आन्दोलन से अलग करते हुए इसकी कमान किसी और को सौंप देते। मगर यहाँ ‘अहिंसा का सिद्धान्त’ भारी पड़ जाता है- ‘देश की आजादी’ पर।)
       यहाँ हम 1945-46 के घटनाक्रमों पर एक निगाह डालेंगे और उस ‘चमत्कार’ का पता लगायेंगे, जिसके कारण और भी सैकड़ों वर्षों तक भारत में जमे रहने की ईच्छा रखने वाले अँग्रेजों को जल्दीबाजी में फैसला बदलकर भारत से जाना पड़ा।
(प्रसंगवश- जरा अँग्रेजों द्वारा भारत में किये गये ‘निर्माणों’ पर नजर डालें- दिल्ली के ‘संसद भवन’ से लेकर अण्डमान के ‘सेल्यूलर जेल’ तक- हर निर्माण 500 से 1000 वर्षों तक कायम रहने एवं इस्तेमाल में लाये जाने के काबिल है!)
       ***
लालकिले के कोर्ट-मार्शल के खिलाफ देश के नागरिकों ने जो उग्र प्रदर्शन किये, उससे साबित हो गया कि जनता की सहानुभूति आजाद हिन्द सैनिकों के साथ है।
इस पर भारतीय सेना के जवान दुविधा में पड़ जाते हैं।
फटी वर्दी पहने, आधा पेट भोजन किये, बुखार से तपते, बैलगाड़ियों में सामान ढोते और मामूली बन्दूक हाथों में लिये बहादूरी के साथ “भारत माँ की आजादी के लिए” लड़ने वाले आजाद हिन्द सैनिकों को हराकर एवं बन्दी बनाकर लाने वाले ये भारतीय जवान ही तो थे, जो “महान ब्रिटिश सम्राज्यवाद की रक्षा के लिए” लड़ रहे थे! अगर ये जवान सही थे, तो देश की जनता गलत है; और अगर देश की जनता सही है, तो फिर ये जवान गलत थे! दोनों ही सही नहीं हो सकते।
सेना के भारतीय जवानों की इस दुविधा ने आत्मग्लानि का रुप लिया, फिर अपराधबोध का और फिर यह सब कुछ बगावत के लावे के रुप में फूटकर बाहर आने लगा।
फरवरी 1946 में, जबकि लालकिले में मुकदमा चल ही रहा था, रॉयल इण्डियन नेवी की एक हड़ताल बगावत में रुपान्तरित हो जाती है।* कराची से मुम्बई तक और विशाखापत्तनम से कोलकाता तक जलजहाजों को आग के हवाले कर दिया जाता है। देश भर में भारतीय जवान ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर देते हैं। मद्रास और पुणे में तो खुली बगावत होती है। इसके बाद जबलपुर में बगावत होती है, जिसे दो हफ्तों में दबाया जा सका। 45 का कोर्ट-मार्शल करना पड़ता है।
यानि लालकिले में चल रहा आजाद हिन्द सैनिकों का कोर्ट-मार्शल देश के सभी नागरिकों को तो उद्वेलित करता ही है, सेना के भारतीय जवानों की प्रसिद्ध “राजभक्ति” की नींव को भी हिला कर रख देता है।
जबकि भारत में ब्रिटिश राज की रीढ़ सेना की यह “राजभक्ति” ही है!
***
बिल्कुल इसी चीज की कल्पना नेताजी ने की थी. जब (मार्च’44 में) वे आजाद हिन्द सेना लेकर इम्फाल-कोहिमा सीमा पर पहुँचे थे। उनका आह्वान था- जैसे ही भारत की मुक्ति सेना भारत की सीमा पर पहुँचे, देश के अन्दर भारतीय नागरिक आन्दोलित हो जायें और ब्रिटिश सेना के भारतीय जवान बगावत कर दें।
इतना तो नेताजी भी जानते होंगे कि-
1. सिर्फ तीस-चालीस हजार सैनिकों की एक सेना के बल पर दिल्ली तक नहीं पहुँचा जा सकता, और
2. जापानी सेना की ‘पहली’ मंशा है- अमेरिका द्वारा बनवायी जा रही (आसाम तथा बर्मा के जंगलों से होते हुए चीन तक जानेवाली) ‘लीडो रोड’ को नष्ट करना; भारत की आजादी उसकी ‘दूसरी’ मंशा है।
ऐसे में, नेताजी को अगर भरोसा था, तो भारत के अन्दर ‘नागरिकों के आन्दोलन’ एवं ‘सैनिकों की बगावत’ पर। ...मगर दुर्भाग्य, कि उस वक्त देश में न आन्दोलन हुआ और न ही बगावत।
इसके भी कारण हैं।
पहला कारण, सरकार ने प्रेस पर पाबन्दी लगा दी थी और यह प्रचार (प्रोपागण्डा) फैलाया था कि जापानियों ने भारत पर आक्रमण किया है। सो, सेना के ज्यादातर भारतीय जवानों की यही धारणा थी।
दूसरा कारण, फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, अतः आम जनता के बीच इस बात का प्रचार नहीं हो सका कि इम्फाल-कोहिमा सीमा पर जापानी सैनिक नेताजी के नेतृत्व में युद्ध कर रहे हैं।
तीसरा कारण, भारतीय जवानों का मनोबल बनाये रखने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नामी-गिरामी भारतीयों को सेना में कमीशन देना शुरु कर दिया था। इस क्रम में महान हिन्दी लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सयायन 'अज्ञेय' भी 1943 से 46 तक सेना में रहे और वे ब्रिटिश सेना की ओर से भारतीय जवानों का मनोबल बढ़ाने सीमा पर पहुँचे थे। (ऐसे और भी भारतीय रहे होंगे।)
चौथा कारण, भारत का प्रभावशाली राजनीतिक दल काँग्रेस पार्टी गाँधीजी की ‘अहिंसा’ के रास्ते आजादी पाने का हिमायती था, उसने नेताजी के समर्थन में जनता को लेकर कोई आन्दोलन शुरु नहीं किया। (ब्रिटिश सेना में बगावत की तो खैर काँग्रेस पार्टी कल्पना ही नहीं कर सकती थी!- ऐसी कल्पना नेताजी-जैसे तेजस्वी नायक के बस की बात है। ...जबकि दुनिया जानती थी कि इन “भारतीय जवानों” की “राजभक्ति” के बल पर ही अँग्रेज न केवल भारत पर, बल्कि आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं।)
पाँचवे कारण के रुप में प्रसंगवश यह भी जान लिया जाय कि भारत के दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक दल भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश सरकार का साथ देते हुए आजाद हिन्द फौज को जापान की 'कठपुतली सेना' (पपेट आर्मी) घोषित कर रखा था। नेताजी के लिए भी अशोभनीय शब्द तथा कार्टून का इस्तेमाल उन्होंने किया था।
***
खैर, जो आन्दोलन एवं बगावत 1944 में नहीं हुआ, वह डेढ़-दो साल बाद होता है और लन्दन में राजमुकुट यह महसूस करता है कि भारतीय सैनिकों की जिस “राजभक्ति” के बल पर वे आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं, उस “राजभक्ति” का क्षरण शुरू हो गया है... और अब भारत से अँग्रेजों के निकल आने में ही भलाई है।
वर्ना जिस प्रकार शाही भारतीय नौसेना के सैनिकों ने बन्दरगाहों पर खड़े जहाजों में आग लगाई है, उससे तो अँग्रेजों का भारत से सकुशल निकल पाना ही एक दिन असम्भव हो जायेगा... और भारत में रह रहे सारे अँग्रेज एक दिन मौत के घाट उतार दिये जायेंगे।
लन्दन में ‘सत्ता-हस्तांतरण’ की योजना बनती है। भारत को तीन भौगोलिक तथा दो धार्मिक हिस्सों में बाँटकर इसे सदा के लिए शारीरिक-मानसिक रूप से अपाहिज बनाने की कुटिल चाल चली जाती है। और भी बहुत-सी शर्तें अँग्रेज जाते-जाते भारतीयों पर लादना चाहते हैं। (ऐसी ही एक शर्त के अनुसार रेलवे का एक कर्मचारी आज तक वेतन ले रहा है, जबकि उसका पोता पेन्शन पाता है!) इनके लिए जरूरी है कि सामने वाले पक्ष को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाया जाय। 

नेहरू को एडविना प्रेमपाश में बाँधने में सफल रहती है

लेडी एडविना माउण्टबेटन के चरित्र को देखते हुए बर्मा के गवर्नर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का अन्तिम वायसराय बनाने का निर्णय लिया जाता है- लॉर्ड वावेल के स्थान पर। एटली की यह चाल काम कर जाती है। विधुर नेहरूजी को लेडी एडविना अपने प्रेमपाश में बाँधने में सफल रहती हैं और लॉर्ड माउण्टबेटन के लिए उनसे शर्तें मनवाना आसान हो जाता है!
(लेखकद्वय लैरी कॉलिन्स और डोमेनिक लेपियरे द्वारा भारत की आजादी पर रचित प्रसिद्ध पुस्तक “फ्रीडम एट मिडनाईट” में एटली की इस चाल को रेखांकित किया गया है।)

नेहरू-एडविना

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बचपन से ही हमारे दिमाग में यह धारणा बैठा दी गयी है कि ‘गाँधीजी की अहिंसात्मक नीतियों से’ हमें आजादी मिली है। इस धारणा को पोंछकर दूसरी धारणा दिमाग में बैठाना कि ‘नेताजी और आजाद हिन्द फौज की सैन्य गतिविधियों के कारण’ हमें आजादी मिली- जरा मुश्किल काम है। अतः नीचे खुद अँग्रेजों के ही नजरिये पर आधारित कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिन्हें याद रखने पर शायद नयी धारणा को दिमाग में बैठाने में मदद मिले-
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सबसे पहले, माईकल एडवर्ड के शब्दों में ब्रिटिश राज के अन्तिम दिनों का आकलन :
“भारत सरकार ने आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चलाकर भारतीय सेना के मनोबल को मजबूत बनाने की आशा की थी। इसने उल्टे अशांति पैदा कर दी- जवानों के मन में कुछ-कुछ शर्मिन्दगी पैदा होने लगी कि उन्होंने ब्रिटिश का साथ दिया। अगर बोस और उनके आदमी सही थे- जैसाकि सारे देश ने माना कि वे सही थे भी- तो भारतीय सेना के भारतीय जरूर गलत थे। भारत सरकार को धीरे-धीरे यह दीखने लगा कि ब्रिटिश राज की रीढ़- भारतीय सेना- अब भरोसे के लायक नहीं रही। सुभाष बोस का भूत, हैमलेट के पिता की तरह, लालकिले (जहाँ आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चला) के कंगूरों पर चलने-फिरने लगा, और उनकी अचानक विराट बन गयी छवि ने उन बैठकों को बुरी तरह भयाक्रान्त कर दिया, जिनसे आजादी का रास्ता प्रशस्त होना था।”
***
अब देखें कि ब्रिटिश संसद में जब विपक्षी सदस्य प्रश्न पूछते हैं कि ब्रिटेन भारत को क्यों छोड़ रहा है, तब प्रधानमंत्री एटली क्या जवाब देते हैं।
प्रधानमंत्री एटली का जवाब दो विन्दुओं में आता है कि आखिर क्यों ब्रिटेन भारत को छोड़ रहा है-
1. भारतीय मर्सिनरी (पैसों के बदले काम करने वाली- पेशेवर) सेना ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति वफादार नहीं रही, और
2. इंग्लैण्ड इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी (खुद की) सेना को इतने बड़े पैमाने पर संगठित एवं सुसज्जित कर सके कि वह भारत पर नियंत्रण रख सके।
***
यही लॉर्ड एटली 1956 में जब भारत यात्रा पर आते हैं, तब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल निवास में दो दिनों के लिए ठहरते हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस पी.बी. चक्रवर्ती कार्यवाहक राज्यपाल हैं। वे लिखते हैं:
“... उनसे मेरी उन वास्तविक विन्दुओं पर लम्बी बातचीत होती है, जिनके चलते अँग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। मेरा उनसे सीधा प्रश्न था कि गाँधीजी का "भारत छोड़ो” आन्दोलन कुछ समय पहले ही दबा दिया गया था और 1947 में ऐसी कोई मजबूर करने वाली स्थिति पैदा नहीं हुई थी, जो अँग्रेजों को जल्दीबाजी में भारत छोड़ने को विवश करे, फिर उन्हें क्यों (भारत) छोड़ना पड़ा? उत्तर में एटली कई कारण गिनाते हैं, जिनमें प्रमुख है नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरुप भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों में आया ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में क्षरण। वार्तालाप के अन्त में मैंने एटली से पूछा कि अँग्रेजों के भारत छोड़ने के निर्णय के पीछे गाँधीजी का कहाँ तक प्रभाव रहा? यह प्रश्न सुनकर एटली के होंठ हिकारत भरी मुस्कान से संकुचित हो गये जब वे धीरे से इन शब्दों को चबाते हुए बोले, “न्यू-न-त-म!” ”
(श्री चक्रवर्ती ने इस बातचीत का जिक्र उस पत्र में किया है, जो उन्होंने आर.सी. मजूमदार की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑव बेंगाल’ के प्रकाशक को लिखा था।)
***

यह कहा जा सकता है :-

1. अँग्रेजों के भारत छोड़ने के हालाँकि कई कारण थे, मगर प्रमुख कारण यह था कि भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों के मन में ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में कमी आ गयी थी और- बिना राजभक्त भारतीय सैनिकों के- सिर्फ अँग्रेज सैनिकों के बल पर सारे भारत को नियंत्रित करना ब्रिटेन के लिए सम्भव नहीं था।
2. सैनिकों के मन में राजभक्ति में जो कमी आयी थी, उसके कारण थे- नेताजी का सैन्य अभियान, लालकिले में चला आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा और इन सैनिकों के प्रति भारतीय जनता की सहानुभूति।
3. अँग्रेजों के भारत छोड़कर जाने के पीछे गाँधीजी या काँग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों का योगदान नहीं के बराबर रहा।  सो, अगली बार आप भी ‘दे दी हमें आजादी ...’ वाला गीत गाने से पहले जरा पुनर्विचार कर लीजियेगा। (साभार)

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ Indian Independence Act, 1947


भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम १९४७ के अन्तर्गत अंग्रेजों ने हमें कहा कि अब वे भारत को 2 भागों में बाँटेंगे- भारत और पाकिस्तान। यों दोनों देशों को कथित आजादी मिली।
भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम १९४७ की भूमिका में भूमिका में लिखा है-  "An Act to make provision for the setting up in India of two independent Dominions, to substitute other provisions for certain provisions of the Government of India Act, 1935, which apply outside those Dominions, and to provide for, other matters consequential on or connected with the setting up of those Dominions". इसमें Dominion शब्द का प्रयोग किया अब कोइ भी मेरा मित्र ये जाँच ले कि Dominion का अर्थ होता क्या है।

स्वाधीनता दिवस 2013 की आपको हार्दिक बधाई!

प्रस्तुति- शीतांशु कुमार सहाय

1  आओ झुक कर सलाम करें उनको;
जिनके हिस्से में ये मुकाम आता है;
खुशनसीब होता है वो खून;
जो देश के काम आता है!
2  दिल से मर कर भी ना निकलेगी वतन की उल्फत;
मेरी मिटटी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी।

3  आओ देश का सम्मान करें शहीदों की कुर्बानियां याद करें;
एक बार फिर थामें हम युवा देश की की कमान;
आओ स्वतन्त्रता दिवस का करें सम्मान;
4  आज़ादी की कभी शाम ना होने देंगे;
शहीदों की कुर्बानी बदनाम ना होने देंगे;
बची हो जब तक एक भी बूंद लहू की रगों में;
तब तक भारत माता का आँचल नीलाम ना होने देंगे;
वन्दे मातरम!

5  यूनान-ओ-मिस्र-ओ रोमा सब मिट गए जहां से;
अब तक मगर है बाकि नाम-ओ-निशाँ हमारा;
कुछ बात है की हस्तीम मिटती नहीं हमारी;
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा;
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

6  मिलते नहीं जो हक वो लिए जाते हैं;
हैं आज़ाद हम पर गुलाम किये जाते हैं;
उन सिपाहियों को शत-शत नमन करो;
मौत के साए में जो जिए जाते हैं।
7  वतन हमारा मिसाल मोहब्बत की;
तोड़ता है, दीवार नफरत की;
मेरी खुशनसीबी है, मिली ज़िन्दगी इस चमन में;
भुला न सके कोई खुशबु इसकी सातो जनम में!
8  अब तक जिसका खून न खौला;
वो खून नहीं, वो पानी है;  जो देश के काम ना आये;
वो बेकार की जवानी है!
9  बात हवायों को बताये रखना;
रोशनी होगी चिरागों को जलाये रखना;
लहू देकर जिसकी हिफ़ज़त की हमने;
ऐसे तिरंगे को सदा दिल में बसाये रखना!
10  आन देश की शान देश की, देश की हम संतान हैं;
तीन रंगों से रंगा तिरंगा, अपनी ये पहचान है!
11  नफरत बुरी है, न पालो इसे;
दिलो में खालिश है, निकालो इसे;
न तेरा, न मेरा, न इसका, न उसका;
 ये सबका वतन है, संभालों इसे!
12  आजाद की कभी शाम नहीं होने देंगें;
शहीदों की कुर्बानी बदनाम नहीं होने देंगें;
बची हो जो एक बूंद भी गरम लहू की;
तब तक भारत माता का आँचल नीलाम नहीं होने देंगें!
13  आओ देश का सम्मान करें;
शहीदों की शहादत को याद करें;
एक बार फिर से राष्ट्र की कमान;
हम हिन्दुस्तानी अपने हाथ धरे;
आओ स्वंतंत्र दिवस का सम्मान करें!

सोमवार, 12 अगस्त 2013

आईएनएस विक्रान्त : तीसरी सोमवारी का उपहार


शीतांशु कुमार सहाय
    चल रहा है इन दिनों सावन का महीना। सावन यानी भगवान शिव की उपासना का विशेष महीना। इस विशेष महीने में भी सोमवार का दिन विशेषों-में-विशेष है। तभी तो भारत सरकार ने देशवासियों को तीसरी सोमवारी को विशेष उपहार दिया। पुराने लड़ाकू जलपोत ‘आईएनएस विक्रान्त’ की याद ताजा करने के लिए सोमवार को स्वदेशी तकनीक वाले नये ‘आईएनएस विक्रान्त’ को समुद्र में उतारा गया। 10 वर्षों के अथक प्रयास और 2 वर्षों की अप्रत्याशित देरी के बाद स्वदेशी विमानवाहक पोत विक्रान्त के जलावतरण के साथ ही विश्व के उन गिने-चुने देशों में भारत शामिल हो गया जो समुद्र में तैरते हवाई अड्डे के डिजाइन, विकास और निर्माण की क्षमता रखते हैं। कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड में पल रहा देश का स्वप्न सोमवार को उस समय साकार हो गया, जब दक्षिणी नौसैनिक कमान में आयोजित समारोह के दौरान रक्षा मंत्री एके एण्टनी की उपस्थिति में उनकी पत्नी एलिजाबेथ एण्टनी ने विधिवत् विक्रान्त के जलावतरण की रस्म पूरी की। यों पोण्टून की पालकी पर सवार होकर 45 हजार टन का विमानवाहक पोत कोचिन के निकट समुद्र में उतर गया। इस तरह भारत ने अपनी नौसेना की रणनीति एवं सामरिक क्षमता को और अधिक मारक, प्रभावशाली व प्रतिरोधी बनाने की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम बढ़ाया। विक्रान्त युद्धपोत के तरण क्षेत्र का लगभग 90 प्रतिशत, संचालन क्षेत्र का लगभग 60 प्रतिशत और लड़ाकू आयुधों का करीब 30 प्रतिशत भाग स्वदेश में निर्मित है। इटली की कम्पनी फिनकेनथियेरी ने इसका प्रोपेल्शन सिस्टम बनाने में मदद की है। एविशन सिस्टम में रूस का नेवल डिजाइन ब्यूरो सहायता दे रहा है।

    भारतीयों के लिए आईएनएस विक्रान्त का नाम नया नहीं है। भारत ने सन् 1957 में ब्रिटेन से एक रनवे वाला विमानवाही पोत ‘एचएमएस हरक्यूलिस’ खरीदा था। भारत में लाकर इसका नाम रखा गया था ‘आईएनएस विक्रान्त’। आईएनएस विक्रान्त भारत का पहला विमानवाही लड़ाकू जहाज था जिसने 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में शत्रुओं के छक्के छुड़ा दिये थे। 4 मार्च 1997 को आईएनएस विक्रान्त सेवामुक्त हो गया। तब से यह मुम्बई तट पर संग्रहालय की शक्ल में खड़ा है। उसी पुराने जहाज को सम्मान देने के लिए देश ने अपने पहले स्वदेशी विमानवाही पोत का नाम भी ‘आईएनएस विक्रान्त’ ही रखा है। इसे ‘डायरेक्टोरेट ऑफ नेवल डिजाइन’ ने डिजाइन किया तथा कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड में इसका निर्माण किया गया है। 2006 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ। रक्षा मंत्री ने 28 फरवरी 2009 में इस पोत के निर्माण की विधिवत् शुरुआत की थी जबकि स्टील काटने का कार्य 2007 में ही शुरू हो चुका था। उस समय एण्टनी ने आशा की थी कि यह पोत 2014 में नौसेना में शामिल हो जाएगा। नौसेना के अनुसार, समुद्र में उतारे जाने के एक वर्ष बाद ही इसके समुद्री परीक्षण शुरू हो पाएंगे। यों 2018 तक यह नौसेना बेड़े में शामिल हो पाएगा। उस समय 2 लड़ाकू युद्धपोतों रूस से खरीदा एडमिरल गोर्शकोव यानी ‘आईएनएस विक्रमादित्य’ और स्वदेशी ‘आईएनएस विक्रान्त’ की मौजूदगी के बाद ‘आईएनएस विराट’ को सेवामुक्त किया जा सकेगा। विक्रमादित्य इस वर्ष के अन्त तक नौसेना बेड़े में शामिल होगा। जहाँ तक नये आईएनएस विक्रान्त की बात है तो यह कई विशेषताओं से भरा है। 16 हजार टन फौलाद को काटकर इसे बनाया गया है। 4 गैस टरबाइन 24 मेगावाट ऊर्जा पैदा करेंगे। पूरे कोचिन शहर की बिजली की जरूरत को पूरा करने में यह ऊर्जा सक्षम है। इसका डेक 10 हजार वर्ग मीटर का है। मतलब फुटबॉल के  2 मैदानों से भी बड़ा। इसमें लगभग 3500 किलो मीटर लम्बी केबल इस्तेमाल की गयी है जो दिल्ली से कोचिन तक पहुँच सकती है। 38 हजार टन इसका भर है जो 56 किलो मीटर प्रति घंटे की रफ्तार से समुद्र पर चल सकता है। यह अर्ली अलार्मिंग सिस्टम से भी लैस है जो शत्रुओं की पनडुब्बी के पास पहुँचने से पहले ही सूचित कर देगा। यह सतह से 50 फीट ऊँचा, 262 मीटर लम्बा और 62 मीटर चौड़ा है। इस पर एक साथ 1550 नौसैनिक तैनात होंगे। यह विमानवाहक पोत अपने साथ 35 लड़ाकू विमानों को लेकर चल सकेगा। इस पर 2 वायुयान रनवे हैं जिनसे हर तीसरे मिनट विमान उड़ान भर सकेंगे। यह मिग 29-के, स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमानों व कामोव-31 हेलीकॉप्टरों से लैस होगा। साथ ही विक्रान्त पर सतह से हवा में मार करने वाली लम्बी दूरी की एलआर सैम मिसाइलें भी तैनात होंगी।

    विश्व की 9 देशों की नौसेनाओं के पास 22 वायुयान वाहक युद्धपोत हैं जो अभी संचालन में हैं। केवल अमेरिका, रूस तथा ब्रिटेन ने ही 40, 000 टन से अधिक के विमान वाहक पोत बनाये हैं। भारत इस कतार में चौथा देश है। सितम्बर 2012 में चीन ने यूक्रेन से पहला विमानवाहक पोत खरीदकर समुद्र में परीक्षण के लिए भेजा है। सोमवारी के ‘विक्रान्त उपहार’ के लिए धन्यवाद दीजिये इसके निर्माण में लगे भारतीय अभियन्ताओं सहित अन्य सहयोगियों को।

रविवार, 11 अगस्त 2013

बेखौफ दामाद जी रॉबर्ट वाड्रा पर कार्रवाई कब होगी?



शीतांशु कुमार सहाय
    मैं करूँ तो एकदम सही, कोई और करे तो गलत। जिनकी पहुँच ऊँची है, यह उन्हीं का कथन है। कुछ इसी तर्ज पर चलते आ रहे हैं रॉबर्ट वाड्रा। ये पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी और वर्तमान प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से भी ताकतवर काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद हैं। लिहाजा उनके सारे कार्य देशभर में बेरोकटोक होते हैं, हो रहे हैं। पिछले वर्ष सितम्बर-अक्तूबर से इस वर्ष के शुरुआती महीनों तक वाड्रा काफी चर्चित रहे। चर्चा सकारात्मक नहीं, नकारात्मक ही था। याद होगा सुधी पाठकों को कि हरियाणा के भारतीय प्रशासनिक अधिकारी अशोक खेमका ने वाड्रा व डीएलएफ के बीच के जमीन सौदे को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया था। उसके बाद हरियाणा की काँग्रेसी सरकार ने 3 सदस्यों की एक जाँच समिति बनायी। समिति ने वाड्रा व उनकी जमीन खरीद को साफ-सुथरा सिद्ध कर दिया। कार्रवाई हुई खेमका पर, उनका तबादला कर दिया गया। उसी दौरान खेमका ने भी अपना जाँच प्रतिवेदन समिति को सौंपा था। उस पर हरियाणा सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। हाल ही में प्रतिवेदन की वह प्रति मीडिया को हाथ लग गयी और देश जान गया कि खेमका द्वारा लगाये गये आरोपों पर न वाड्रा पर कार्रवाई हुई और न ही डीएलएफ पर। फिर भी हरियाणा के मुख्य सचिव ने सफाई दी है कि खेमका के आरोपों की पड़ताल की जा रही है जो गले नहीं उतरता। आखिर कितनी बड़ी पड़ताल चल रही है जो रिपोर्ट प्राप्त होने के 3 माह बाद भी जारी है?

    दरअसल, हरियाणा के गुड़गाँव के शिकोहपुर गाँव में रॉबर्ट वाड्रा का भूमि सौदा एक बार फिर काँग्रेस और उनकी अध्यक्ष सोनिया गाँधी के लिए परेशानी का सबब बना है। भण्डाफोड़ करने वाले अधिकारी अशोक खेमका ने अपनी रपट में कहा है कि वाड्रा ने शिकोहपुर में 3.53 एकड़ जमीन के दस्तावेज में फर्जीवाड़ा किया और वाणिज्यिक कॉलोनी की अनुज्ञप्ति पर अवैध तरीके से बड़ा मुनाफा कमाया। हरियाणा के डिपार्टमेंट ऑफ टाउन ऐंड कंट्री प्लैनिंग यानी शहरी एवं क्षेत्रीय योजना विभाग (डीटीसीपी) ने नियमों एवं नियमन को नजरंदाज करते हुए दलालों के रूप में काम करने से सम्बधित साठगाँठ वाले पूँजीवादियों (क्रोनी कैपिटलिज्म) को फलने-फूलने की अनुमति दी। आरोप यह भी है कि डीटीसीपी की मदद से वाड्रा ने फर्जी लेन-देन किया। खेमका ने 21 मई को ही अपना जवाब 100 पृष्ठों में पेश किया था। इसमें कहा गया है कि 12 फरवरी 2008 के बिक्री के दोनों अनुबन्धों में वाड्रा की कम्पनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से जमीन खरीदी। सेल डीड में 7.5 करोड़ रुपये के चेक का जिक्र है लेकिन यह वाड्रा की कम्पनी का नहीं है। इतना ही नहीं, स्टाम्प ड्यूटी भी वाड्रा की कम्पनी ने नहीं, ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज ने भरा। वाड्रा की हैसियत के मद्देनजर डीटीसीपी ने एक माह में ही मार्च 2008 में उनकी कम्पनी को वाणिज्यिक अनुज्ञप्ति प्रदान कर दी; ताकि वाड्रा को बाजार से मुनाफा हासिल हो सके। आगे भी जारी रहा घालमेल और डीटीसीपी ने अप्रैल 2012 में स्काईलाइट को अनुमति दे दी कि वह डीएलएफ को अनुज्ञप्ति हस्तान्तरित कर सकती है। यों वाणिज्यिक अनुज्ञप्ति प्राप्त जमीन अन्ततः 18 सितम्बर 2012 को डीएलएफ से वाड्रा ने 58 करोड़ रुपये में बेच दी। एक दिन में ही 7.5 करोड़ की जमीन 58 करोड़ रुपये की कैसे हो गयी? प्रश्न यह भी है कि रजिस्ट्री डीड में कहा गया है कि कोई भुगतान नहीं किया गया तो फिर इस संदिग्ध बिक्री से जमीन का मालिकाना हक स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी के पास चले जाना कैसे सम्भव है? ऐसे में इसे बिक्री कहा नहीं जा सकता और कानूनी या नैतिक रूप से स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी जमीन की मालिक नहीं है।

    यदि ऐसी गलती आम व्यक्ति करता तो वह सलाखों के पीछे होता। विदित हो कि निबन्धन अधिनियम 1908 के खण्ड-82 के तहत गलत जानकारी व फर्जी दस्तावेज देने पर 7 वर्षों तक की सजा हो सकती है। केवल जमीन डीड ही नहीं, स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी की ओर से दाखिल बैलेंस शीट भी गलत है। यह कम्पनी ऐक्ट और भारतीय दण्ड विधान की धाराओं 417, 468 और 471 के तहत अपराध है। अब घोटाले के बारे में जान लेना चाहिये कि अगर व्यावसायिक कॉलोनी के लिए बाजार मुनाफा न्यूनतम एक करोड़ रुपये मान लिया जाए तो पिछले 8 वर्षों में जमीन अनुज्ञप्ति घोटाला करीब 20,000 करोड़ रुपये का होगा। खेमका ने दावा किया कि प्रति एकड़ 15.78 करोड़ रुपये के प्रीमियम पर यह राशि 3.5 लाख करोड़ रुपये जा सकती है। इतने बड़े घोटाले के बावजूद नवम्बर 2012 में प्रधान मंत्री कार्यालय ने भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वाड्रा के खिलाफ अनियमितताओं के आरोपों को झूठा बताया था। अब खेमका की रपट सार्वजनिक होने पर हरियाणा सरकार, उसकी जाँच समिति और प्रधान मंत्री कार्यालय की वाड्रा के पक्ष में दी गयी दलीलें झूठ सिद्ध हो रही हैं। ऐसे में क्या ‘दामाद जी’ पर हरियाणा सरकार कार्रवाई करेगी या उनकी बेखौफी में और वृद्धि कर दी जाएगी?

शनिवार, 10 अगस्त 2013

पंजीकरण अधिनियम, 1908 का संशोधन विधेयक 8 अगस्त 2013 को संसद में पेश


शीतांशु कुमार सहाय
       पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2013
      इस विधेयक में प्रमुख संशोधन प्रस्‍तावित है:-

·       1) वर्तमान में पुस्‍तक 4, अर्थात ‘विविध पंजीयक’ में शामिल सभी पंजीकृत दस्‍तावेजों के विवरण (वसीयत के अलावा) आम जनता के लिए उपलब्‍ध नहीं हैं। अधिक पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए पुस्‍तक चार में इन्‍हें आम जनता को देखने की सुविधा देने का प्रस्‍ताव किया गया है।
·      2)  वर्तमान में अधिनियम में सिर्फ पुत्र को गोद लेने से संबंधित दस्‍तावेजों को पंजीकृत कराने की आवश्‍यकता है। लैंगिंग समानता को सुनिश्चित करने के लिए पुत्रियों को भी गोद लेने से संबंधित दस्‍तावेजों को खण्‍ड में जोड़ा गया है।
·     3)  पंजीकरण को अब दिए गए किसी भी राज्‍य अथवा संघशासित प्रदेश में कहीं भी कराए जाने को स्‍वीकृति दी गई है। लोगों की सुविधा, पार‍दर्शिता को ध्‍यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है। इससे दस्‍तावेजों के इलेक्‍ट्रॉनिक पंजीकरण को प्रोत्‍साहन देने में भी मदद मिलेगी। देशभर में भूमि रिकॉर्डों के तेजी से बढ़ते कम्‍प्‍यूट्रीकरण को देखते हुए यह आवश्‍यक है कि दस्‍तावेजों के इलेक्‍ट्रॉनिक पंजीकरण की सुविधा प्रदान की जाए, इससे व्‍यापक पारदर्शिता को भी सुनिश्चित किया जाएगा। अधिनियम में इसी के अनुसार संशोधन को प्रस्‍तावित किया गया है।
·     4)   बिक्री अथवा अचल संपत्ति के निर्माण से संबंधित पावर एटॉर्नी, भवन निर्माताओं के समझौते और अन्‍य किसी समझौते से जुड़े दस्‍तावेजों को अब आवश्‍यक तौर पर पंजीकृत कराना होगा। दस्‍तावेजों की धोखाधड़ी से जुड़े मामलों को न्‍यूनतम करने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है।
·     5)   वर्तमान में उप-रजिस्‍ट्रार के कार्यालय को दस्‍तावेजों के पंजीकरण से इंकार करने का अधिकार नहीं है। इससे अनाधिकृत व्‍यक्तियों को झूठे पंजीकरण कराने में मदद मिलती है। इस तरह की संपत्तियों के रजिस्‍ट्रेशन को रोकने के लिए एक नया खंड 18-ए प्रस्‍तावित किया गया है। (जैसे चेरिटेबल संस्‍थान और सरकार से संबंधित)
·       7) पंजीकरण अधिनियम 1908 के खंड-28 में प्रावधान है यदि किसी व्‍यक्ति के पास एक से ज्‍यादा राज्‍यों में अचल संपत्तियां हैं, तो वह इन राज्‍यों में से किसी में भी अपने हस्‍तांतरण से संबंधित दस्‍तावेजों को पंजीकृत करा सकता है। अनैतिक तत्‍व इस प्रावधान का दुरूप्रयोग करते रहे हैं और ऐसे तत्‍व राज्‍यों में अपनी संपत्तियों को न्‍यून पंजीकरण शुक्‍ल और स्‍टाम्‍प ड्यूटी पर पंजीकृत करा लेते हैं। इससे उस राज्‍य को हानि उठानी पड़ती है, जहां वास्‍तविक रूप से संपत्ति है।

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्‍थापना विधेयक 2012 में निष्‍पक्ष हर्जाने और पारदर्शिता अधिकार के संबंध में---
·        8) भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थास्‍थापना विधेयक 2012 में निष्पक्ष हर्जाने और पारदर्शिता के अधिकार से जुड़ी नई विशेषताओं में हर्जाने की बढी हुई धनराशि शामिल है, जिसे विस्‍थापित परिवारों को मिलने की गारंटी दी गई है।
·      9)  हालांकि इस धनराशि को तय करने के लिए पंजीकृत मूल्‍य की जगह वर्तमान बाजार मूल्‍य को आधार माना गया है। पंजीकृत मूल्‍य आमतौर पर अस्‍पष्‍ट और सही नहीं होते और पुराने भी होते हैं। यदि पंजीकरण को आवश्‍यक बनाया जाता है और इसका आम लोगों द्वारा समीक्षा/मूल्‍य संवर्द्धन किया जा सकता है, तो इससे खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में भू‍मि के मूल्‍यों में सटीकता आएगी।
·      10)  गैर-पेशेवर और तदर्थ तरीके से दर्ज किए जाने के कारण भूमि शीर्षक आमतौर पर विवाद का कारण बनते है। पंजीकरण अधिनियम में किए गए इन नये संशोधनों से लाभग्राहताओं की पहचान/निर्धा‍रण (स्‍पष्‍ट शीर्षकों के माध्‍यम से) में अधिक पारदर्शिता को सुनिश्चित किया जा सकेगा।

अल्‍पसंख्‍यकों की खिदमत में ‘खिदमत’ हेल्‍पलाइन शुरू की


शीतांशु कुमार सहाय
केंद्रीय अल्‍पसंख्‍यक कार्यमंत्री श्री के. रहमान खान ने 8 अगस्त 2013 को ‘खिदमत’ नाम की एक समर्पित निशुल्‍क हेल्‍पलाइन शुरू की। ‘खिदमत’ हेल्‍पलाइन भारत के अल्‍पसंख्‍यकों को समर्पित करते हुए उन्‍होंने आशा व्‍यक्‍त की कि यह समाज के सभी वर्गों विशेषकर वंचित वर्गों के समावेशी विकास का राष्ट्रपिता महात्‍मा गांधी का सपना साकार करेगी। इस अवसर पर रहमान खान ने कहा कि यह सेवा ताजा सूचना के माध्‍यम से अल्‍पसंख्‍यकों को सशक्‍त बनाएगी। यह हेल्‍पलाइन अब चालू हो चुकी है। शुरूआत में यह हेल्‍पलाइन सभी कार्यदिवसों के दौरान सुबह नौ बजे से शाम छ: बजे तक खुली रहेगी। इसकी सफलता और मांग को देखते हुए इसे नई सुविधाओं से युक्‍त करके 24×7 भी बनाया जा सकता है। बदलते भारत में जब फोन सेवाएं और मोबाइल देश के कोने-कोने तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में यह समर्पित हेल्‍पलाइन संभवत: विकास और कल्‍याणकारी कार्यक्रमों के बारे में सूचना देने का बेहतर विचार साबित हो सकती हैं।
समय पर मिली सही जानकारी ताकत होती है। ‘खिदमत’ हेल्‍पलाइन के माध्‍यम से सभी स्‍तरों के अल्‍पसंख्‍यकों को समान रूप से शक्ति सम्‍पन्‍न बनाने का प्रयास है।
विभिन्‍न कार्यक्रमों और योजनाओं के बारे में लक्षित आबादी में जानकारी का अभाव सबसे बड़ी रूकावट है। मंत्रालय ने यह समर्पित निशुल्‍क हेल्‍पलाइन इसलिए शुरू की है, क्‍योंकि उसका मानना है कि लक्षित आबादी को एक मंच की जरूरत है। यहाँ से वे आसान भाषा में बातचीत के माध्‍यम से नई जानकारी प्राप्‍त कर सके और उनकी अधिकांश जिज्ञासाएं शांत हो सके।
इस हेल्‍पलाइन की शुरूआत के साथ ही किसी गांव या दूरदराज के इलाके में बैठा कोई छात्र छात्रवृत्ति योजनाओं के बारे में तत्‍काल सूचना प्राप्‍त कर सकता है। किसी बेरोजगार अल्‍पसंख्‍यक नौजवान को मंत्रालय की ओर से चलाए जाने वाले कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा रोजगार के अवसरों के बारे में तत्‍काल जानकारी प्राप्‍त हो सकती है।

आरटीआई आवेदनों के लिए ऑनलाइन वेब पोर्टल की शुरूआत


शीतांशु कुमार सहाय
भारत सरकार ने आरटीआई आवेदनों के लिए ऑनलाइन वेब पोर्टल की शुरूआत की है। भारतीय नागरिक सूचना का अधिकार (आरटीआई) के आवेदन अब ऑनलाइन भर सकते है। इनमें विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। आरटीआई आवेदन पत्र ऑनलाइन भेजने की विस्‍तृत प्रक्रिया इस प्रकार है:-
भारतीय नागरिक आरटीआई ऑनलाइन वेब पोर्टल www.rtionline.gov.in के जरिये आरटीआई आवेदन ऑनलाइन कर सकते है। आरटीआई आवेदनों के लिए निर्धारित फीस भी ऑनलाइन अदा की जा सकती है। इसके लिए भारतीय स्‍टेट बैंक और इसके सहायक बैंकों की इंटरनेट बैंकिंग के जरिये मास्‍टर/वीजा के डेबिट/क्रेडिट कार्डों का इस्‍‍तेमाल भी किया जा सकता है। यह सुविधा इस समय भारत सरकार के 37 मंत्रालय/विभागों के लिए ही उपलब्‍ध है। यह जानकारी कार्मिक, सार्वजनिक शिकायत और पेंशन मंत्रालय में राज्‍य मंत्री तथा प्रधानमंत्री के कार्यालय में राज्‍यमंत्री श्री वी. नारायणसामी ने 8 अगस्त 2013 को राज्‍यसभा में डॉक्‍टर जर्नादन वागमरे और श्री एनके. सिंह के एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में दी।

अशोक खेमका का जवाब सार्वजनिक : रॉबर्ट वाड्रा पर 20,000 करोड़ से 3.5 लाख करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े का आरोप

प्रस्तुति- शीतांशु कुमार सहाय
हरियाणा के गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में रॉबर्ट वाड्रा का भूमि सौदा एक बार फिर कांग्रेस पार्टी और उसकी अध्यक्ष के लिए परेशानी का सबब बनता दिख रहा है। भंडाफोड़ करने वाले आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने आरोप लगाया है कि रॉबर्ट वाड्रा ने गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में 3.53 जमीन के दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया और वाणिज्यिक कालोनी के लाइसेंस पर बड़ा मुनाफा हासिल किया।
आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने कहा--

1)  हरियाणा सरकार ने पिछले 2012 के अक्टूबर में वाड्रा-डीएलएफ डील की जांच के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित किया था। हरियाणा सरकार और इस जांच समिति पहले ही वाड्रा को क्लीन चिट दे दी और डील कैंसल करने के लिए अशोक खेमका को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। हरियाणा सरकार ने इस पर खेमका से जवाब मांगा था।
2)  अशोक खेमका ने 100 पन्नों की रिपोर्ट 21मई 2013 को हरियाणा सरकार को सौंप दी थी। खेमका को जवाब दाखिल किए हुए तीन महीना से अधिक समय हो चुका है लेकिन हरियाणा के चीफ सेक्रेटरी पीके चौधरी का कहना है कि इस विस्तृत जवाब का फिलहाल अध्ययन किया जा रहा है, खेमका ने जो सवाल उठाए हैं, उन पर गौर किया जा रहा है।
3)  नवंबर 2012 में प्रधान मंत्री कार्यालय (पीएमओ) भी इलाहाबाद हाई कोर्ट में वाड्रा के खिलाफ अनियमितताओं के आरोपों को झूठा और अफवाह पर आधारित बता चुका है।
4) आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने 21 मई 2013 को हरियाणा सरकार को भेजी अपनी रिपोर्ट में कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ड वाड्रा ने गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में 3.53 एकड़ जमीन खरीदने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए और जमीन के लिए कोई कीमत नहीं चुकाई थी।

5) 12 फरवरी 2008 को वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से जमीन हासिल की थी और मार्च 2008 में उनकी कंपनी को वाणिज्यिक कालोनी की सहमति मिल गई। दोनों सेल डीड्स फर्जीवाड़ा हैं। हरियाणा राज्य सरकार ने ऐसा वाड्रा को फायदा पहुंचाने के लिए किया।
6) जैसा कि रजिस्ट्री डीड में कहा गया है कि कोई पेमेंट नहीं किया गया तो फिर इस संदिग्ध बिक्री से जमीन का मालिकाना हक स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी के पास चले जाना कैसे संभव है? कानून के मुताबिक बिक्री के तहत रकम के भुगतान या रकम देने के वादे पर मालिकाना हक का ट्रांसफर होता है। रजिस्टर्ड डीड में भविष्य में भी कोई भुगतान करने का वादा नहीं किया गया है। ऐसे में इसे सेल कहा ही नहीं जा सकता है और कानूनी या नैतिक रूप से वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी जमीन की मालिक नहीं हो सकती है।
7)  रजिस्ट्रेशन ऐक्ट 1908 के सेक्शन 82 के तहत गलत जानकारी और फर्जी दस्तावेज देने पर 7 सालों तक की सजा का प्रावधान है।
8) सिर्फ जमीन की सेल डीडी ही नहीं स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी की ओर से दाखिल बैलेंस शीट भी गलतहै। कंपनी ऐक्ट और आईपीसी के सेक्शन 417, 468 और 471 के तहत यह अपराध है।
9) 5 अगस्त, 2008 को डीएलएफ यूनिवर्सल और स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी के बीच 2.7 एकड़ जमीन के लिए हुआ अनरजिस्टर्ड समझौता कानूनी रूप से मान्य नहीं है। इससे सरकार खजाने को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ।
10)  डिपार्टमेंट ऑफ टाउन ऐंड कंट्री प्लैनिंग (डीटीसीपी) ने अप्रैल 2012 में स्काईलाइट को लाइसेंस डीएलएफ को ट्रांसफर करने की इजाजत दे दी और इसके बाद आखिरकार 18 सितंबर 2012 को यह लाइसेंस डीएलएफ को बेच दिया गया।
11)  हरियाणा सरकार की जांच समिति ने इस वर्ष के प्रारंभ में कहा था कि वाड्रा से जुड़े भूमि सौदों की जांच के लिए खेमका की ओर से जारी आदेश नियमों या प्रावधानों के दायरे में नहीं आते हैं और उपयुक्त नहीं हैं।
12) अगर इस संबंध में वाणिज्यिक कालोनी लाइसेंस के लिए बाजार मुनाफा न्यूनतम एक करोड़ रूपया मान लिया जाए तब पिछले 8 वर्षों में जमीन लाइसेंस घोटाला करीब 20,000 करोड़ रुपये का होगा। उन्होंने दावा किया कि प्रति एकड़ 15.78 करोड़ रुपये के प्रीमियम पर यह राशि 3.5 लाख करोड़ रुपये जा सकती है।
13)  डीटीसीपी ने अप्रैल 2012 में स्काईलाइट को डीएलएफ को लाइसेंस हस्तांतरित करने की अनुमति दी और लाइसेंसशुदा जमीन अंतत: 18 सितंबर 2012 को डीएलएफ को बेच दी गई।
14)  वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी और डीएलएफ के बीच 2011 से 2012 तक हुए फर्जी लेन-देन। सेल डीड में 7.5 करोड़ रुपये के चेक का जिक्र है लेकिन यह वाड्रा की कंपनी का नहीं है। इतना ही नहीं, स्टांप ड्यूटी भी वाड्रा की कंपनी ने नहीं दी। उसे ओंकारेश्वर प्रॉपर्टी ने भरा।
15) खेमका ने 21 मई को अपना जवाब पेश किया था। इसमें कहा गया है कि 12 फरवरी 2008 के बिक्री के दोनों अनुबंध में वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से जमीन खरीदी और मार्च 2008 में डीटीसीपी की ओर से उनकी कंपनी को वाणिज्यिक लाइसेंस प्रदान करने के लिए जारी आशय पत्र फर्जी लेनदेन है, ताकि वाड्रा को बाजार से मुनाफा हासिल हो सके।
16)  डिपार्टमेंट ऑफ टाउन ऐंड कंट्री प्लैनिंग (डीटीसीपी) ने इस हेराफेरी में वाड्रा का साथ दिया। डीटीसीपी ने नियमों को ताक पर रखकर बिचौलिये की तरह काम कर रहे वाड्रा को फायदा पहुंचाने के लिए जमीन के वाणिज्यिक इस्तेमाल का लाइसेंस दे दिया।
17)  वाणिज्यिक इस्तेमाल का लाइसेंस के बाद वाड्रा ने 58 करोड़ में यह जमीन डीएलएफ के बेच दी थी। खेमका यह सवाल भी उठा रहे हैं कि एक दिन नें ही 7.5 करोड़ की जमीन 58 करोड़ की कैसे हो गई?
18) इंडियन नेशनल लोकदल ने अशोक खेमका के जवाब पर उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश से इसका जांच कराने की मांग की है।

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

अगस्त क्रान्ति और भारत दर्शन


 
 शीतांशु कुमार सहाय
 ‘‘यह एक छोटा-सा मंत्र मैं आपको देता हूँ। आप इसे हृदय-पटल पर अंकित कर लीजिये और हर श्वांस के साथ उसका जाप कीजिये। वह मंत्र है- करो या मरो। या तो हम भारत को आजाद करेंगे या आजादी की कोशिश में प्राण दे देंगे। हम अपनी आँखों से अपने देश को सदा गुलाम और परतन्त्र बना रहना नहीं देखेंगे। प्रत्येक सच्चा काँग्रेसी, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, इस दृढ़ निश्चय से संघर्ष में शामिल होगा कि वह देश को बन्धन और दासता में बने रहने को देखने के लिए जिन्दा नहीं रहेगा। ऐसी आपकी प्रतिज्ञा होनी चाहिये।’’ अखिल भारतीय काँग्रेस समिति की बैठक में दिये गये गाँधीजी के भाषण का यह अंश आज भी लागू है। अक्षरशः नहीं, कुछ बदलकर। वस्तुतः आज ही के दिन सन् 1942 में ‘करो या मरो’ के नारे साथ स्वतन्त्रता के अन्तिम चरण का आन्दोलन (अगस्त क्रान्ति) आरम्भ किया था महात्मा गाँधी ने। आज 71 वर्ष हो गये गाँधीजी को देशवासियों को दासता से मुक्ति का संकल्प दिलवाये हुए। पर, अफसोस कि आज भी आम देशवासी कई दासताओं को देखने के लिए ही नहीं; झेलने के लिए भी जिन्दा हैं। ये दासताएँ अंग्रेजों जैसे आतताई शासक ने नहीं, अपने लोगों की अपने द्वारा चुनी हुई सरकारों ने दी हैं। घटती कमाई और बढ़ती महंगाई की दासता, खाली होती थाली की दासता, गिरती विधि-व्यवस्था के बीच प्राण व प्रतिष्ठा के असुरक्षा की दासता, साम्प्रदायिक उन्माद की दासता, अमूल्य मतदान करके भी 5 वर्ष तक जनविरोधी सरकार को झेलने की दासता, जायज सरकारी सहायता के अभाव में आत्महत्या की दासता- ये दासता, वो दासता, पग-पग पर दासता। इन सबके साथ जिल्लत की जिन्दगी जीने को विवश हैं देशवासी।

    अगस्त क्रान्ति के साथ ही ‘करो या मरो’ खत्म नहीं हुआ, यह जारी है अब भी। सरकार द्वारा उपहार में मिली वर्तमान दुर्व्यवस्थाओं के बीच जिन्दगीभर संघर्ष करो या घिसट-घिसटकर मरो। स्वतन्त्र भारत का लोकतन्त्र और यहाँ की लोकतान्त्रिक सरकारें इसी ‘करो या मरो’ को समझा रही हैं, समझाती आ रही हैं- मेरे अनुसार करो या मरो- अब जनता न समझ पाये तो इसमें सरकार का क्या दोष! सरकार कभी 24 रुपये तो कभी 32 रुपये कमाने वाले को अमीर कहती है। इतनी राशि कमाने वाला परिवार के साथ जिन्दा रहेगा या मरेगा? 85 करोड़ गरीबों के देश में काँग्रेस के एक युवा शख्स ने तो यहाँ तक कह डाला कि रुपये-पैसे या साधनों का अभाव गरीबी नहीं है। जो गरीब मुश्किल से एक जून का भोजन जुटा पाता है, उसकी झोपड़ी में जाकर वह भोजन भी खाकर गरीबों का हमदम बनने का ढोंग रचने वाले उस शख्स ने गरीबी को दिमागी फितूर बताया। अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री को भी माँ के साथ इशारों पर नचाने वाला यह अनर्थशास्त्री युवा स्वयं प्रधान मंत्री बनने का स्वप्न भी देख रहा है। राजनीतिबाज ऐसा बोलने का दुस्साहस इसलिये कर रहे हैं; क्योंकि भारत का लोकतान्त्रिक, समाजवादी व धर्मनिरपेक्ष संविधान पँूजीवाद-सामन्तवाद के गठजोड़ की छाया से बच नहीं पाया। अंग्रेजों के वैभव व दबाव ने भारतीयों के दिलों में भय बैठाया था। इसे स्वतन्त्र भारत के शासकों ने भी अपनाये रखा है। ये इसे और मजबूत करते जा रहे हैं। आम जनता की गरीबी, महंगाई, कुपोषण, बीमारी, बेकारी, शोषण, विस्थापन व आत्महत्याओं के मलबे तले दबे भारत में शासक वर्ग का वैभव निश्चय ही नागवार गुजरता है। करोड़ों गटकने व लाखों का सरकारी सुख भोगने वाले गरीब और 32 रुपये में आम लोग अमीर! यह है शासक वर्ग का अर्थशास्त्र!

अगस्त क्रान्ति के दिन यह भी याद कर लें कि सेवाग्राम व साबरमती आश्रम के छोटे-कच्चे कमरों में बैठकर गाँधीजी को विश्व के सबसे बड़े साम्राज्य से राजनीतिक-कूटनीतिक संवाद करने में असुविधा नहीं हुई, चिन्तन-लेखन-आन्दोलन करने में भी नहीं। पर, आज के भारतीय शासक वर्ग को चाहिये वातानुकूलित कमरा। यह वर्ग गाँधीजी से कोई प्रेरणा नहीं लेना चाहता। सच तो यह है कि गाँधीजी आम भारतीय के लिए ‘राष्ट्रपिता’ हैं, शासकों के लिए नहीं। भारत सरकार ने उन्हें औपचारिक रूप से ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा दिया ही नहीं है।

    9 अगस्त को हम अगस्त क्रान्ति का 71वाँ वर्षगाँठ मना रहे हैं। ऐसे में शासक वर्ग व जनता सोचे कि क्या वे देश की आजादी को अक्षुण्ण बनाये रखने लिए कृत्संकल्पित हैं? 71 वर्षों पूर्व राष्ट्रपिता द्वारा कराए गये संकल्प को निबाह रहे हैं? दासता की बेड़ियों को तोड़ रहे हैं या उसे और मजबूत कर रहे हैं? क्या जनता का पक्ष मजबूत हो रहा है? कहीं अगस्त क्रान्ति के प्रेरणा-प्रतीकों, प्रसंगों व विभूतियों का उत्सव मनाकर उसके सारतत्त्व को खत्म तो नहीं कर रहे हैं? दरअसल, अगस्त क्रान्ति का 50वाँ वर्षगाँठ वाला वर्ष 1992 विशेष यादगार है। उसी वर्ष नयी आर्थिक नीतियों के तहत देश के दरवाजे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की लूट के लिए खोले गये और एक 500 वर्ष पुरानी मस्जिद को राम मन्दिर आन्दोलन के तहत ढाह दिया गया। तब से नवउदारवाद व सम्प्रदायवाद की युगलबन्दी के बीच भारत का शासक वर्ग जनविरोधी बन गया। 90 के दशक के बाद उपनिवेश काल से भी अधिक भयानक तरीके से जनता का दमन किया जा रहा है। ...तो ईद की खुशियों के बीच मना लीजिये अगस्त क्रान्ति दिवस को, बिना उसके सन्देशों को अपनाए, बिना उसपर अमल किये!

बुधवार, 7 अगस्त 2013

पाकिस्तान को जवाब तो देना ही होगा


   
शीतांशु कुमार सहाय
हम अपने घरों में सुरक्षित हैं, अपने परिवार के साथ सुख-चैन की जिन्दगी व्यतीत कर रहे हैं और शान से चला रहे हैं अपना कारोबार, निश्चिन्त होकर कर रहे हैं नौकरी। यह इसलिये सम्भव है कि देश की सीमा पर हमारे जांबाज प्रहरी कड़ाके की ठण्ड या कड़कड़ाती धूप में दिन-रात मुस्तैद हैं, देश और देशवासियों की सुरक्षा के लिए अपनी सुरक्षा हथेली पर लेकर तैनात हैं। ऐसे में देशवासियों का नैतिक समर्थन तो उन्हें मिल ही रहा है, तभी तो 6 अगस्त को पुंछ के चक्कां दा बाग इलाके में घुसकर पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा 4 जवानों और एक जेसीओ की हत्या के विरोध में देशवासी गुस्से में हैं। देश के कोने-कोने से पाकिस्तान को माकूल जवाब देने की माँग उठ रही है। आवश्यकता है कि उन्हें सरकारी स्तर पर भी उचित सम्मान मिले और उनके त्याग-बलिदान की सराहना हो। पर, अफसोस है कि ऐसा हो नहीं रहा है। उक्त हमले पर रक्षा मंत्री एके एण्टनी ने संसद में कहा कि हमलावर पाकिस्तानी सैनिक नहीं; बल्कि पाकिस्तानी सैनिकों के वेश में आतंकवादी थे। यह बयान पाकिस्तानी सैनिकों को एक तरह से ‘क्लीन चिट’ देने जैसा है। देशवासियों के अलावा विपक्षी नेताओं ने भी एण्टनी के बयान को निन्दनीय कहा है और उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी माँगने को कह रहे हैं।

वास्तव में लोकसभा में एण्टनी ने एक तरह से सीमा प्रहरियों के बलिदान को नजर-अन्दाज किया है। सीमा प्रहरी अपनी जान गँवाकर देश की हिफाजत   करें और देश का रक्षा मंत्री उन्हें चन्द बोलों से भी नैतिक सम्बल न दे! यह तो निश्चय ही निन्दनीय है। अब उनके दल काँग्रेस के बयान बहादुरों ने तो यहाँ तक कह दिया कि एण्टनी माफी नहीं माँगेंगे। जान हथेली पर लेकर देश की सुरक्षा करने वाले सैनिकों को सरकारी स्तर पर मिलने वाले नैतिक सम्बल का यही है नमूना!

   
एक वह भी समय था जब धोती पहनने वाले प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री फेंटा बाँधकर पहुँच गये थे सीमा पर अपने सैनिकों की हिम्मत बढ़ाने और एक आज के रक्षा मंत्री हैं। शास्त्री भी काँग्रेसी थे और एण्टनी भी काँग्रेस के ही हैं। पर, दोनों में अन्तर देख रहे हैं देशवासी और शिद्दत से महसूस भी कर रहे हैंे। जहाँ तक सीमा पर हमले की बात है तो 3 जुलाई से अब तक पाकिस्तान ने 7 बार युद्धविराम का उल्लंघन किया। 3 जुलाई को पुंछ के सब्जियाँ में एक शव की तलाशी में गये पुलिसवालों पर पाकिस्तानी सैनिकों ने गोली चलायी। 8 जुलाई को पाकिस्तानी आतंकियों के बम विस्फोट में पुंछ में 2 कुली मारे गये। भारतीय सेना ने जब जख्मी हुए अन्य कुलियों को राहत पहुँचाने की कोशिश की तो पाकिस्तानी सेना ने फायरिंग की। 12 जुलाई को जम्मू जिले के पिण्डी इलाके में पाकिस्तानी रेंजरों ने भारतीय चौकी पर फायरिंग की। 22 जुलाई को पुंछ में भारतीय चौकी पर पाकिस्तान ने छोटे हथियारों से फायरिंग की। 27 जुलाई को पुंछ में भारतीय चौकियों को पाकिस्तान ने गोलीबारी का निशाना बनाया तो 28 जुलाई को पुंछ के ही डोडा बटालियन फॉरवर्ड इलाके में पाकिस्तान ने मशीन गन और ग्रेनेड दागे। यों 6 अगस्त को पाक सेना ने पुंछ के चक्कां दा बाग इलाके में घुसकर 4 जवानों और एक जेसीओ की हत्या कर दी। नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी हरकतों को देखकर स्पष्ट है कि नवाज शरीफ भारत के साथ ‘शराफत’ नहीं दिखा रहे हैं।

    अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे पाकिस्तान को सबक सिखाना जरूरी है। इसके लिए चौतरफा दबाव बनाना होगा। इसमें कूटनीति, कारोबार, सैन्य दबाव और खेल-संस्कृति से जुड़े मोर्चे पर सख्ती शामिल हैं। ऐसा करने से पाकिस्तान पर जबर्दस्त दबाव बन सकता है और उसे अपनी गलती का पुरजोर एहसास हो सकता है। कूटनीतिक दबाव के तहत भारत व पाकिस्तान के राजनयिकों के बीच प्रस्तावित मुलाकात को कुछ समय के लिए रोका जाना चाहिये। साथ ही भारत अगले महीने न्यूयार्क में प्रस्तावित मनमोहन सिंह व नवाज शरीफ की मुलाकात को भी रद्द कर सकता है। इससे पाकिस्तान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनेगा। कारोबारी दबाव के अन्तर्गत भारत द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही रियायतों पर लगाम लगाया जाना चाहिये। बिजली के क्षेत्र में प्रस्तावित मदद के प्रोजेक्ट को भी तुरन्त रोका जाना चाहिये। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को दी जा रही कारोबारी मदद के खिलाफ भी भारत गोलबन्दी कर सकता है। सैन्य विकल्प के रूप में सेना को यह निर्देश दिया जा सकता है कि सीमा पर पाकिस्तानी हमले का स्थानीय स्तर पर ही मुँहतोड़ जवाब दे। साथ ही सांस्कृतिक रिश्तों पर कुछ समय के लिए विराम लगाया जाये। क्रिकेट समेत कई खेलों को लेकर भी भारत रिश्ता तोड़ सकता है। खस्ताहाल पाकिस्तानी क्रिकेट और उसके प्रशंसकों पर इससे जबर्दस्त  दबाव बनेगा। यों बिगड़ैल पाकिस्तान का होश ठिकाने लग जाएगा।

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय में अब प्यार की पढ़ाई


 
  शीतांशु कुमार सहाय
19वीं सदी में अपने द्वारा आविष्कृत क्रेस्कोग्राफ के माध्यम से पेड़-पौधों में प्रेम की उत्तेजना को विश्व में पहली बार प्रदर्शित करने वाले वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस को यह नहीं मालूम था कि 21वीं सदी में उसी प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय में प्रेम की पढ़ाई भी आरम्भ हो जाएगी। पर, यह ऐतिहासिक पहल मूर्त्त रूप ले रहा है और 2014 के जनवरी से राजा राम मोहन राय द्वारा स्थापित प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय में प्यार का पाठ पढ़ेंगे विद्यार्थी। वास्तव में क्रेस्कोग्राफ 1/100000 इंच प्रति सेकेण्ड तक की वनस्पति के स्पन्दन को दर्ज कर सकता है। पर, प्यार का स्पन्दन इससे भी सूक्ष्म है जिसका अध्ययन अब प्रेसीडेन्सी में आरम्भ होने वाला है। यह ऐसा समय है जब विश्वस्तर पर सर्वाधिक कमी प्यार की ही महसूस की जा रही है। घर-परिवार व समाज से प्यार गुम हो गया-सा लग रहा है। सबको वर्तमान यांत्रिक विकास ने इस कदर स्वार्थी बना दिया है कि सम्पत्ति-संचय और रुपयों के ढेर के बीच प्रेम की लकीर ढँक गई, विलीन हो गई। उसी की खोज फिर से प्रारम्भ करेंगे कोलकाता के करीब 2 सदी पुराने प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थी। तलाशे जाएंगे प्रेम के नए सूत्र, प्रादुर्भूत होंगे प्यार के नूतन सिद्धान्त और मोहब्बत के नवीन आयाम गढ़े जाएंगे। पुस्तकों की उबाऊ गन्ध के बीच प्यार के अफसाने की गुदगुदाहट महसूस करेंगी छात्र-छात्राओं की टोली। उन्हें प्यार की पढ़ाई इस तरह प्रभावित करेगी कि व्यावहारिक जीवन में वे प्रत्येक कार्य को बड़े प्यार-दुलार से निभाएंगे, परिणति तक पहुँचाएंगे। प्रसीडेन्सी में मटुकनाथ जैसे प्रेम विशेषज्ञ होंगे या जूली जैसी प्रेम दीवानी होगी, यह कहना भले ही अतिरेक सिद्ध हो मगर प्रसिद्ध प्रेमियों की जीवनी से प्रेम का विशेष रूप तो अख्तियार करेंगे ही विद्यार्थी। यह अनुकरणीय भी हो सकता है और निन्दनीय भी। पर, प्यार के पाठ्यक्रम को तैयार करने वाली टीम तो यही कहती है कि इसमें निहित तथ्य पढ़नेवालों में सकारात्मकता लाएगी, नकारात्मकता नहीं।

  
विदित हो कि सन् 1817 ईश्वी में कुछ सहयोगियों के साथ तत्कालीन समाजसेवी राजा राम मोहन राय ने कोलकाता में हिन्दू महाविद्यालय की स्थापना की। पश्चिम जगत की उच्च शिक्षा को एशिया में प्रदान करना ही इसका उद्देश्य था। 1855 ईश्वी में ब्रिटिश सरकार ने इसे अधिग्रहित कर ‘प्रसीडेन्सी कॉलेज ऑफ बंगाल’ नाम दिया जिसका संक्षिप्त प्रेसीडेन्सी कॉलेज कहलाया। जब 1857 ईश्वी में कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो प्रेसीडेन्सी महाविद्यालय को उसके अधीन कर दिया गया। 1944 ईश्वी से यहाँ लड़कियों को भी पढ़ने की इजाजत मिली। ऐतिहासिकता व प्रसिद्धि के मद्देनजर 7 जुलाई 2010 को इसे विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया। जगदीश चन्द्र बोस के अलावा प्रफुल्ल चन्द्र राय, मेघनाथ साहा, अमल कुमार रायचौधरी जैसे वैज्ञानिक, सुखमय चक्रवर्ती और अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों के अलावा भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, बांग्ला देश के राष्ट्रपति अबु सईद चौधरी व पाकिस्तान के प्रधान मंत्री मुहम्मद अली जैसे प्रख्यात राजनीतिज्ञ प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रहे हैं। अब यहाँ से प्रख्यात प्रेम विशेषज्ञ भी निकलेंगे और देश-दुनिया में नाम करेंगे। विद्यार्थी प्यार जैसे गूढ़ विषय को पढ़ने के लिए चुन सकेंगे। प्यार का पाठ्यक्रम वस्तुतः नए बहुविषयक अध्ययन कार्यक्रम का ही एक भाग होगा। प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय की कुलपति मालविका सरकार के अनुसार, प्यार का नया पाठ्यक्रम आगामी सत्र में जनवरी से आरम्भ हो जाएगा। फिलहाल यह समाज शास्त्र विभाग के अन्तर्गत संचालित होगा। इसमें मुख्यतः प्यार के सैद्धान्तिक पहलुओं को पढ़ाया जाएगा। 

 
  आने वाले दिनों में यहाँ प्रेम के नए-नए आयाम गढ़े जाएंगे, प्यार के नए तरीके और सिद्धान्त बताए जाएंगे, इस पर नया अनुसन्धान भी होगा। दरअसल, स्नातक में एक विषय के रूप में प्यार की पढ़ाई होगी। सभी विषयों के विद्यार्थियों को प्रेम का पाठ पढ़ना अनिवार्य होगा। यह फिलहाल 50 अंक का वैकल्पिक विषय है जिसे बाद में विस्तृत रूप दिया जा सकता है। बड़ा ही मनोरंजक और जीवन में पग-पग पर काम आने वाले इस कोर्स में हिन्दी फिल्मों के प्रेम के कई रूपों को एक अलग अन्दाज में पढ़ाया जाएगा। इसमें प्रेम के सभी पहलुओं और उसके सामाजिक प्रभावों वाले तथ्यों को समाहित किया गया है। विद्यार्थी जहाँ श्रीकृष्ण, राधा, मीरा को पढ़ सकेंगे वहीं राजकपूर, गुरुदत्त, यश चोपड़ा के प्रेमपूर्ण फिल्मों के विषय को भी जान सकेंगे। यों विद्यार्थी मो. रफी, मुकेश, किशोर कुमार व लता के पुराने रोमांटिक गीतों के साथ ही नए गायकों के गीतों सहित शेरों व अफसानों को पढ़कर प्रेम को जानेंगे, पहचानेंगे। प्रेम को लेकर विश्व में विश्वविद्यालय स्तर पर यह पहला प्रयास है। अब देखना है कि विद्वानों ने पाठ्यक्रम को कितना जीवनोपयोगी बनाया है। वैसे यह प्रशंसनीय पहल तो है ही।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

झारखण्ड की बदहाल स्वास्थ्य सेवाएँ


शीतांशु कुमार सहाय
    इन दिनों स्तनपान सप्ताह चल रहा है। इस दौरान झारखण्ड की स्वास्थ्य सेवाओं, विशेषकर बच्चों व माँ के स्वास्थ्य प्रकरण की पड़ताल आवश्यक जान पड़ती है। झारखण्ड को बिहार से अलग करने का एकमात्र कारण विकास को ही माना गया। पर, अब तक विकास के किसी भी खाँचे में यह फिट नहीं बैठ रहा है। विकास के सभी क्षेत्र बदहाल हैं। सड़क, बिजली व पेयजल की हालत तो बदतर है ही, स्वास्थ्य का क्षेत्र तो और भी बदहाल है। राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं व जागरूकता के अभाव में प्रत्येक वर्ष हजारों बच्चे और माँ की मृत्यु हो जाती है। इसे कम किया जा सकता है, रोका जा सकता है मगर सरकारी स्तर पर वैसा प्रयास नहीं हो रहा है। यह निश्चय ही खेदजनक है। जब सरकारी स्तर पर सार्थक प्रयास नहीं हुए तब यूनिसेफ ने राज्य के एक दैनिक समाचार पत्र के साथ स्वास्थ्य जागरूकता का प्रशंसनीय कार्य आरम्भ कर दिया है। इस अभियान में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे बड़े चौंकाने वाले हैं। बच्चों व माँ के स्वास्थ्य के प्रति स्थिति अत्यन्त खतरनाक है। जहाँ तक गर्भवती स्त्री और प्रसव के तरीकों की बात है तो अब भी अधिकतर प्रसव घर में ही बड़े अस्वास्थ्यकर तरीके से हो रहे हैं। संस्थागत प्रसव बहुत कम हो रहा है।

    इस सन्दर्भ की पड़ताल से पता चलता है कि स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से प्रति वर्ष 46 हजार बच्चे असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं। इनमें 19 हजार बच्चों की मौत जन्म के मात्र 28 दिनों के अन्दर ही हो जाती है। इस सन्दर्भ में सरकारी आँकड़े का अवलोकन करें तो विदित होता है कि जन्म लेने वाले प्रति एक हजार बच्चों में 55 बच्चे जीवन का 5वाँ दिन भी नहीं देख पाते हैं। 24 बच्चे जन्म के 28 दिनों के अन्दर मर जाते हैं तो 38 बच्चे अपना पहला वर्षगाँठ भी नहीं मना पाते। मतलब यह कि प्रति हजार नवजात बच्चों में 79 की मौत एक माह के अन्दर निश्चित है। एक वर्ष पूरा होते-होते कम-से-कम 117 बच्चे काल-कवलित हो जाते हैं। अगर थोड़ी सावधानी बरती जाए, जागरूकता फैलाई जाए, सरकारी स्वास्थ्य संस्थाएँ ठीक से कार्य करें, बच्चों को माँ नियमित स्तनपान कराए, समय पर टीके लगाए जाएँ, कुपोषण व संक्रमण से बचने के उपाय किये जाएँ और संस्थागत प्रसव हो तो निश्चय ही 46 हजार जानें बचाई जा सकती हैं। प्रतिदिन कम-से-कम 126 नवजातों की प्राण रक्षा हो सकती है। जाहिर है कि इस रक्षा की कुंुजी सरकार के पास है और वह प्रयत्नशील नहीं है या उसका तन्त्र उचित तरीके से कार्य नहीं कर रहा है। वास्तव में सरकार के पास नियम-कानूनों की कमी नहीं है पर उसे सही तरीके से लागू करने वाले तन्त्र की लगाम का प्रबन्धन ही नहीं हो पा रहा है। यही कारण है कि झारखण्ड में 62 प्रतिशत प्रसव अकुशल दाई कराती हैं या फिर घरों में असुरक्षित तरीके से कराए जाते हैं। यह स्वास्थ्य व स्वच्छता की दृष्टि से उचित नहीं है। इससे माँ-बच्चों में जानलेवा संक्रमण का खतरा बना रहता है। केवल 37.6 प्रतिशत प्रसव ही सरकारी या निजी अस्पतालों में होते हैं। कुशल और प्रशिक्षित हाथों से प्रसव होने पर माँ व बच्चों की मृत्यु-दर को काफी कम किया जा सकता है। माँ व बच्चों के स्वास्थ्य के क्षेत्र में राज्य के जिलों की स्थिति को देखें तो पूर्वी सिंहभूम सबसे आगे दीखता है। सबसे बुरा हाल सिमडेगा का है। पूर्वी सिंहभूम के आगे होने का एक कारण यह भी है कि जिले के जमशेदपुर क्षेत्र में टाटा के अस्पताल व निजी अस्पतालों की व्यवस्था अच्छी है। वित्त वर्ष 2012-13 में जहाँ तक प्रसव के लिए सिजेरियन ऑपरेशन यानी सी-सेक्शन की बात है तो इसमें सबसे आगे है हजारीबाग जहाँ 401 सिजेरियन हुए। राँची में 256, पलामू में 186, साहेबगंज में 157, गोड्डा में 138, गिरिडीह में 135 और दुमका में 109 महिलाओं के सिजेरियन हुए। सबसे शर्मनाक स्थिति पाकुड़ की है जहाँ एक भी सिजेरियन नहीं हुआ।

    झारखण्ड में मातृ-शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ काम हुए भी हैं। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और ऑपरेशन की आवश्यकता वाली गर्भवती महिलाओं के सुरक्षित प्रसव के लिए पिछली राज्य सरकार ने फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) की व्यवस्था की जहाँ सर्जन होते हैं और ऑपरेशन की व्यवस्था होती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों (पीएचसी) को एफआरयू की तरह विकसित किया गया है। राज्य के 188 पीएचसी में से 17 को पहले एफआरयू बनाया गया था। वर्ष 2012-13 में इनकी संख्या 46 की गयी है। इस कारण सिजेरियन की संख्या बढ़ी है। राज्यभर के एफआरयू में वर्ष 2011-12 में 889 सिजेरियन हुए जो वर्ष 2012-13 में बढ़कर 1926 हो गए। वर्तमान वित्त वर्ष 2013-14 में 5 हजार सिजेरियन का लक्ष्य सरकार ने रखा है। अब देखना है कि नवनियुक्त स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र प्रसाद सिंह के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग यह लक्ष्य प्राप्त करता है या नहीं। वैसे यूनिसेफ के नेतृत्व में झारखण्ड में चल रहे स्वास्थ्य जागरूकता अभियान को तमाम गाँव-शहर तक फैलाने के लिए राज्य सरकार को भी सहयोग करना चाहिये। इससे हजारों झारखण्डियों के प्राण बचाए जा सकते हैं।