गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

स्‍टैच्‍यू ऑफ यूनिटी : नए संकल्प का शिलान्यास / STATUE OF UNITY



प्रस्तुति- शीतांशु कुमार सहाय/SHEETANSHU KUMAR SAHAY

गुजरात में नर्मदा डैम के तीन किमी आगे साधुद्वीप पर सरदार पटेल की 597 (182 मीटर) फीट ऊंची प्रतिमा बनाई जाएगी। इसका चेहरा नर्मदा बांध की ओर होगा।  यह मूर्ति बनने के बाद दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति होगी। यह अमेरिका के स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दोगुनी बड़ी होगी। इसका नाम स्टेच्यू ऑफ यूनिटी रखा गया है।
31 अक्टूबर 2013 को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले गृहमंत्री सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा का शिलान्यास किया। 31 अक्टूबर सरदार पटेल का जन्मदिन भी है। उनके साथ में इस मौके पर बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी थे। इस मौके पर मोदी ने कहा कि नर्मदा पर बांध का सपना सरदार पटेल का था। इस मौके पर मोदी ने कहा कि आज के युग की मांग है कि हिंदुस्तान को गौरव से देखा जाए। किसी जमाने में चीन को नहीं देखा जाता था और अब शंघाई के आसपास नया इतिहास खड़ा होने लगा है। जापान ने जब स्पीड बुलेट ट्रेन बनाई तो लोगों ने कहा कुछ तो बात है। आज समय की मांग है कि हमें ग्लोबल पॉजिशनिंग करना चाहिए। हमारी सोच में हमारी क्रिया में हमें पता ही नहीं होता कि गुलामी हमें किस तरह से दबोच रही है। पूरी दुनिया में हिंदुस्तान को दीन भाव से देखने की आदत हो गई थी, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के आने के बाद जब न्यूक्लियर विस्फोट किया गया तो विश्वास पैदा हुआ। उसके बाद दुनिया हिंदुस्तान का नाम सुनती है तो कहते है कुछ तो बात है।
मूर्ति का निर्माण कार्य दो चरणों में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में ही 2000 करोड़ रुपये का खर्च होने का अनुमान है। इस मूर्ति के लिए गुजरात सरकार पहले ही 100 करोड़ रुपये पास कर चुकी है। चीन की 153 मीटर ऊंची 'स्प्रिंग टेंपल बुद्धा' मूर्ति इसकी नजदीकी प्रतिद्वंद्वी होगी। लोहा संग्रह करने और इसके प्रचार के लिए एक वेबसाइट 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी डॉट कॉम' भी बनाई गई है। मोदी की नाराजगी कांग्रेस के उन नेताओं से है जो स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के लिए देशभर से लोहा इकट्ठा करने की उनकी योजना को कबाड़ जुटाने का प्रयास बता रहे हैं। मोदी कहते हैं, बात सिर्फ लोहे की नहीं है। हम सात लाख गांवों को देश की एकता-अखंडता के शिल्पकार सरदार पटेल के विचारों के साथ जोडऩा चाहते हैं। इन सात लाख सरपंचों के फोटो डिजिटाइज करके स्टैच्यू ऑफ म्यूजियम में रखे जाएंगे। वर्षों बाद भी यदि देश के किसी भी गांव का कोई व्यक्ति इस प्रतिमा के दर्शन करने आएगा, तो अपने गांव के सरपंच का फोटो पहचानकर अपनापन महसूस करेगा। मोदी कहते हैं- यह प्रतिमा मेरे लिए नहीं बन रही है। यह तो देश के लिए है। इसके साथ मोदी का नाम न भी जोड़ा जाए तो भी मुझे फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन प्रतिमा तो बननी ही चाहिए, बनेगी ही।


इस अवसर पर नरेन्द्र मोदी ने जो भाषण दिया वह अक्षरशः इस प्रकार है---
भाइयों-बहनों
नर्मदा के तट पर आज नए इतिहास और नए संकल्प का शिलान्यास हो रहा है. कई सालों से इस सपने को मैंने मन में संजोया था. कई लोगों ने इस सपने में रंग भरे थे, सुझाव दिए थे. कई मनोमंथन के बाद इस योजना गर्भाधान हुआ. अनेक लोगों का मार्गदर्शन, प्रेरणा, आशीर्वाद मिला. उन सबका अभिनंदन-नमन करता हूं. यह हम सबका सपना है. नर्मदा जिला छोटा जिला है, इसके विकास के लिए और आने वाले दिनों में यह काम और सरलता से हो, इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर कई फैसले हुए हैं. लेकिन सबका मूल्यांकन करने के बाद सरकार को लगा कि अच्छा होगा कि इस काम को गति देने के लिए यहां एक छोटे से तालुका (कस्बा) का निर्माण हो. मुझे पानी के मुद्दे पर कई सुझाव आए. आदिवासी भाइयों का पूरा अधिकार है, पानी उनको मिलेगा. किसानों को भी पानी मिलेगा. हमने टेक्निकल सॉल्यूशन खोजा है. नर्मदा के बाएं किनारे को भी सिंचाई का लाभ मिले, इसके लिए भी काम किया जाएगा. नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध और इसके जरिये गुजरात-राजस्थान में पानी पहुंचाने का प्रयास सरदार पटेल का सपना था. किसी जमाने में प्यासों के लिए पानी की मटकी भी घर के बाहर रखने वालों को समाज आदर से देखता था. हमारे यहां, खास तौर से गुजरात-राजस्थान में पानी का मू्ल्य है, क्योंकि हमने पानी की तंगी झेली है. आज भी गुजरात सरकार का सबसे ज्यादा बजट पानी के काम के लिए दिया जाता है. सरदार सरोवर बांध परियोजना के लिए पिछली सरकारों ने जितना खर्च किया, उससे डबल खर्च हमारी सरकार ने पिछले दस सालों में किया. लेकिन इस सारे काम का सपना सरदार पटेल ने देखा. यह उन्हीं के सपने पर सारा काम हो रहा है.
अगर हम पानी की व्यवस्था न कर पाते तो कहां होते, कौन जानता हमें. गुजरात में नेगेटिव ग्रोथ थी, लोग छोड़कर जा रहे थे. आज राजस्थान के किसी भी व्यक्ति से मिलते हैं तो कहता है कि आपने बहुत अच्छा काम किया, जो हमें पानी दिया. इस सबके लिए सरदार पटेल जिम्मेदार हैं. अब भी गुलामी का इतना बोझ है, आजादी के इतने साल बाद भी. हम गुलामी की छाया से अब तक निकल नहीं पाए हैं. और हमने गुलामी की छाया से निकलने के लिए इस गुलामी के साये को तोड़ने के लिए कुछ ऐसे काम करने होंगे. जिसके कारण हम गर्व के साथ आत्मसम्मान के साथ दुनिया के सामने खड़े हों. आज मैं आपको याद दिलाता हूं. 15-17 साल पहले हिंदु्स्तान में जब बजट पेश किया जाता था, तो उसे शाम को पांच बजे पार्लियामेंट में रखा जाता था. आजादी के पचास साल बाद भी ऐसा होता था. किसी ने सोचा ये क्यों ऐसा था. इसलिए था क्योंकि अंग्रेजों के जमाने से परंपरा थी. जब हमारे यहां शाम के पांच बजते थे, तब ब्रिटेन में 11 बजते थे और उस समय उनके यहां संसद का काम शुरू होता था. जब वाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने तब यह परंपरा तोड़ी गई औऱ सुबह 11 बजे बजट रखा जाना शुरू हुआ.

हमारी सोच में पता भी नहीं चलता है कि गुलामी किस कदर दबोच रही है. मित्रों इस सोच के सामने एक स्वाभिमान के साथ खड़े होने की आवश्यकता है. भारत को हीन भाव से देखे जाने की आदत सी हो गई है. भारत से हो, चलो बाजू जाओ. जब वाजपेयी जी ने शासन में आने के कुछ ही समय बाद परमाणु बम विस्फोट किया, तो पूरी दुनिया ने लोहा माना. दुनिया अब हिंदुस्तान का नाम सुनती है, तो कहती है, हां कुछ तो है. मित्रों दुनिया के अंदर हमारे देश का कोई नागरिक क्यों न हो. कोई परंपरा क्यों न हो. आज के युग में समय की मांग की. हिंदुस्तान आजाद होने के बाद भी अगर दूसरे देशों को गौरव से देखा जाता हो, तो हमारे हिंदुस्तान को क्यों न देखा जाए किसी जमाने में चाइना को कौन देखता था. चाइना ने एक शंघाई बना दिया. दुनिया के सामने पेश कर दिया. लोगों की चाइना की तरफ सोचने की आदत बदल गई. ये जो पुराने पर नया चाइना बना, शांघाई के आसपास बना. जापान ने जब बड़ी स्पीड की बुलेट ट्रेन बनाई तो दुनिया ने कहा, अरे भाई कुछ तो है. अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च कर चांद पर भेजा, दुनिया ने लोहा माना.
हमारा भी एक ग्लोबल पोजिशनिंग करना चाहिए. सवा अऱब का देश एक ताकत बनकर उभरना चाहिए। अनेक मार्ग हो सकते हैं. अनेक क्रिया प्रतिक्रिया हो सकती हैं. आज ये सरदार पटेल का स्मारक सिर्फ...सरदार सरोवर डैम बना, सरदार साहब का सपना पूरा हुआ. वो हमारे गुजरात के थे. मगर ये सपना बहुत बड़ा है. ये भव्य स्मारक. जिसकी ऊंचाई हिंदुस्तान की तरह देखने के लिए मजबूर करेगी. इतने बड़े राजे रजवाड़ों को एक करने का काम. अंग्रेजों की कुटिल कूटनीति का पर्दाफाश, ये भारत का सामर्थ हम दुनिया के सामने पेश करना चाहते हैं. अगर इतिहास की धरोहर देखें तो चाणक्य के बाद इस देश को एक करने का काम किसी ने किया, तो वह हैं सरदार पटेल. क्या हम राणा प्रताप का सम्मान करेंगे. हम छत्रपति शिवाजी महाराज का सम्मान करेंगे. हम भगत सिंह, सुखदेव राजगुरु का सम्मान करेंगे. क्या वो बीजेपी के मेंबर थे क्या. क्या उन्हीं का सम्मान होगा देश में, जो भाजपा का सदस्य हो.
दल से बड़ा देश होता है. और देश के लिए मरने वाला हमारे लिए सबसे बढ़कर है. और इसीलिए सरदार साहब को किसी दल के साथ जोड़ना उनका अपमान है. वो दल उनके इतिहास का हिस्सा है. इससे नरेंद्र मोदी भी इनकार नहीं कर सकता. हमें विरासत को कभी बांटना नहीं चाहिए. हमारी विरासतें सांझी होती हैं. लेकिन देश आजाद होने के बाद गांधी जी छुआछूत के खिलाफ जीवन भर लड़ते रहे. मगर ये जो नई राजनीतिक छुआछूत बढ़ गई है. हम इसे भी नष्ट करें.
मित्रों मुझे दो दिन पूर्व पीएम से मिलने का अवसर मिला. उन्होंने एक बात बहुत अच्छी कही. मैं आभार व्यक्त करता हूं. मीडिया के मित्र समझ नहीं आए. बात उलटी तरफ चली. हो सकता है उनकी रोजी रोटी की डिमांड थे. पीएम ने कहा कि सरदार साहब सच्चे सेकुलर थे. हम भी कहते हैं कि देश को सरदार साहब वाला सेकुलरिज्म चाहिए. वोट बैंक वाला नहीं. और इसलिए प्रधानमंत्री जी, सरदार साहब का सेकुलरिज्म चाहिए इस देश को. भारत एक हुआ. राजे रजवाड़े किसी एक संप्रदाय या समाज के नहीं थे. सब अलग अलग परंपराओँ से थे.
इसलिए मित्रों मैं भारत के प्रधानमंत्री का अभिनंदन करता हूं. आग्रह करता हूं. हम सब मिलकर सरदार साहब का सेकुलरिज्म आगे बढ़ाएं कुछ लोगों के मन में आता होगा क्यों इतना बड़ा स्मारक. बाबा साहेब आंबेडकर, उनके कई स्मारक हैं. मगर मानना पड़ेगा कि दलित शोषित समाज के लिए वह भगवान का रूप हैं. और जो भी पीड़ित दलितों के लिए भला चाहते हैं, उन्हें बाबा साहेब आंबेडकर को प्रेरणा मिलती है. तब ये नहीं पूछा जाता कि वो किस दल से थे. उनका जीवन हमें प्रेरणा देता है. ये साझी विरासत है, हम सबको गर्व होना चाहिए. हम सबका दिल देश के लिए होना चाहिए.
नई पीढ़ी को कहा पता चलेगा कि लौह पुरुष कैसे हुए। वो कौन सी शक्ति थी उनके अंदर. हम सरदार साहब का स्मारक बनाने के साथ साथ हिंदुस्तान के कोने कोने में फिर से एक बार एकता का मंत्र पहुंचाना चाहते हैं. हम इस बात से भली भांति परिचित हैं.कि भारत की प्रगति शांति एकता और सदभाव के बिना नहीं हो सकती. मां के दूध में कभी दरार नहीं हो सकती. प्रांतवाद के झगड़े, भाषावाद के झगड़े, जातिवाद और ऊंच नीच के झगड़े. इन चीजों ने हमारे देश को तबाह कर दिया. किसी दल के किसी राजनेता की झोली तो भर गई होगी, लेकिन मेरी भारत मां का गौरव क्षीण हुआ. अगर हमें वो गौरव फिर से हासिल करना है, तो एकता के मंत्र को घर घऱ तक पहुंचाना होगा. इस स्मारक के जरिए सरदार साहब के सपनों का स्मरण करते हुए, उनकी आवाज जिसे कई बरसों से दबोचा गया था. उसे बुलंद करके. कई लोगों ने सरदार साहब की आवाज पहली बार सुनी होगी. रोंगटे खड़े हो गएं. मन में फीलिंग आता है. हमने सबसे पहले महात्मा मंदिर बनाया. ये मजे की बात है, जब हमने ये मंदिर बनाया. काम अभी भी चल रहा है. लेकिन उस समय हमें किसी ने चैलेंज किया, कि मोदी तुम तो बीजेपी वाले हो, गांधी बीजेपी में नहीं थे. तो क्यों बना रहे हो. मगर जब सरदार साहब की बात आई, तो परेशानी क्यों हो रही है. मित्रों आज गुजरात गर्व महसूस कर रहा है. पहले 31 अक्टूबर को जो सरकारी एड आते थे, उसमें सरदार साहब कहीं नहीं होते थे. आज ऐसा नहीं है. ये गुजरात इफेक्ट है. हमारे महापुरुषों को भुला कैसे दिया जा सकता है.हमारी भी किसी ने आलोचना की हो, तब भी उनके महान कामों की पूजा करना आगे वाली पीढ़ी का काम होता है. हमारी कोशिश है कि हिंदुस्तान की आने वाली पीढ़ी इतिहास को जिए और जाने ये हमारा प्रयास है.
कोई समाज अपने इतिहास को भूलकर के, अपने इतिहास के ग्रासरूट से अगर बिखर जाता है, तो जैसे मूल से उखड़ा हुआ पेड़ कितना भी बड़ा क्यों न हो. वैसे ही समाज की धारा सूख जाती है, इतिहास से उसको ताकत और प्रेरणा मिलती है. रास्ते खोजने को मिलते हैं. हमारे देश के लिए अगर समाज के मन में आवश्यकता है. तो हमारे समाज का इतिहास बोध होना चाहिए. ये सरदार साहब की प्रतिमा के माध्यम से हम आने वाली पीढ़ी को वो नजराना देना चाहते हैं. भाइयों बहनों ये मूर्ति कैसे बनेगी. इसमें हम दुनिया भर के एक्सपर्ट लगाएंगे. छोटा काम नहीं है. कितनी धातुओं को मिलना होगा. ये बता देता हूं कि मूर्ति ऐसी बनेगी, जो सदियों तक सलामत रहे. इस काम को हम हिंदुस्तान की एकता के लिए जोड़ना चाहते हैं. इसलिए तिजोरी से रुपये निकाल मूर्ति बन जाए. ये नहीं चाहते. जन जन को जोड़ना चाहते हैं. क्योंकि सरदार साहब ने एकता का काम किया था, वही सरदार साहब का संदेश बन जाए, इसलिए हर गांव को जोड़ना चाहते हैं. उनसे हम कुछ मांग रहे हैं. क्या मांग रहे हैं. कुछ लोगों ने गंदे शब्द प्रयोग किए। उनके दिमाग में गंदगी है.
किसान, उसके घर में तलवार तोप भी है, तब भी वह सबसे ज्यादा किसी को प्रेम करता है, तो खेती के औजार को करता है. उसके लिए वह सबसे ज्यादा मूल्यवान होता है. सरदार वल्लभ भाई पटेल किसान थे, लौह पुरुष थे. सरदार पटेल ने एकता का काम किया था. इसलिए हिंदुस्तान के हर कोने को जोड़ना है. वह किसान थे, इसलिए किसान को जोड़ना है. वह लौह पुरुष थे, इसलिए लोहे को मांगना है. हमने हर गांव पंचायत से प्रार्थना की है. कि किसान ने खेत के अंदर जिस औजार का प्रयोग किया है. वो औजार जो भारत मां की गोद में खेला है. जिसने गरीब के पेट को भरने के लिए भारत मां के साथ कष्ट झेला है. मुझे तोप नहीं चाहिए. मुझे तलवार चाहिए. मुझे तो मेरे किसान ने खेत में जो औजार इस्तेमाल किया है, उसका टुकड़ा चाहिए. उसे पिघलाएंगे. अच्छे से अच्छा स्टील निकालेंगे. उस लोहे का अर्क उस मूर्ति में जगह पाएगा, तब हिंदुस्तान का हर नागरिक कहेगा, मेरा गांव भी इसमें है. हम गांव के मुखिया के तस्वीर लेंगे, गांव का छोटा सा इतिहास लेंगे. पूरा स्मारक बनेगा, उसमें एक वर्चुअल वर्ल्ड होगा, जिसमें हिंदुस्तान के सात लाख गांवों की तस्वीर होगी, कथा होगी, कोई पचास साल बाद आएगा, तो अपने गांव का इतिहास देखेगा.ये पवित्र काम हम करेंगे.
आज देश में ताजमहल देखने के लिए यात्री आते हैं. अमेरिका में स्टेचू ऑफ लिबर्टी देखने के लिए यात्री जाएंगे. हम चाहते हैं ये पूरे विश्व के लिए महान केंद्र बने. हमारी ऊंचाई को देखे. इस देश की ऊंचाई को नापे. और जब ये पूरा स्मारक बनेगा. हम देशवासियों के लिए वह प्रेरणा का तीर्थ होगा. विश्व भर के लिए प्रवासन का धाम बन जाएगा. हर एक को अपने अपने लिए जो चाहिए वो मिलेगा. इस स्मारक में भारत के भविष्य को हमने जोड़ा है. देश में आदिवासियों के कल्याण के लिए चाहे जिस सरकार ने जो काम किए हों. उन सबको हम संग्रहित करना चाहते हैं. मेरे आदिवासी भाई बहनों के जीवन में नया उमंग उत्साह कैसे आए, वे संपन्न कैसे बनें. अगुवा कैसे बनें. उसके रिसर्च का काम भी इसी स्मारक के तहत हो.
ये देश गांव का देश है. पटेल किसान पुत्र थे. किसान के कल्याण के लिए कौन से नए विज्ञान की जरूरत है, गांव आधुनिकता की तरफ कैसे बढ़े. किसान आधुनिकता के मार्ग को कैसे आगे बढ़ाए. ये उनको शिक्षा दीक्षा कैसे मिले, एग्रीकल्चर के लिए. गांव गरीब किसान के लिए. ये काम भी हम इससे जोड़ना चाहते हैं.
मित्रों दुनिया में इस काम को करने वाली श्रेष्ठ कंपनियों को बुलाया है. तीन साल पहले उस कल्पना को सामने रखा. उसे साकार करने के लिए एक्सपर्ट आए. तीन साल उसके पहलुओं की बारीकी में लगे. तब जाकर हम इसे आगे बढ़ा रहे है. जब हमने पहली बार कहा था इस काम का. मुझे कच्छ के लोगों ने चांदी से तौलकर भेंट दी थी. मैंने पूछा, भई अभी इतनी जल्दी क्यों दे रहे हो. अभी तो योजना बन रही है. तब कच्छ के लोगों ने जवाब दिया. मोदी जी, अगर सरदार साहब न होते, इस बांध का सपना न देखा होता, तो हमारे कच्छ में पानी न पहुंचता, हम उनके कर्जदार हैं. मुंबई गया. वहां चांदी से तौला, वह भी इसी में लगेगा. हमें हिंदुस्तान के जन जन को जोड़ना है. शासन, जन देश की शक्ति, भारत सरकार की शक्ति सबको जोड़ना है. धरती भले गुजरात की हो, सपना हिंदुस्तान का है. हम कई बरसों से कह रहे हैं कि सरदार सरोवर बांध का काम पूरा हो. मगर कुछ लोग हैं, जो बयान नहीं देते, पेट में रोटी नहीं जाते. कुछ मित्रों ने मोदी को समाप्त करने की सुपारी फैलाई है. पता नहीं क्या क्या गंध फैलाते रहते हैं.
मुझे पता कि पीएम की टीम हर शब्द सुनती है, उनके बॉस की टीम सुनती है. इसलिए मैं कहना चाहता हूं, सरदार सरोवर डैम में बस गेट लगाना बाकी है. बाकी काम हो चुका है. गेट के बाद ही सबसे ज्यादा पानी भरेगा. कई बार पीएम से मिला. कहा, तीन साल लगेंगे. बंद मत करने देना, खड़े तो करने तो, मिले पीएम तो बोले कि बात तो आपकी समझने की है. एक साल बाद मिला, तो बोले कि अरे अभी तक नहीं हुआ. फिर मिले तो फिर वही बात. इतना ही नहीं एमपी वगैरह में पुनर्वास को देखने के लिए पूर्व जजों की अध्यक्षता में कमेटी हो. भले महाराष्ट्र में कांग्रेस की और बाकी दो में हमारी सरकार हो. इन तीनों राज्यों ने पुनर्वास का काम पूरा कर दिया. भारत सरकार की कमेटी ने स्वीकार कर लिया. मौखिक रूप से कहा, अखबारों में छपा. अब बस मीटिंग बुलाकर फाइनल ऑर्डर देना है. गेट बना लीजिए. पिछले आठ महीनों से रुका पड़ा है. मैं अफसरों से कहता हूं. पूछो क्या तकलीफ है.साहब आप समझते तो हैं. मैं खुला बोलूं. समझ गए न. मुझे नहीं बोलना. इसीलिए काम रुका है. मैं आज फिर नर्मदा मैया के तट से पीएम को आग्रह करता हूं. महाराष्ट्र गुजरात को पानी चाहिए. मध्य प्रदेश को बिजली चाहिए. महाराष्ट्र का चार सौ करोड़ मिल जाएगा.
मैं यहां बड़ा शिलालेख लगाने को तैयार हूं. ये काम केंद्र सरकार ने किया. मोदी का नाम भी मत लो. कम से कम डैम का काम पूरा करने की इजाजत दो. ऐसे काम में राजनीति नहीं होनी चाहिए. भाइयों बहनों मैं आशा करता हं. इस नर्मदा के तट पर, गुजरात के पशुओं की, गरीबों की, किसानों की, पेड़ पौधों की आवाज देश के प्रधानमंत्री तक पहुंचेगी. दल से बड़ा देश होता है, ये भाव उनके मन में जगेगा और भारत के लिए इतना बड़ा अच्छा काम, पूरा करें, गर्व करें, रिबन कटें. वो चाहें तो मैं आऊंगा नहीं. मैं आज कहता हूं आपका है. आप आनंद कीजिए, मगर पूरा कीजिए.
भाइयों बहनों, आज जब हम एकता का मंत्र लेकर चले हैं, तब देश को जोड़ना ये सपना लेकर चले हैं तब, सरदार पटेल के भव्य स्मारक का निर्माण करने जा रहे हैं तब, विश्व का सबसे ऊंचा स्टेचू ऑफ लिबर्टी से दो गुना बड़ा, उसका निर्माण करने जा रहे हैं तब, एकता का स्मारक है, एकता का संदेश है, भाषा अनेक, भाव एक, राज्य अनेक, राष्ट्र एक, पंथ अनेक, लक्ष्य एक. बोली अनेक, स्वर एक, रंग अनेक, तिरंगा एक, समाज अनेक, भारत एक, रिवाज अनेक, संस्कार एक, कार्य अनेक, संकल्प एक, राह अनेक, मंजिल एक, चेहरे अनेक, मुस्कान एक. ये एकता का संदेश हम लेकर चले और भाइयों बहनों. ये भारत की विशेषता है,विविधता में एकता.
हम अनेक संप्रदाय पंथ बोली भाषा होंगे, हम सब एक हैं.हमारी एकता की गारंटी ही. हमारे उज्जवल भविष्य की गारंटी है. इस स्मारक से सदियों तक एकता को बनाए रखने का काम इसी तीर्थ क्षेत्र से मिले.
मैं आदरणीय आडवाणी जी का बहुत आभारी हूं. सरदार साहब से उनका लगाव रहा है. इस महान काम में उनका आशीर्वाद मिले, इसके लिए आभारी हूं. देश से प्रार्थना है, हर गांव मिलकर जिम्मेदारी ले. 15 दिसंबर को उनके जम्मदिन के दिन रन फॉर यूनिटी है, देश के नौजवान दौड़ें. हर स्कूल कॉलेज में भाषण हों. निबंध प्रतियोगिता हों. पूरे देश में एकता का ही माहौल बने. राष्ट्रयाम जाग्रयाम वयम. एकता के लिए निरंतर जागरण चाहिए. पुण्य स्मरण चाहिए. एकता के लिए एक होकर चलना चाहिए. सोचना चाहिए, इस मंत्र को पहुंचाने के लिए आज पवित्र काम का प्रारंभ हो रहा है. दोनों हाथ ऊपर कर पूरी ताकत से बोलिए, सरदार पटेल अमर रहें.

बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

गरीबों के देश में कुबेर : फोर्ब्स की सूची के 10 अमीर भारतीय


-शीतांशु कुमार सहाय
जिस तरह सारे स्वाद केवल स्वस्थ व्यक्तियों की जिह्वा को ही संतुष्ट करते हैं, उसी तरह जगत की सारी खुशियाँ केवल अमीरों के लिए ही हैं। अपने धन बल से ऐसे लोग समस्त आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं। लिहाजा खुशियाँ उनके चरणों को चूमती हैं। महंगाई उनके लिए है जिनकी आय कम है। उनके लिए महंगाई कोई मायने नहीं रखती जिनकी आय असीमित है या यों कहें कि महंगाई के अनुसार उनकी आय भी बढ़ती जाती है। देश में जहाँ एक ओर निर्धनों की संख्या बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ धनकुबेरों की तादाद में भी इजाफा देखा जा रहा है। कम संख्या में ही सही लेकिन अब महिलाएँ भी धनकुबेरों में शामिल हो रही हैं। अमेरिकी आर्थिक पत्रिका ‘फोर्ब्स’ द्वारा जारी सूची के अनुसार, भारत के 100 धनकुबेरों में 5 महिलाएँ शामिल हैं। पुरुषों व महिलाओं की साझा सूची में सावित्री 14वें नंबर पर हैं। उनके बाद 1.9 अरब डॉलर (116 अरब रुपये) संपत्ति के साथ इंदू जैन दूसरे नंबर पर रही हैं। संयुक्त सूची में वह 29वें पायदान पर हैं। थर्मेक्स की अनु आगा तीसरे बायोकॉन की किरण मजूमदार शॉ चौथे व शोभना भरतिया पाँचवें स्थान पर रही हैं। संयुक्त सूची में इनका स्थान क्रमशः 86वाँ, 96वाँ और 98वाँ रहा है।
रिलायंस उद्योग समूह के प्रमुख मुकेश अम्बानी लगातार छठी बार भारत के सबसे बड़े धनकुबेर बने हैं। देश की सबसे अमीर महिला बनी हैं जिन्दल उद्योग समूह की चेयरपर्सन सावित्री जिन्दल। ‘फोर्ब्स’ द्वारा मंगलवार को जारी 100 सबसे अमीर भारतीयों की सूची में शामिल हस्तियों की आय एक साल की तुलना में करीब 3 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 259 अरब डॉलर यानी 15,897 अरब रुपये पर पहुँची है। भारत की अर्थव्यवस्था में सुस्ती के कारण अमीरों की संपत्ति में वृद्धि धीमी रही। ऊँची महंगाई दर व डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में गिरावट के कारण भी इनकी अमीरी की रफ्तार सुस्त रही।
दरअसल, इन दिनों अमेरिका सहित कई प्रमुख देशों में आर्थिक सुस्ती जारी है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। लिहाजा मुकेश अम्बानी व आर्सेलर मित्तल के प्रमुख लक्ष्मी निवास मित्तल की निजी संपत्ति में अधिक वृद्धि नहीं हुई। मुकेश की संपत्ति 21 अरब डॉलर यानी 1,289 अरब रुपये आँकी गयी जिसमें प्रतिवर्ष 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लक्ष्मी 16 अरब डॉलर यानी 982 अरब रुपये की संपत्ति के साथ दूसरे स्थान पर हैं। यों सन फार्मा के स्वामी दिलीप संघवी 13.9 अरब डॉलर अर्थात् 853 अरब रुपये के साथ तीसरे स्थान पर हैं। ‘फोर्ब्स’ की सूची में सबसे शानदार प्रदर्शन संघवी का ही रहा है जिनकी सम्पत्ति में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई। उन्होंने तीसरे स्थान से विप्रो के स्वामी अजीम प्रेमजी (847 अरब रुपये) को चौथे स्थान पर धकेला। दिलीप की सम्पत्ति 4.7 अरब डॉलर बढ़ी और प्रेमजी की संपत्ति में 1.6 अरब डॉलर जुड़ा। हाल के वर्षों में निर्माण क्षेत्र की चर्चित कम्पनी समूह शपूरजी पलोनजी उद्योग समूह के पलोनजी मिस्त्री टाटा संस के बड़े शेयरधारक के रूप में उभरे हैं। इस वर्ष उनकी सम्पत्ति घटकर 12.5 अरब डॉलर यानी 767 अरब रुपये हो गयी। वह चौथे से खिसक पाँचवें स्थान पर गिरे। उनके पुत्र साइरस मिस्त्री पिछले वर्ष  रतन टाटा के स्थान पर टाटा उद्योग समूह के प्रमुख बने।
अप्रवासी भारतीय कारोबारी हिन्दुजा बन्धु इस वर्ष 9 अरब डॉलर यानी 552 अरब रुपये की सम्पत्ति के साथ नौंवे से उठकर छठे स्थान पर आ गये। शिव नाडर भी ऊपर चढ़े, सातवें स्थान पर आ गये। अदि गोदरेज दो स्थान नीचे आये और 8.3 अरब डॉलर यानी 509 अरब रुपये की सम्पत्ति के साथ आठवें स्थान हैं। आदित्य बिड़ला समूह के अध्यक्ष कुमार मंगलम बिड़ला 7.6 अरब डॉलर (466 अरब रुपये) के साथ एक स्थान ऊपर उठकर नौंवे स्थान पर हैं। सुनील मित्तल 6.6 अरब डॉलर (405 अरब रुपये) संपत्ति के साथ फिर से दसवें स्थान पर हैं। वैसे 100 में शामिल 5 महिलाओं की कुल संपत्ति 8.83 अरब डॉलर यानी 542 अरब रुपये है जो शीर्ष-100 की कुल संपत्ति का 3 प्रतिशत है। गरीबों के देश के इन धनकुबेरों ने गरीबी दूर करने में कोई रुचि नहीं ली जबकि उन गरीबों के पैसे पर ही इनकी अमीरी कायम है।
20 परिवारों के पास 33.77 खरब रुपये
देश के 20 औद्योगिक घरानों के पास करीब 3,37,600 करोड़ रुपये (33.77 खरब) की सम्पत्ति है। शीर्ष 10 में 3 औद्योगिक घराने शामिल हैं। इनमें हिंदुजा बंधु छठे, गोदरेज परिवार आठवें व मित्तल परिवार 10वें नंबर पर है। रुईया, जिंदल व बजाज परिवार भी शीर्ष 20 में जगह बनाने में सफल रहे।

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

जदयू में अन्तर्कलह : नीतीश व शरद परेशान



-शीतांशु कुमार सहाय
घर की कोठरी में बेइज्जती हो तो केवल 2 को ही पता चलता है- एक बेइज्जत करने वाला और दूसरा बेइज्जत होने वाला। ऐसे में बाहर आकर सीना चौड़ा किया जा सकता है, चेहरे पर मुस्कान कायम रखने की कोशिश की जा सकती है। पर, जब बेइज्जती भरी सभा में हो तब? तब तो वह भी कुछ कह जायेगा जो कभी सामने खड़ा होने से भी घबराता था। कुछ ऐसा ही हुआ है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ राजगीर में जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के चिन्तन शिविर में। जदयू अध्यक्ष शरद यादव के साथ दल के नेता चिन्तन में डूबे थे, अपने-अपने चिन्तन को मंच से अभिव्यक्त भी कर रहे थे कुछ जाने-माने नेता। इसी दौरान जब राष्ट्रीय जनता दल से जदयू में आये शिवानन्द तिवारी की बारी आयी तो वे बेवाकी से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी की लगे तारीफ करने। वे रूके बिना नीतीश की खिलाफत भी करने लगे। नीतीश-सरकार के एक मंत्री नरेन्द्र सिंह ने भी तिवारी के सुर-में-सुर मिलाया। यों जदयू का अन्तर्कलह पटल पर आ गया। इस अन्तर्कलह के केन्द्र में हैं नरेन्द्र मोदी।
राज्य की जनता ने भाजपा-जदयू गठबन्धन को बहुमत दिया था। बीच में ही जब सरकार से भाजपा पृथक हुई तो कलह का अन्देशा लगाया गया था। वह अन्देशा हाल के महीनों में सच सिद्ध हो रहा है। राज्य में कलह बढ़ा मतलब अपराध में बेतहाशा वृद्धि हुई। पर, एक अन्देशा जो लगाया नहीं गया था, वह भी सामने आया, जदयू में कलह हो गया। पटना में नरेन्द्र मोदी की हुंकार रैली के दिन हुए धमाकों के बाद भाजपा-जदयू नेताओं के बीच राजनीतिक खींचतान के दरम्यान जदयू में बगावती सुर उठे हैं। राजगीर में जदयू के चिन्तन शिविर में पार्टी नेता शिवानन्द तिवारी व मंत्री नरेन्द्र सिंह ने मंच से जमकर बगावती तेवर दिखाये। पर, नीतीश ने अपने भाषण में पार्टी के नेताओं के बगावती तेवरों पर चुप्पी साधे रखी। उन्होंने नरेन्द्र मोदी व भाजपा को निशाना बनाया और मोदी के झूठ गिनाये, उन्हें अहंकारी बताया। अपने दल के अन्तर्कलह पर उनकी जुबान नहीं चली। पर, जब तिवारी की जुबान चली तो बस चलती ही गयी। उन्होंने आरोपों की झड़ी लगा दी- नीतीश ने दल में दूसरी पंक्ति का नेता पनपने ही नहीं दिया, वे जमीनी नेता हैं ही नहीं और पुराने साथियों को भूलकर चाटुकारों से घिरे हैं। मोदी के संघर्ष के कारण स्वयं को तिवारी ने मोदी का प्रशंसक बताया। यही नहीं, मोदी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुण कूट-कूटकर भरे होने के कारण उनसे डरने की बात भी स्वीकारी शिवानन्द ने। वे इससे पहले भी कई बार बगावती तेवर दिखाते रहे हैं लेकिन उनका यह अब तक का नीतीश कुमार पर सबसे बड़ा हमला है। इससे पार्टी की मुश्किलें बढ़ गयी हैं।  
इस बीच नीतीश मंत्रिमण्डल के एक सदस्य नरेन्द्र सिंह ने भी मंच से ही नीतीश की कार्यशैली पर निशाना साधा।  आरोपों की झड़ी लगाने में वे तिवारी को भी पीछे छोड़ गये। गर्म तेवर के साथ गरजते हुए सिंह ने कहा कि पार्टी में खून-पसीना बहाने वालों की अनदेखी हो रही है और दरबार लगाने वालों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उनका निशाना नीतीश का बहुचर्चित जनता दरबार है। सिंह की दहाड़ से नीतीश और शरद पर भी असर पड़ा; क्योंकि उन्होंने यह भी कह डाला कि बगावती तेवर के बदले यदि वे सरकार या दल से निकाले भी जाते हैं तो उन्हें कोई फिक्र नहीं है। एक टूटता है तो एक जुड़ता है। एक रोता है तो एक हँसता है। इसी तर्ज पर जदयू के सम्भावित टूट का फायदा लेने को भाजपा तैयार है। तभी तो नीतीश-सरकार में भाजपा कोटे से मंत्री रहे गिरिराज सिंह ने तिवारी के लिए भाजपा के दरवाजे खोले। वैसे जदयू नेता केसी त्यागी पार्टी में बगावत से इनकार कर रहे हैं। पर, धुआँ उठा है तो आग की सम्भावना से इनकार कैसे किया जा सकता है!

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

पटना धमाके पर राजनीति जारी : जनता की सुधि नहीं





-शीतांशु कुमार सहाय
यह लोकतन्त्र है। यहाँ हर चीज राजनीति से जुड़ी है। हर चीज पर राजनीति होती है। लिहाजा पटना में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर से प्रधानमंत्री के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी की हुंकार रैली से पूर्व हुए 7 विस्फोटों पर भी राजनीतिक सुर सुनाई दे रहे हैं। पक्ष व विपक्ष के नेताओं की ओर से संवाददाता सम्मेलन आयोजित कर या सोशल वेबसाइटों के जरिये अपने सुर अलाप रहे हैं। रविवार को भाजपा नेताओं के हुंकार के बीच आम जनता के बीच से जो चीत्कार उठी, उस पर किसी का ध्यान नहीं है। ध्यान होगा भी कैसे, क्योंकि फिलहाल बिहार में चुनाव तो है नहीं कि कुछ बातें जनता के पक्ष में भी की जाये! ऐसी ही घटना यदि उन 5 राज्यों में होती, जहाँ विधान सभाओं के चुनाव हैं तो इन नेताओं के सुर बिल्कुल अलग होते। जनता के पक्ष में नेताओं के सुर न अलापने के पीछे तर्क केवल यही है कि इन दिनों नेताओं की नजर में बिहारी मतदाता नहीं हैं। वर्तमान सन्दर्भ ने यह जता दिया कि राजनीति की नजर में जनता के 2 रूप हैं- एक तो आमजनता है, जिसकी सुधि लेना वाजिब नहीं समझते राजनीतिज्ञ और दूसरा रूप है मतदाता का। इनमें दूसरा रूप सभी दलों को पसन्द है। तभी तो सभी दलों ने साबित कर दिया कि उन्हें जनता का आम रूप नहीं मतदाता रूप पसन्द है।
विस्फोट के बाबत भाजपा के सुर में रूखापन है। वहीं, केन्द्र में सत्तासीन काँग्रेस व बिहार में सत्ता से चिपकी जनता दल युनाइटेड के सुर में गजब का ओछापन दीख रहा है। काँग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने रविवार को ट्विटर पर लिखा कि दोषी का पता लगाना नीतीश कुमार के लिए चुनौती है। वे नीतीश को नसीहत देते हैं कि बम धमाकों के लिए जिम्मेदार लोगों को जल्द न पकड़ा गया तो बिहार में नरेन्द्र मोदी हीरो हो जायेंगे। दिग्विजय ने शब्द तीर चलाया कि नरेन्द्र मोदी की लॉन्चिंग के लिए यह परफेक्ट सेटिंग है। उनके सुर बताते हैं कि धमाके में आतंकी की नहीं, बल्कि भाजपा की सेटिंग है। इसी तरह रविवार को ही जदयू सांसद
साबिर अली ने भी धमाके के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया। सरकार और प्रशासन को क्लीन चिट देते हुए वे कहते हैं कि बिहार में भाजपा के सत्ता से अलग होने से ही ऐसी घटना घटी। पर, जब जाँच एजेंसियों ने पड़ताल आगे बढ़ायी तो इण्डियन मुजाहिदीन (आईएम) के हाथ होने की बात सामने आयी। आईएम का तहसीन अख्तर उर्फ मोनू के अलावा 2 अन्य आतंकी इम्तियाज व तारिक पुलिस की पकड़ में आये हैं। इनसे महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ मिल रही हैं। ऐसे में काँग्रेस के बयान बहादुर दिग्विजय व जदयू के साबिर के भाजपा पर लगाये आरोप निराधार सिद्ध हुए। अब वे कुछ नया कहने को अवश्य विचार कर रहे होंगे। ऐसी घटनाओं के बाबत त्वरित प्रतिक्रिया स्वरूप विपक्षियों पर आरोप तय करने से नेताओं को बाज आना चाहिये।

यों भाजपा ने कई प्रश्न बिहार सरकार से पूछे हैं। पार्टी को लगता है कि सुरक्षा में भारी चूक थी जबकि केन्द्र ने पुख्ता सुरक्षा की नसीहत दी थी। हालाँकि किसी केन्द्रीय सूचना से सोमवार को बिहार के एक वरीय आरक्षी अधिकारी ने इंकार किया है, जैसा रविवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था। इस बीच बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि विस्फोट तभी आरंभ हो गये थे जब नरेन्द्र मोदी पटना के हवाई अड्डे पर आये भी नहीं थे। उनकी बात मानें तो धमाके के बाद रैली को रद्द करने से भगदड़ मच सकती थी, इसलिये मोदी व अन्य नेताओं ने काफी विचार के बाद रैली को संबोधित किया। वैसे गौर करें भाजपा के अरुण जेटली के प्रश्नों पर तो पता चलता है कि गाँधी मैदान में नरेंद्र मोदी की रैली के लिए सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी थे। इतनी बड़ी रैली थी लेकिन पुलिस का कोई भी बड़ा अधिकारी मौके पर मौजूद नहीं था। प्रशासनिक चूक का इससे बड़ा सबूत नहीं हो सकता; क्योंकि इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए गाँधी मैदान पर कोई बड़ा सुरक्षा एक्सपर्ट नहीं था। कोई भी बड़ा पुलिस अधिकारी भाजपा नेताओं से नहीं मिला। मोदी पर हमले का अलर्ट केन्द्र द्वारा 23 सितंबर को ही सभी राज्यों को दिया गया था। सरकार क्यों अपनी नाकामी छिपाने के लिए अलर्ट की बात से इनकार कर रही है? धमाके के बाद सोमवार भी जिंदा बम मिले तो रविवार को पुलिस ने कैसे तलाशी ली थी?

अरुण जेटली के बिहार सरकार से प्रश्न-
-नीतीश सरकार ने गृह मंत्रालय के अलर्ट के बाद भी कोई कार्रवाई क्यों नहीं की?
-मोदी पर हमले का अलर्ट 23 सितंबर को ही सभी राज्यों को दिया गया था। सरकार क्या अपनी नाकामी छिपाने के लिए अलर्ट की बात से इनकार कर रही है?
-धमाके के बाद आज भी जिंदा बम मिले, तो रविवार को पुलिस ने कैसे तलाशी ली थी?
-आतंकी गांधी मैदान तक बम ले जाने में कैसे कामयाब हुए?
-गांधी मैदान के पास बम निरोधक दस्ता क्यों नहीं तैनात था?
-गांधी मैदान के किसी गेट पर मेटल डिटेक्टर क्यों नहीं था?
-बोरा और झोला लेकर पहुंच रहे लोगों की तलाशी क्यों नहीं ली जा रही थी?
-राज्य का खुफिया विभाग क्या कर रहा था?
-पहला बम फटने के बाद भी पुलिस हरकत में क्यों नहीं आई?


अगर हुंकार रैली को रद्द कर दिया जाता तब क्या होता


-शीतांशु कुमार सहाय
भारतीय जनता पार्टी नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा- "सोचिए अगर रैली को रद्द कर दिया जाता तब क्या होता। हमारे नेताओं ने स्थिति का बहुत कुशलता से सामना किया। इन धमाकों में करीब 6 लोग मारे गए और करीब 80 घायल हो गए।" पटना में सिलसिलेवार 7 धमाकों के बावजूद भाजपा ने रैली को करने का सुविचारित निर्णय लिया। इन धमाकों के बाद भी पार्टी की ओर से पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने रैली को संबोधित किया। नरेंद्र मोदी के हवाई पट्टी पर उतरते ही पहले धमाके की खबर आ गई थी। गुजरात पुलिस के लोग तुरंत ही नरेंद्र मोदी के पास गए और उन्हें गांधी मैदान में आयोजित हुंकार रैली में जाने से मना किया। भाजपा नेताओं ने भी नरेंद्र मोदी को रैली स्थल पर न जाने की सलाह दी थी। पार्टी प्रमुख राजनाथ सिंह ने अपने होटल के कमरे से धमाकों को भी देखा। और अन्य पार्टी के नेताओं से मुद्दे पर चर्चा की। जब अन्य धमाकों की खबरें भी आई तब भी नरेंद्र मोदी और पार्टी ने यह तय किया कि वह हुंकार रैली को तय कार्यक्रम के अनुसार ही चलाएंगे। पार्टी का कहना है कि यह निर्णय इसलिए लिया गया ताकि मुद्दा धमाकों पर न केंद्रित हो जाए। सुशील कुमार मोदी का यह भी कहना है कि यह नहीं लगना चाहिए था कि नरेंद्र मोदी की ओर से यह भी संदेश नहीं जाना चाहिए था कि वह पटना से दूर भाग रहे हैं। कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह ने पार्टी के नेताओं से आग्रह किया कि मौके पर किसी भी प्रकार से भगदड़ नहीं होनी चाहिए। सुशील कुमार मोदी ने कहा- "रैली स्थल पर सुरक्षा इंतजाम में तमाम खामियां थी।"

पटना की हुंकार रैली में नरेंद्र मोदी की हुंकार / NARENDRA MODI ON HUNKAR RAILLY IN PATNA


प्रस्तुति- शीतांशु कुमार सहाय
''अगर रामायण काल को याद करें, तो माता सीता की याद आती है. अगर महाभारत काल को याद करें, तो कर्ण की याद आती है. अगर गुप्त वंश की याद करें, तो चंद्रगुप्त की राजनीति प्रेरणा देती है. गणतंत्र की बात करें, तो आज भी वैशाली का गणतंत्र पूरे विश्व में सिरमौर है. अगर हम सम्राट की बात करें तो आज भी सम्राट अशोक के बाद कोई याद नहीं आता. आज पाटलिपुत्र को याद करें तो पटना की हर गली याद आती है. अगर ज्ञान युग की बात करें तो नालंदा और तक्षशिला का स्मरण होता है. ये मेरा बिहार है भाइयों. और अगर आधुनिक युग में चले जाएं. भारत की आजादी के दो महत्वपूर्ण पड़ाव. एक महात्मा गांधी का चंपारण सत्याग्रह. दूसरा, गुजरात में गांधी का दांडी यात्रा का कालखंड. हिंदुस्तान की आजादी के ये दो महत्वपूर्ण पड़ाव हैं.''  
- नरेंद्र मोदी,  बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री 





27 अक्टूबर 2013 पटना में सीरियल बम धमाकों के बावजूद हुंकार रैली में मोदी के साथ मंच पर राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, शत्रुध्‍न सिन्‍हा, सुशील कुमार मोदी समेत तमाम बड़े नेता मौजूद रहे. बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर चुटकी लेते हुए कहा कि कुछ लोगों को छोड़कर बिहार के लोग अवसरवादी नहीं है. मोदी ने मंच पर आते ही वहां मौजूद जनता को भोजपुरी और मैथिली संबोधित किया और बिहार के गौरवशाली इतिहास का बखान किया. मोदी ने जमकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और लालू पर निशाना साधा. उन्होंने नीतीश कुमार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि जिन लोगों ने जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया को छोड़ दिया, वे बीजेपी को आसानी से छोड़ सकते हैं. नीतीश की पीएम बनने की आकांक्षा पर कटाक्ष करते हुए मोदी ने ऐसा कहा. उन्होंने कहा कि जो लोग खुद को लोहिया का शिष्य समझते हैं, उन्होंने ही लोहिया के पीठ में खंजर घोंपा है. मोदी ने नीतीश कुमार पर बीजेपी और बिहार के लोगों को धोखा देने का आरोप लगाया. पहली बार खुले तौर पर मुसलमानों का जिक्र करते हुए कहा कि बिहार अपना हज कोटा पूरा नहीं कर पाता, क्योंकि यहां के मुसलमान गरीब हैं, जबकि गुजरात के मुसलमान समृद्ध हैं और सबसे ज्यादा विकास वहां मुसलमान बहुल जिलों में दिखता है.
पढ़िये नरेन्द्र मोदी के भाषण को---
भाइयों बहनों, अगर रामायण काल को याद करें, तो माता सीता की याद आती है. अगर महाभारत काल को याद करें, तो कर्ण की याद आती है. अगर गुप्त वंश की याद करें, तो चंद्रगुप्त की राजनीति प्रेरणा देती है. गणतंत्र की बात करें, तो आज भी वैशाली का गणतंत्र पूरे विश्व में सिरमौर है. अगर हम सम्राट की बात करें तो आज भी सम्राट अशोक के बाद कोई याद नहीं आता. आज पाटलिपुत्र को याद करें तो पटना की हर गली याद आती है. अगर ज्ञान युग की बात करें तो नालंदा और तक्षशिला का स्मरण होता है. ये मेरा बिहार है भाइयों. और अगर आधुनिक युग में चले जाएं. भारत की आजादी के दो महत्वपूर्ण पड़ाव. एक महात्मा गांधी का चंपारण सत्याग्रह. दूसरा, गुजरात में गांधी का दांडी यात्रा का कालखंड. हिंदुस्तान की आजादी के ये दो महत्वपूर्ण पड़ाव हैं. भाइयों बहनों, आज आप बिहार में हुंकार रैली कर रहे हैं. हुंकार रैली. ये हुंकार किसका है. ये हुंकार हिंदुस्तान के करोड़ों-करोड़ों गरीबों का हुंकार है, जो बिहार से उठा है. भाइयों बहनों, ये सीता माता की धरती है और जब मैं सीता माता का स्मरण करता हूं. जब सीता माता का अपहरण हुआ तो सारे वानर सीता माता को खोजने के लिए निकले. लेकिन उनको कोई रास्ता नहीं सूझता था. कैसे जाएं, कहां पहुंचे. सीता माता को कैसे खोजें. तब सभी वानर उधेड़बुन में थे. तब उस समय जामवंत की नजर हनुमान जी पर पड़ी. और उस समय हनुमान जी ने जामवंत को जो कहा था, भाइयों बहनों. जामवंत ने हनुमान को कहा था, पवनतनय बन पवन समाना, का चुप साधि रहे बलवाना.
भगवान बुद्ध, महावीर, गुरु गोबिंद सिंह और जयप्रकाश नारायण ---
भाइयों-बहनों! ये हुंकार रैली पूरे देश को कह रही है का चुपि साध रहे बलवाना. मेरे देशवासियों, मेरे साथ बोलोगे. आपको कहना है. हुंकार भरो हुंकार भरो. बोलोगे. मैं बोल रहा हूं का चुप साधि रहे बलवाना. जनता चीखती है. हुंकार भरो-हुंकार भरो, देश हुंकार भरना चाहता है और इसे प्रेरणा देने का काम बिहार की धरती से हो रहा है. ये बिहार की विशेषता है. भारत को जब जब जिन चीजों की जरूरत पड़ी, बिहार ने उसे पूरा किया. जब देश को भगवान बुद्ध की जरूरत थी, बिहार ने भगवान बुद्ध दिया. जब देश को भगवान महावीर की जरूरत थी, बिहार ने भगवान महावीर दिए. जब देश की जरूरत थी, तब यही पटना की धरती है, जिसने दसवें गुरु गोविंद सिंह को दिया. सवा लाख से एक लड़ाऊं, तब गुरु गोबिंद नाम कहाऊं. और जब देश भ्रष्टाचार में डूब रहा था. लोकतंत्र खत्म होने की कगार पर था. तब यही बिहार है, जिसने जयप्रकाश नारायण को देश को दिया था.
आपके मुख्यमंत्री हमारे मेहमान---
2006-07 की घटना है. आपके मुख्यमंत्री, हमारे मित्र गुजरात आए थे. कथा सुननी है. हांएएए. तो एक शादी में आए थे. एक मेज पर खाना खा रहे थे. हमारे मेहमान थे. हमने उनको जमकर खाना खिलाया. ढोकले. खमन, गुजराती कढ़ी, हर प्रकार की मिठाई. इतना गौरव हुआ था कि उनका पेट भी भर गया और मन भी. यही इस देश की संस्कृति है. हमने मन से खिलाया था. मित्रों सार्वजनिक जीवन के उसूल होते हैं.
लालूजी को फोन किया और उनकी खबर ली---
आपने देखा होगा कि हमारे लालू जी मुझे गाली देने में कभी मौका नहीं छोड़ते. वो हमेशा कहते थे कि मैं कभी मोदी को पीएम नहीं बनने दूंगा. लेकिन तीन महीने पहले लालू जी को अकस्मात हुआ है. एक्सिडेंट हुआ. हमारे मित्र रूडी जी ने बताया. मैंने उसी वक्त लालूजी को फोन किया और उनकी खबर ली. हालचाल पूछा. मैंने मीडिया को नहीं बताया. लेकिन मैं हैरान था. लालू जी ने मीडिया को बुलाया और कहा कि देखिए गुजरात का मुख्यमंत्री. मैं इतनी गाली देता हूं. फिर भी एक्सिडेंट के बाद मेरी खबर पूछता है. मैंने कहा लालू जी, यदुवंश के राजा श्री कृष्ण भगवान हमारे गुजरात के द्वारका में बसे थे. यदुवंश से हमारा नाता है. गुजरात द्वारका आपकी धरती है. हमें प्रेम जगना स्वाभाविक है. भाइयों. मैं यदुवंश से जुड़े सभी भाइयों बहनों को कहना चाहता हूं, कृष्ण भगवान के वंशजों को कहना चाहता हूं. मैं द्वारका नगरी से कृष्ण भगवान का आशीर्वाद लेकर आया हूं. आपकी चिंता मैं करूंगा ये मेरा वादा है.
हिप्पोक्रेसी की भी सीमा होती है---
भाइयों बहनों. कभी-कभी साल में दो बार, हमारे यहां मुख्यमंत्रियों की मीटिंग होती है. पीएम उस मीटिंग को बुलाते हैं. उसमें दोपहर का लंच भी उन्हीं की तरफ से होता है. पीएम की टेबल पर 5-6 सीएम बैठते हैं साथ. एक साल पहले की बात है कि पीएम की टेबल पर हम और हमारे बिहार के मित्र मुख्यमंत्री एक ही टेबल पर आ गए. भोजन परोसा जा रहा था, मगर वह खाना नहीं खा रहे थे. इधर-उधर देख रहे थे. मैं पीएम को देखूं. उनके सामने देखूं. परेशान कि बात क्या है. फिर समझ आया. मैंने मेरे मित्र को कहा. चिंता मत करो. कोई कैमरे वाला नहीं है. खा लो. हिप्पोक्रेसी की भी सीमा होती है. हाहाहाहा...उसके बाद, जब मैं कहता हूं कि किसी भी हालत में बिहार को जंगलराज से बचाना था. उसके बाद गठबंधन की सरकार बनी.
भाजपा के मंत्रियों ने विकास यात्रा आगे बढ़ाई---
आज मैं देश के अर्थशास्त्रियों, पॉलिटिकल पंडितों का आह्रावन करता हूं. जितनी देर जेडीयू-भाजपा सरकार चली, अगर किसी ने अच्छे-से-अच्छे काम किए, विकास यात्रा आगे बढ़ाई, तो भाजपा के मंत्रियों ने. बिहार के सुधार की जो खबरें आने लगी थीं, वे भी बीजेपी के मंत्रियों और विधायकों का संकल्प था, उसी के कारण हुआ था.
हमारे लिए दल से बढ़कर देश है---
उसके बावजूद भी. एक बार सवाल आया. दो-दो चुनाव हुए. पार्टी के सामने विषय था, गुजरात से नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार में लाया जाए. मीडिया ने भी बड़ा विषय उछाल दिया था. हमारे बिहार के नेता, उनका मुझ पर इतना प्यार था. वे मुझे बुलाने के लिए इतना आतुर थे. तब मैंने सुशील जी को, नंदकिशोर जी को कहा था. मुझे बुलाने का आग्रह मत करिए. हमारा मकसद बस एक है कि बिहार में जंगलराज न होने दो. मोदी अपमानित होता है तो होने दो. नरेंद्र मोदी बिहार के बाहर रहता है तो रहने दो. बिहार में जंगलराज नहीं आना चाहिए. हमारे लिए दल से बढ़कर देश होता है. इसीलिए मेरी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं की इच्छा के बावजूद मैंने जंगलराज न आए. इसलिए अपमान सहन किया. लेकिन भाइयों बहनों. उनका इरादा नेक नहीं था. ये हमारे मित्र को चेले चपाटों ने कह दिया. कांग्रेस के साथ जुड़ जाओ. प्रधानमंत्री बनने का अवसर है. ख्वाब देखने लगे. और उन्होंने विश्वासघात भाजपा से नहीं किया है. विश्वासघात बिहार के कोटि कोटि जनों से किया है. ये विश्वासघात आपके साथ है. भाइयों बहनों मैं पूछना चाहता हूं कि क्या ये विश्वासघात है.(भीड़ चीखती है हां.). विश्वासघात करने वालों को आप सजा दोगे. साफ कर दोगे (भीड़ फिर हामी भरती है.) चंपारण में गांधी जी ने अंग्रेज मुक्त हिंदुस्तान की बात की थी.
कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार हो---
आज गांधी मैदान से बिगुल बजना चाहिए कि कांग्रेस मुक्त भारत का हिंदुस्तान का सपना साकार हो. कल रात मैं टीवी देख रहा था. कांग्रेस के मित्र परेशान हैं. मोदी शहजादा क्यों कह रहे हैं. ये नौबत क्यों आई है. अगर मैं शहजादे कहता हूं तो आपको बुरा लगता है, तो इस देश को भी इस वंशवाद से बुरा लगता है. कांग्रेस वादा करे, वह वंशवाद छोड़ देगी. मैं शहजादा कहना छोड़ दूंगा. जेपी लोकतंत्र के लिए जिए, जूझते रहे, उसके लिए जेल में जिंदगी गुजारने को तैयार रहे.
लोकतंत्र के 4 दुश्मन---
लोकतंत्र के चार दुश्मन होते हैं. एक दुश्मन है. परिवारवाद. वंशवाद. जातिवाद का जहर, सत्ता का भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता. देश का दुर्भाग्य है मित्रों कि आज बिहार की राजनीति में ये सभी दुश्मन उभर कर सामने आ रहे हैं. भारत सरकार, यूपीए सरकार के दस साल पूरे होने जा रहे हैं. मैं पूछना चाहता हूं. जब पिछली बार चुनाव में कांग्रेस के नेता आए थे. उन्होंने कहा था कि 100 दिन में महंगाई हटाएंगे. कांग्रेस ने वादा किया था. जरा जोर से जवाब दो. महंगाई हटी. महंगाई घटी. महंगाई बढ़ी...
कांग्रेस ने वादाखिलाफी की---
भाइयों जिस कांग्रेस ने आपके साथ वादाखिलाफी की. आज दस साल हो गए. वे दिल्ली के तख्त पर बैठे हैं. क्या उन्हें घर भेजने की नौबत आई है. क्या आप उनको विदा करोगे. आज मैं सार्वजनिक रूप से आह्वान करता हूं. आपने 2004 में 2009 में सरकार बनाई. कॉमन एजेंडा के तहत आपने देश की भलाइ के लिए बात कही थी. पहले सौ दिन में जो काम करने को कहे थे, उसके भी अस्सी फीसदी नहीं किए. ऐसे लोगों को माफ करना चाहिए क्या. ये कांग्रेस ने सत्ता पाते ही कहा था कि गंगा की सफाई करेंगे. आज पूरा गंगा का पट देख लीजिए. एक प्रकार से बीमारियों का गढ़ बनाकर रख दिया है. क्या हमारी प्राण प्रिय गंगा साफ होनी चाहिए कि नहीं. कांग्रेस को ये वादा पूरा करना चाहिए था कि नहीं. मेरे नौजवान दोस्तों, ये कांग्रेस ने कहा था कि वे सत्ता में आएंगे और नौजवानों को रोजगार देंगे. वो तो दिया नहीं, महंगाई बढ़ा दी. आज गरीब के घर चूल्हा नहीं जलता. बच्चे रात रात रोते हैं. मां आंसू पीकर सुलाती है. ये पाप किसका है. क्या गरीब की थाली में रोटी नहीं होनी चाहिए. भाइयों बहनों. मेरा किसान आज महंगाई की मार से वो भी मर रहा है. जिस तरह से खाद की कीमतें बढ़ रही हैं. और ये सरकार देखिए. किसान को खाद मिल नहीं रहा है. लेकिन आपके बरौनी में खाद का जो कारखाना लगा है, उस पर ताले लगे हुए हैं. देश को नुकसान हो रहा है. लेकिन ये दिल्ली की सरकार. इसे न किसान की परवाह है, न गरीब की परवाह है.
विकास में बिहार 20वें नंबर पर---
भाइयों बहनों. हिंदुस्तान में गरीबों की भलाई के लिए एक बीस सूत्री प्रोग्राम चलता है. हर सरकार उसे लागू करती है. और भारत सरकार हर छह महीने में उसका लेखा-जोखा लेती है. और उसका रिपोर्ट प्रकट करती है. उसको लागू करने वाले पहले पांच स्थान पर भाजपा शासित राज्य हैं. लेकिन बिहार का नंबर. ये हमारे मित्र गरीबों की बातें करते हैं. बीसवें नंबर पर खड़ा है. ये गरीबों के नाम पर रोटी सेंकने वाले लोग. मजाक बना रखा है. जिस प्लानिंग कमीशन के अध्यक्ष पीएम हैं. वह कहता है कि अगर आपकी घर की आय दिन भर की 26 रुपये है. वह गरीब नहीं है. क्या आप सहमत हैं. अरे 26 रुपये में परिवार को चाय नहीं मिलती. उनका एक नेता कहता है कि पांच रुपये में खाना मिल जाता है. इन्हें गरीबी और भूख का पता नहीं है. इन्होंने गरीबी नहीं देखी. हमने गरीबी देखी है. उसमें पैदा हुए हैं. जिया है. मित्रों बिहार ने ढेर सारे रेल मंत्री दिए. भाइयों बहनों मैं रेल मंत्री सोच भी नहीं सकता हूं. मैं तो रेलवे के डिब्बे में चाय बेचते यहां आया. और चाय बेचने वाले को रेल की मुसीबतों का जितना पता होता है, उतना रेल मंत्री को भी नहीं पता होता. टीटी को संभालना पड़ता, गार्ड को संभालना पड़ता. ट्रेन में कैसे भी करके चढ़ना पड़ता. मैंने सब संभाला है.ये लोग गरीबी की बात कर रहा हूं.
डूब मरो मेरी सेना का अपमान करने वाले---
'दीने इलाही का बेदाग बेड़ा,
वो डूबा दहाड़े में आकर गंगा में आकर'
ये ताकत है इस जमीन की. सिकंदर को यहां लाकर पटका. जिस भूमि ने सिकंदर के इतिहास को थाम लिया. उसी भूमि पर हिंदुस्तान की सीमा पर मेरे बिहार के जमीन वतन की रक्षा कर रहे थे. पाकिस्तानियों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया. वे शहीद हुए. हिंदुस्तान का हर बच्चा, शहीदों के लिए गौरवगान करता है. प्रेरणा लेता है. लेकिन यहां एक ऐसी सरकार बैठी है. जिसका मंत्री कहता है कि सेना में तो मरने के लिए ही जाना जाता हो. डूब मरो मेरी सेना का अपमान करने वाले. अरे दुश्मन जो सेना के जवानों को मारते हैं, उनके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए और आप कह रहे हो कि वो सेना में मरने के लिए जाते हैं.बिहार के मेरे भाइयों. अपमान सहन करोगे. नहीं का शोर.
जितना ज्यादा कीचड़ उछालोगे, कमल उतना ही खिलेगा---
भाइयों बहनों, इनको हमेशा के लिए ऐसा सबक सिखाओ कि कभी आने वाले समय में अपमान करने की हिम्मत न जुटा सकें. देश आज परिवर्तन चाहता है. चारों तरफ से हम पर कीचड़ उछाला जा रहा है. कोई बाकी नहीं रहा. पूरे देश में ऐसा माहौल बनाया गया है. लेकिन इनको मैं कह रहा हूं कि जितना ज्यादा कीचड़ उछालोगे, कमल उतना ही खिलेगा. इसलिए मैं आपसे अनुरोध कहने आ रहा हूं कि आज एक नए संकल्प के साथ लोग कहते हैं कि आज यहां पर ऐतिहासिक रैली हुई है. मैं कहता हूं कि ये सिर्फ ऐतिहासिक रैली नहीं है. ये नए इतिहास की नींव रखने वाली घटना है. और उसी घटना को लेकर हम जब आगे पढ़ रहे हैं. नए उमंग और उत्साह के साथ. भारत के भाग्य को बदलने के लिए हम आगे बढ़ें. आप सबका मैं बहुत बहुंत आभारी हू.
50 हजार करोड़ का पैकेज---
बिहार की बीजेपी ने दिल्ली सरकार से 50 हजार करोड़ का पैकेज मांगा है. ये मांग पूरी होनी चाहिए. आप लिखकर रखिए, अगर दिल्ली जीत ली हमने, तो 200 दिन का सवाल है. जो प्यार बिहार ने हमें दिया है. जो पलक पांवडे बिछाकर स्वागत किया है. मित्रों मेरे जीवन में कभी ऐसा सौभाग्य नहीं मिला. मैं आपके प्यार को ब्याज समेत चुकाऊंगा. हमारा मंत्र है विकास. सारी समस्याओं का समाधान है.
मुसलमानों की बात---
जो लोग मुसलमानों की बात करते हैं. उनको भी कहना चाहता हूं. मेरे मुसलमान भाई हज यात्रा के लिए जाते हैं. हर एक राज्य का कोटा तय हुआ. गुजरात के मुसलमानों के लिए कोटा है चार हजार आठ सौ का. बिहार के लिए सात हजार से कुछ ज्यादा. बिहार में ये जो सांप्रदायिक सदभाव की बातें कर रहे हैं. बिहार का कोटा है सात हजार का, जाने वालों की एप्लिकेशन आती हैं सिर्फ छह हजार. क्यों क्योंकि बिहार के गरीब मुसलमान के पास पैसे नहीं हैं. जाएगा कैसे. और गुजरात में हज का कोटा साढ़े चार हजार है. लेकिन अर्जी आती है चालीस हजार की. ये क्यों आती हैं. क्योंकि वहां का मुसलमान सुखी है. गुजरात में कच्छ औऱ भरूच का जिला, जहां सबसे ज्यादा मुसलमानों की सबसे ज्यादा आबादी है. अगर पूरे गुजरात में किसी जिले की सबसे ज्यादा प्रगति हो रही है, तो वह इन्हीं दोनों जिलों की हो रही है. ये लोगों के हाथ में हमारे विरोधी धूल झोंक रहे हैं. मैं गरीब मुसलमानों से. मैं गरीब हिंदू भाइयों से पूछ रहे हैं. मेरा गरीब हिंदू भाई बताए कि आपको मुसलमानों के खिलाफ लड़ना है. या गरीबी के खिलाफ. (भीड़ गरीबी के खिलाफ) मैं गरीब मुसलमान से पूछना चाहता हूं कि आपको हिंदू के खिलाफ लड़ना है. या गरीबी के खिलाफ (भीड़ गरीबी के खिलाफ)  आओ हम दोनों मिलकर गरीबी के खिलाफ लड़ाएं. आज ये देश को उल्टी सलाह दे रहे हैं. मैं आपको वादा करने आया हूं. मैं कहने आया हूं. हमारी सरकार का एक ही मजहब है और ये मजहब है इंडिया फर्स्ट. नेशन फर्स्ट. भारत सबसे आगे.सरकार की एक ही भक्ति है, भारत भक्ति, एक ही शक्ति है. सवा अरब लोगों की शक्ति. इसी मंत्र के साथ आगे बढ़ना है.
भारत माता की जय-वन्दे मातरम्---
मेरे साथ दोनों मुट्ठी बंद कर पूरी ताकत से बोलिए. भारत माता की जय...पूरा हिंदुस्तान आपको देख रहा है. बोलिए वन्दे मातरम्. मेरी एक छोटी सी प्रार्थना है. आप यहां से जाएंगे. कोई जल्दबाजी नहीं करेगा. गांव तक सलामत जाएँगे. किसी कार्यकर्ता को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए. शांति से जाओगे. जल्दबाजी नहीं करोगे.और दूसरी बात हमें शांति और एकता को बनाए रखना है. किसी भी हाल में शांति पर चोट नहीं आनी चाहिए. हिंदुस्तान में कहीं भी शांति पर चोट नहीं आनी चाहिए. ये संकल्प लेकर जाइए पूरी ताकत से बोलिए...वन्दे मातरम्!


रविवार, 27 अक्तूबर 2013

‘हुंकार रैली’ का आगाज : ऊपर हुंकार, नीचे चीत्कार






-शीतांशु कुमार सहाय
आखिरकार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा महीनों से प्रचारित व जनता द्वारा प्रतीक्षित ‘हुंकार रैली’ का आगाज पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान में हुआ। इसका तात्कालिक अंजाम बहुत बुरा हुआ। दूरगामी अंजाम तो मिशन-2014 से जुड़ा है पर तत्काल तो आधे दर्जन लोग विस्फोट की भेंट चढ़ गये। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी की चर्चित रैली के ठीक पहले पटना जंक्शन पर व आयोजन स्थल गाँधी मैदान के निकट सिलसिलेवार 7 विस्फोट हुए जबकि एक विस्फोट बम को निष्क्रिय करते समय हुआ। इसके बावजूद नरेन्द्र के साथ भाजपा का पूरा कुनबा मंच पर उपस्थित हुआ और विस्फोट की पुनरावृत्ति के डर से कुछ भागते और कुछ मैदान में डटे बिहारियों की भीड़ को सम्बोधित किया। इस दौरान भारतीय लोकतन्त्र का अजीब नजारा दिखाई दिया। ऊपर मंच पर तन्त्र के गिने-चुने चेहरे अति सुरक्षा में अपने विरोधियों पर वाक्तीर चला रहे थे, हुंकार भर रहे थे। नीचे लोक यानी जनता अपनों को खोज रही थी, चीत्कार कर रही थी। जाहिर है कि जो असमय काल-कवलित हो गये, उनके परिजनों के बिहार सरकार के 5 लाख रुपये के मुआवजे के बावजूद गम कम नहीं होंगे।
आखिर ऐसी भीड़ को बुलाने वाले किस हैसियत से हजारों-लाखों को बुला लेते हैं? आयी भीड़ को नियन्त्रित व उनकी सुरक्षा के बाबत उनके पास कैसी तैयारी होती है? चीत्कार कर रही जनता की आवाज भाजपा के दिग्गजों को सुनाई नहीं दी या यों कहें कि सुनकर भी अनसुना कर दिया गया। अनसुना करना भी जरूरी था; क्योंकि धर्म कहता है कि चाहे जितनी उलझनें आयें, पहले लक्ष्य को बेधो, उसे पूरा करो। भाषण के दौरान रामायण व महाभारत के प्रसंगों को सुनाने वाले नरेन्द्र मोदी को अर्जुन की भाँति मछली की आँख ही नजर आ रही थी। इसलिये भाजपा के दिग्गजों ने पहले मंच से हुंकार भर ली और फिर अपने दूसरे दर्जे के नेताओं को पटना चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल व अन्य अस्पतालों में भेजा कि वे दर्जनों घायलों का हाल-चाल जानकर दलीय कर्तव्य की इतिश्री कर लें। यही होना था, यही हुआ। अब लोक लाज से भले ही पहले दर्जे के नेता भी तीर्थ की तरह अस्पताल से घूम आयेंगे! यह लोकतन्त्र का ऐसा कड़वा सच है जिस पर विचार तो अवश्य ही किया जाना चाहिये।  
अब हर घटना की तरह मोदी के भाषण से पहले पटना में हुए बम धमाकों पर भी राजनीतिक रोटी सेंकी जा रही है। बम धमाकों के पीछे किसका हाथ है, इसकी जाँच जारी है लेकिन इस मसले पर सियासत शुरू हो गयी है। भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा है कि ऐसी घटनाओं से उनकी पार्टी के कार्यकर्ता नहीं डरेंगे और रैली में लोगों की भीड़ कम नहीं होगी। वहीं, जदयू सांसद साबिर अली ने नीतीश सरकार और प्रशासन को क्लीन चिट देते हुए भाजपा पर ही सवाल उठा दिये हैं। उन्होंने कहा कि बिहार में भाजपा के लोग जब से सत्ता से अलग हुए हैं, तभी से ऐसी घटनाएँ सामने आ रही हैं। ये लोग (भाजपा के लोग) सत्ता के लिए लोगों का खून बहाने से नहीं हिचकेंगे। काँग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया है, दोषी का पता लगाना नीतीश कुमार के लिए चुनौती है। नीतीश को बम धमाकों के लिए जिम्मेदार लोगों को जल्द-से-जल्द पकड़ लेना चाहिये, नहीं तो बिहार में मोदी की लॉन्चिंग के लिए यह परफेक्ट सेटिंग होगी। मतलब यह कि किसी भी दल को मरने या घायल होने वालों की फिक्र नहीं है। फिक्र है अपनी राजनीति चमकाने की!

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

आप न रोएँ प्याज के आँसू : बदल लें थोड़े समय के लिए आदत


-शीतांशु कुमार सहाय
जहाँ खाद्य पदार्थों के सर्वाधिक किस्मों की भरपूर पैदावार होती है, वहाँ केवल एक खाद्य पदार्थ की कीमत बढ़ने पर इतना हंगामा! भारत में खाद्य समस्या की कई वजहों में एक यह भी है कि भारतीय परम्परागत भोजन में तनिक बदलाव नहीं चाहते, क्षणिक परिवर्तन भी उन्हें नागवार गुजरता है। इसका मतलब यह नहीं कि भोजन को पूरी तरह से बदलकर फास्ट फूड ही सेवन किया जाये। यहाँ कहने का आशय यह है कि विश्व में सर्वाधिक किस्म के खाद्य भारत में उपजाये जाते हैं। इसका एक फायदा यह भी लिया जा सकता है कि कम उपज, जमाखोरी, परिवहन की गड़बड़ी या त्रुटिपूर्ण वितरण आदि कारणों से जब किसी एक भोज्य-सामग्री की कीमत बढ़ जाये तो वैकल्पिक दूसरी भोज्य-सामग्री का सेवन किया जा सकता है; बल्कि किया ही जाना चाहिये। ऐसा करने से महंगाई का असर कम महसूस होगा, बाजार में माँग घटने से छोड़ी गयी महंगी भोज्य-सामग्री की कीमत घटेगी और कृत्रिम मूल्य-वृद्धि करने वाले हतोत्साहित भी होंगे। जब ये 3 प्रमुख फायदे हैं तो थाली में कुछ अलग परोसने में हर्ज ही क्या है? यदि सुधी पाठक ऐसा करने लगंे तो यकीनन उन्हें प्याज के आँसू रोना नहीं पड़ेगा।

1947 के बाद पहली बार प्याज ने चटकारे लेकर खाने वालों को मोरारजी देसाई के शासन काल में रुलाया था। उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में प्याज ने आँसू निकाला। अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र का कमाल दीख रहा है कि देश की राजधानी नयी दिल्ली में प्याज ने प्रति किलोग्राम मूल्य के मामले में शतक लगाया है। कई नकारात्मक कीर्तिमान मनमोहन के काल में बने जिनमें प्याज की वर्तमान महंगाई भी है। प्याज की कीमत के मामले में भी वर्तमान प्रधानमंत्री ने पिछले दोनों प्रधानमंत्रियों को पीछे छोड़ दिया है। महंगे प्याज के राजनीतिक चक्कर में काँग्रेस पिस रही है। केन्द्र में तो उसकी सरकार है ही नयी दिल्ली में भी शीला दीक्षित के नेतृत्व में काँग्रेस ही सत्तासीन है जिनके निर्देश पर दिल्ली के अधिकारी महाराष्ट्र के नासिक में हजार टन प्याज न मिलने पर राजस्थान के अलवर में जा रहे हैं। इस मूल्य-वृद्धि के पीछे कम उपज जिम्मेवार नहीं है। पिछले 10 सालों में प्याज की पैदावार में 300 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। भारत में 2002-2003 में 42 लाख मीट्रिक टन प्याज की पैदावार हुई थी जो 10 साल बाद 2012-2013 में 163 लाख मीट्रिक टन तक जा पहुँचा है। इन्हीं 10 सालों में भारत की जनसंख्या महज 1.7 प्रतिशत बढ़ी है।

ऐसा भी नहीं है कि प्याज की पैदावार में इस साल अचानक कोई कमी आयी है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले नासिक स्थित राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अनुसंधान और विकास फाउंडेशन के उप निदेशक एचआर शर्मा के अनुसार 2013-2014 में प्याज की पैदावार 10-15 प्रतिशत बढ़ने वाली है। प्याज की कमी के पीछे निर्यात या प्रोसेसिंग उद्योग की भारी खपत भी कारण नहीं हैं। कृषि मंत्रालय के अंतर्गत ही कार्यरत ‘प्याज और लहसुन अनुसंधान संस्थान’ के निदेशक जयगोपाल का कहना है कि समूची पैदावार का 10 प्रतिशत ही निर्यात होता है और इतना ही प्रोसेसिंग उद्योग को दिया जाता है। प्याज की कमी के पीछे आपूर्ति तंत्र जिम्मेवार है। इस साल के शुरुआत में भारतीय प्रतियोगिता आयोग (सीसीआई) ने भारत के प्याज बाजार पर एक रपट तैयार की थी, जिसमें कहा गया था कि बाजार के हर स्तर में कमीशन एजेंट अपना हिस्सा लेने के लिए बैठे हैं और इस दलाली के कारण एक ओर किसान तो दूसरी ओर ग्राहक परेशान हैं। सीसीआई की सदस्य गीता गौरी के अनुसार, दलाली तंत्र को तोड़ने के लिए रपट की प्रतियाँ राज्य सरकारों को भेजी गयीं पर किसी राज्य ने कार्रवाई नहीं की, नतीजतन प्याज की कीमत बढ़ती गयी।

यह रपट प्याज क्षेत्र में आने वाली 11 मण्डियों के किसानों, होलसेल व्यापारियों, कमीशन एजेंट्स, खुदरा दुकानदारों व ग्राहकों से मिलकर ‘इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एण्ड इकोनॉमिक चेंज’ ने तैयार की। जब यह सर्वेक्षण सीसीआई ने कराया था तब पाया कि किसानों से प्याज महज 5 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से लिया जाता है और वही प्याज पुणे व बेंगलुरु में पहुँचकर 20 रुपये प्रति किलोग्राम या इससे अधिक हो जाता है। सीसीआई की सदस्य गीता गौरी बताती हैं- हमने पाया है कि बड़े व्यापारी एक जटिल तंत्र बनाए हुए हैं, जिनसे वह प्राथमिक मण्डी से लेकर मूल्य तक को प्रभावित करते हैं। व्यापारी मण्डियों में नीलामी तक नहीं होने देते। गीता गौरी के अनूसार, चूँकि कृषि राज्य सूची का विषय है, हम अपनी रपट राज्य सरकारों को भेज सकते हैं, कुछ कर नहीं सकते। ...तो वर्तमान परेशानी का हिस्सा आप न बनें, थोड़े समय के लिए रुचि में बदलाव ले आयें।

2 पत्र और प्रश्न हजार : एसोचैम और पीसी पारेख के पत्र से खलबली




-शीतांशु कुमार सहाय
इन दिनों खलबली मची है केन्द्रीय सरकार के महकमे में। साथ ही सरकार पर आक्रामक होता जा रहा है उद्योग जगत। इस पसोपेश के केन्द्र में हैं 2 पत्र। एक ताजा पत्र है और दूसरा एक पुराना पत्र है जो इन दिनों सरकारी गलियारे से बाहर आकर सरकार के गले की फांस बन गया है। ताजा पत्र शुक्रवार को उद्योगपतियों का संगठन वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (एसोचैम) ने प्रधानमंत्री के नाम जारी किया। यह खुला पत्र है जिसमें कोयला घोटाले में फंसे उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला की तरफदारी की गयी है। कोयला घोटाले की पड़ताल कर रही केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआइ) ने जब बिड़ला पर प्राथमिकी दर्ज की तो एसोचैम की भौंहें तन गयीं। पूरा उद्योग व वाणिज्य जगत बिड़ला के समर्थन में दीखने लगा। नतीजतन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नाम एक खुली चिट्ठी लिखकर कड़े शब्दों में अपनी नाराजगी जतायी है। दूसरा पत्र पीसी पारेख का है जिसे उन्होंने वर्ष 2005 में कोयला सचिव रहते उस वक्त के केन्द्रीय मंत्रिमंडल सचिव को लिखी थी।



कांग्रेस नेतृत्व वाली केन्द्र में सत्तासीन मनमोहन सिंह की सरकार का शासन काल नित्य उजागर होने वाले घोटालों के लिए याद किया जाता रहेगा। प्रत्येक नया घोटाला पिछले घोटाले के रिकॉर्ड को तोड़ दे रहा है। इन दिनों सर्वाधिक चर्चित है कोयला घोटाला। इसमें शक की सूई प्रधानमंत्री के तरफ भी घूम रही है। इस घोटाले को जिस काल में अंजाम दिया गया, उस काल में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) प्रमुख शिबू सोरेन व मनमोहन सिंह बतौर कोयला मंत्री कार्यरत थे। शिबू ने इस घोटाले से अपने को बचाने के लिए झारखण्ड में झामुमो-भाजपा गठबन्धन वाली अर्जुन मुण्डा की सरकार को गिरा दिया। फिर कांग्रेस के साथ गठबन्धन कर अपने पुत्र हेमन्त सोरेन को झारखण्ड का मुख्यमंत्री बनवा दिया। बाद में कोयला विभाग का प्रभार प्रधानमंत्री के पास आ गया। मनमोहन सिंह के कोयला मंत्री रहते ही ज्यादा घपले हुए पर अब तक उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज नहीं की गयी है। उन्हें या अन्य बड़ी हस्तियों को बचाने के लिए घोटाले से सम्बन्धित कई संचिकाओं को ही नष्ट कर दिया गया। सीबीआइ व न्यायालय को संचिकाएं गुम होने की सूचना तो दे दी गयी पर संचिकाओं को हिफाजत के साथ रखने की जिम्मेदारी जिस अधिकारी या कर्मचारी की थी, उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गयी। ऐसे में प्रश्न उठता है कि संचिकाएं गुम हुईं कि गुम कर दी गयीं। तत्कालीन कोयला सचिव पीसी पारेख ने जो पत्र 2005 में उस वक्त के कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी को लिखी थी, उसमें कोयला मंत्रालय पर गंभीर प्रश्न खड़े किये गये थे। पारेख के पत्र के अनुसार, कोयला मंत्रालय को माफिया चला रहे हैं। गौरतलब है कि उस वक्त के कोयला मंत्री शिबू सोरेन ने पारेख पर नेताओं को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया था। सोरेन इस बात से भी नाराज थे कि पारेख उनके मौखिक आदेश नहीं मानते थे। पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख का साफ कहना है कि प्रधानमंत्री का नाम डाले बिना सीबीआई चार्जशीट दाखिल कर ही नहीं सकती है। एक पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रह्मण्यम ने भी पीसी पारेख के दावों का समर्थन किया है। सुब्रह्मण्यम ने कहा कि पत्र के बावजूद कोयला माफिया पर कार्रवाई न होने का मतलब है कि केन्दीय सरकार की मंशा साफ नहीं है।

पारेख ने कहा था कि मौजूदा तंत्र में कोयला  माफिया को संरक्षण देकर बड़े पैमाने पर काला धन पैदा किया जा रहा है। जो सांसद संविधान की शपथ लेते हैं, वो आइएएस अफसरों व सार्वजनिक निगमों के अफसरो को अपनी जरूरतों के लिए ब्लैकमेल करने में लगे हैं। ये देश का दुर्भाग्य है कि देश में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जो ऐसे नेताओं की गलत हरकतों पर लगाम लगा सके। अपने पत्र के लीक होने पर पारेख ने फिर कहा है कि अब भी सिस्टम में बदलाव नहीं हुआ है। पारदर्शिता में कमी से अपराध बढ़ा है और देश में अब भी कई कोयला खदानें ऐसी हैं जहां देश के हितों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इस बीच एसोचैम ने अखबारों में विज्ञापन देकर सरकार पर आरोप लगाया और नसीहत दी जो देश में पहली बार हुआ है।


गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

मन्ना डे के रूप में हमने एक महान गायक खो दिया



-शीतांशु कुमार सहाय




जब कोई तपस्या करता है तो आंखें बंद कर लेता है। गाना मेरे लिए तपस्या है। गाते समय मैं आंखें बंद करता नहीं हूं, अपने आप बंद हो जाती हैं।
-मन्ना डे

7 दशकों तक अपनी अनोखे जादुई सुरों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देने वाली आवाज आज हमेशा के लिए खामोश हो गई। काफी समय से बीमार चल रहे बॉलीवुड के मशहूर गायक 94 साल के मन्ना डे का बैंगलोर के नारायणा अस्पताल में 24 अक्टूबर 2013 को निधन हो गया है। मन्ना डे का पार्थिव शरीर बैंगलोर के रवींद्र कला क्षेत्र में सुबह 10 बजे से दोपहर 12 तक दर्शनों के लिए रखा गया था। नारायणा अस्पताल के एक प्रवक्ता केएस वासुकी ने बताया कि मन्ना दा ने सुबह 4 बजे अंतिम सांस ली। अधिक उम्र हो जाने के कारण और गुर्दे की समस्या एवं दिल के काम करना बंद कर देने से देर रात अचानक उनकी हालत बिगड़ गई। गुरुवार 24 अक्टूबर 2013 की शाम बैंगलोर शहर के पश्चिमोत्तर इलाके में स्थित हब्बल शवदाहगृह में उनका अंतिम संस्कार हो गया। प्रबोध चंद्र डे उर्फ मन्ना डे का जन्म पिता पूर्ण चंद्र डे और माता महामाया डे के घर एक मई 1919 को कोलकाता में हुआ था। 16 अक्टूबर 2009 की शाम को मन्ना डे आखिरी बार लोगों से रूबरू हुए थे। इस महफिल में उन्होंने अपने दिल की बात कही थी।

3500 से अधिक गाने गाए---
मोहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार की तिकड़ी का चौथा हिस्सा बनकर उभरे मन्ना डे ने 1950 से 1970 के बीच हिंदी संगीत उद्योग पर राज किया। पांच दशकों तक फैले अपने करियर में डे ने हिंदी, बंगाली, गुजराती, मराठी, मलयालम, कन्नड और असमी में 3500 से अधिक गाने गाए। उनकी आवाज का इस्तेमाल जहां-जहां हुआ, कामयाबी की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ। मन्ना डे ने 1990 के दशक में संगीत जगत को अलविदा कह दिया। 1991 में आई फिल्म प्रहार में गाया गीत 'हमारी ही मुट्ठी में' उनका अंतिम गीत था। मन्ना डे ने रफी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले और किशोर कुमार के साथ कई गीत गए। उन्होंने अपने कई हिट गीत संगीतकार एस डी बर्मन, आर डी बर्मन, शंकर जयकिशन, अनिल बिस्वास, रोशन और सलील चौधरी, मदन मोहन तथा एन सी रामचंद्र के साथ दिए।

पत्नी और दो बेटियां---
मन्ना डे ने केरल निवासी सुलोचना कुमारन से शादी की और उनकी दो बेटियां रमा और सुमिता हुई। उनकी पत्नी का उनकी जिंदगी में बेहद महत्वपूर्ण रोल था और यही वजह थी कि जनवरी 2012 में सुलोचना की मृत्यु के बाद डे अपनी जिंदगी के अंतिम दिनों में एकदम उदासीन और एकांतवासी हो गए थे। वह बंगलुरु में अकेले रहते थे। डे के निधन से हिंदी फिल्म संगीत का एक अध्याय समाप्त हो गया।

प्रथम गुरु थे चाचा---
संगीत में उनकी रूचि अपने चाचा कृष्ण चंद्र डे की वजह से पैदा हुई जो खुद भी न्यू थियेटर कंपनी के ख्यातिनाम गायक और अभिनेता थे। मन्ना नाम उन्हें उनके इन्हीं चाचा ने दिया था। संगीत की प्रारंभिक शिक्षा चाचा केसी डे से हासिल की। उस्ताद अब्दुल रहमान खान और उस्ताद अमन अली खान से भी उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखा।

बादल खान ने मन्ना डे की प्रतिभा को पहचान लिया---
मन्ना डे के बचपन के दिनों का एक दिलचस्प वाकया है। उस्ताद बादल खान और मन्ना डे के चाचा एक बार साथ-साथ रियाज कर रहे थे। तभी बादल खान ने मन्ना डे की आवाज सुनी और उनके चाचा से पूछा यह कौन गा रहा है। जब मन्ना डे को बुलाया गया तो उन्होंने अपने उस्ताद से कहा, बस ऐसे ही गा लेता हूं। बादल खान ने मन्ना डे की छिपी प्रतिभा को पहचान लिया। इसके बाद वह अपने चाचा से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मन्ना डे 40 के दशक में अपने चाचा के साथ संगीत के क्षेत्र में अपने सपनों को साकार करने के लिए मुंबई आ गए। 1943 में फिल्म तमन्ना. मे बतौर प्लेबैक सिंगर उन्हें सुरैया के साथ गाने का मौका मिला। हालांकि इससे पहले वह फिल्म रामराज्य में कोरस के रुप में गा चुके थे। दिलचस्प बात है कि यही एक एकमात्र फिल्म थी, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था।

सचिन देव बर्मन की सलाह पर बने गायक---
हालांकि उनके पिता चाहते थे कि वो बड़े होकर वकील बने लेकिन मन्ना डे ने संगीत को ही चुना। कलकत्ता के स्कॉटिश कॉलेज में पढ़ाई के साथ-साथ मन्ना डे ने केसी डे से शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं। कॉलेज में संगीत प्रतियोगिता के दौरान मन्ना डे ने लगातार 3 साल तक ये प्रतियोगिती जीती। आखिर में आयोजकों को ने उन्हें चांदी का तानपुरा देकर कहा कि वो आगे से इसमें हिस्सा नहीं लें। 23 साल की उम्र में मन्ना डे अपने चाचा के साथ मुंबई आए और उनके सहायक बन गए। उस्ताद अब्दुल रहमान खान और उस्ताद अमन अली खान से भी उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखा। इसके बाद वो सचिन देव बर्मन के सहायक बन गए। इसके बाद वो कई संगीतकारों के सहायक रहे और उन्हें प्रतिभाशाली होने के बावजूद जमकर संघर्ष करना पड़ा। 1943 में आई फिल्म ‘तमन्ना’ के जरिए उन्होंने हिन्दी फिल्मों में अपना सफर शुरू किया और 1943 में बनी ‘रामराज्य’ से वे प्लैबैक सिंगर बन गए। सचिन दा ने ही मन्ना डे को सलाह दी कि वे गायक के रूप में आगे बढ़ें और मन्ना डे ने सलाह मान ली। 1950 में मशाल उनकी दूसरी फिल्म थी, जिसमें मन्ना डे को एकल गीत उपर गगन विशाल गाने का मौका मिला, जिसे संगीत से सजाया था सचिन देव बर्मन ने। 1952 में डे ने एक ही नाम और कहानी वाली बंगाली तथा मराठी फिल्म अमर भुपाली के लिए गीत गाए और खुद को एक उभरते बंगाली पार्श्र्वगायक के रूप में स्थापित कर लिया।

अपने आदर्श भीमसेन जोशी के मुकाबले में गाना पड़ा---
डे साहब की मांग दुरूह राग आधारित गीतों के लिए अधिक होने लगी और एक बार तो उन्हें 1956 में बसंत बहार फिल्म में उनके अपने आदर्श भीमसेन जोशी के मुकाबले में गाना पड़ा। 'केतकी गुलाब जूही' बोल वाले इस गीत को शुरू में उन्होंने गाने से मना कर दिया था।

मधुशाला को स्वर---
मन्ना डे केवल शब्दो को ही नहीं गाते थे, अपने गायन से वह शब्द के पीछे छिपे भाव को भी खूबसूरती से सामने लाते थे। शायद यही कारण है कि प्रसिद्ध हिन्दी कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कृति मधुशाला को स्वर देने के लिये मन्ना डे का चयन किया।

प्रसिद्ध गीत---
उनके गाए मशहूर गीतों में 'आजा सनम मधुर चांदनी में हम', 'चुनरी संभाल गोरी', 'जिंदगी कैसी है पहेली', 'चलत मुसाफिर मोह लियो रे', 'तेरे बिन आग ये चांदनी', 'मुड़ मुड़ के न देख', 'ऐ भाई जरा देख के चलो', 'यशोमती मईया से बोले नंदलाला', 'ऐ मेरे प्यारे वतन', 'ऐ मेरी जोहरा जबीं' और 'यारी है ईमान मेरा' जैसे गीत शामिल हैं। साल 1961 मे संगीत निर्देशक सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में फिल्म काबुलीवाला की सफलता के बाद मन्ना डे शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचे। फिल्म काबुलीवाला में मन्ना डे की आवाज में प्रेम धवन रचित यह गीत, ए मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन आज भी श्रोताओं की आंखों को नम कर देता है। प्राण के लिए उन्होंने फिल्म उपकार में कस्मे वादे प्यार वफा और जंजीर में यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी जैसे गीत गाए। उसी दौर में उन्होंने फिल्म पड़ोसन मे हास्य अभिनेता महमूद के लिए एक चतुर नार बड़ी होशियार गीत गाया तो उन्हें महमूद की आवाज समझा जाने लगा। आमतौर पर पहले माना जाता था कि मन्ना डे केवल शास्त्रीय गीत ही गा सकते हैं, लेकिन बाद में उन्होने ऐ मेरे प्यारे वतन, ओ मेरी जोहरा जबीं, ये रात भीगी-भीगी, ना तो कारवां की तलाश है और ए भाई जरा देख के चलो जैसे गीत गाकर अपने आलोचको का मुंह बंद कर दिया। मन्ना डे के कुछ सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में दिल का हाल सुने दिलवाला, प्यार हुआ इकरार हुआ, आजा सनम, ये रात भीगी भीगी, 'फूलगेंदवा ना मारो', ऐ भाई जरा देख के चलो, कसमे वादे प्यार वफा और यारी है ईमान मेरा शामिल है।

आत्मकथा 'मैमोयर्स कम अलाइव' में शंकर-जयकिशन को श्रेय
उन्होंने बतौर गायक उनकी प्रतिभा को पहचानने का श्रेय संगीतकार शंकर-जयकिशन की जोड़ी को दिया। डे ने शोमैन राजकपूर की आवारा, श्री 420 और चोरी चोरी फिल्मों के लिए गाया।  
उन्होंने अपनी आत्मकथा 'मैमोयर्स कम अलाइव' में लिखा है कि मैं शंकरजी का खास तौर से ऋणी हूं। यदि उनकी सरपरस्ती नहीं होती, तो जाहिर सी बात है कि मैं उन उंचाइयों पर कभी नहीं पहुंच पाता, जहां आज पहुंचा हूं। वह एक ऐसे शख्स थे, जो जानते थे कि मुझसे कैसे अच्छा काम कराना है। वास्तव में, वह पहले संगीत निदेशक थे, जिन्होंने मेरी आवाज के साथ प्रयोग करने का साहस किया और मुझसे रोमांटिक गीत गवाए।

धार्मिक फिल्मों के गायक का ठप्पा
मन्ना डे ने कुछ धार्मिक फिल्मों में गाने क्या गाएं उन पर धार्मिक गीतों के गायक का ठप्पा लगा दिया गया। ‘प्रभु का घर’, ‘श्रवण कुमार’, ‘जय हनुमान’, ‘राम विवाह’ जैसी कई फिल्मों में उन्होंने गीत गाए। इसके अलावा बी-सी ग्रेड फिल्मों में भी वो अपनी आवाज देते रहें। भजन के अलावा कव्वाली और मुश्किल गीतों के लिए मन्ना डे को याद किया जाता था। इसके अलावा मन्ना डे से उन गीतों को गंवाया जाता था, जिन्हें कोई गायक गाने को तैयार नहीं होता था। धार्मिक फिल्मों के गायक की इमेज तोड़ने में मन्ना डे को लगभग सात सात लगे।

फिल्म ‘आवारा’ से हटा ठप्पा
फिल्म ‘आवारा’ में मन्ना डे के गीत ‘तेरे बिना ये चांदनी’ बेहद लोकप्रिय हुआ और इसके बाद उन्हें बड़े बैनर की फिल्मों में मौके मिलने लगे। ‘प्यार हुआ इकरार हुआ..’ (श्री 420), ‘ये रात भीगी-भीगी..’ (चोरी-चोरी), ‘जहां मैं चली आती हूं..’ (चोरी-चोरी), ‘मुड-मुड़ के ना देख..’ (श्री 420) जैसी कई सफल गीतों में उन्होंने अपनी आवाज दी। मन्ना डे जो गाना मिलता उसे गा देते। ये उनकी प्रतिभा का कमाल है कि उन गीतों को भी लोकप्रियता मिली। उनका सबसे मशहूर गाना ‘कस्में वादे प्यार वफा..’ था।

खेमेबाजी का शिकार
भारतीय फिल्म संगीत में खेमेबाजी उस समय जोरों से थी। सरल स्वभाव वाले मन्ना डे किसी कैम्प का हिस्सा नहीं थे। इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। उस समय रफी, किशोर, मुकेश, हेमंत कुमार जैसे गायक छाए हुए थे और हर गायक की किसी न किसी संगीतकार से अच्छी ट्यूनिंग थी। साथ ही राज कपूर, देव आनंद, दिलीप कुमार जैसे स्टार कलाकार मुकेश, किशोर कुमार और रफी जैसे गायकों से गंवाना चाहते थे, इसलिए भी मन्ना डे को मौके नहीं मिल पाते थे। मन्ना डे की प्रतिभा के सभी कायल थे। लेकिन साइड हीरो, कॉमेडियन, भिखारी, साधु पर कोई गीत फिल्माना हो तो मन्ना डे को याद किया जाता था। कहा तो ये भी जाता था कि मन्ना डे से दूसरे गायक डरे थे इसलिए वे नहीं चाहते थे कि मन्ना डे को ज्यादा अवसर मिले।

संगीतकार अनिल विश्वास ने कहा था--- 
मन्ना डे के बारे में प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास ने एक बार कहा था कि मन्ना डे हर वह गीत गा सकते हैं, जो मोहम्मद रफी, किशोर कुमार या मुकेश ने गाये हों, लेकिन इनमें से कोई भी मन्ना डे के हर गीत को नहीं गा सकता है। इसी तरह आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने एक बार कहा था, आप लोग मेरे गीत को सुनते हैं लेकिन अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं कहूंगा कि मैं मन्ना डे के गीतों को ही सुनता हूं।

गीतकार प्रेम धवन ने कहा था-- 
प्रसिद्ध गीतकार प्रेम धवन ने मन्ना डे के बारे में कहा था-- मन्ना डे हर रेंज में गीत गाने में सक्षम हैं। जब वह उंचा सुर लगाते हैं तो ऐसा लगता है कि सारा आसमान उनके साथ गा रहा है। जब वह नीचा सुर लगाते हैं तो लगता है उसमे पाताल जितनी गहराई है। अगर वह मध्यम सुर लगाते हैं तो लगता है उनके साथ सारी धरती झूम रही है।

पुरस्कार और सम्मान---
मन्ना डे को फिल्मों मे उल्लेखनीय योगदान के लिए 1971 में पदमश्री पुरस्कार और 2005 में पदमभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा वह 1969 में फिल्म मेरे हुजूर के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक, 1971 मे बंगला फिल्म निशि पदमा के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक और 1970 में प्रदर्शित फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक पुरस्कार से सम्मानित किए गए। मन्ना डे के संगीत के सुरीले सफर में एक नया अध्याय जुड़ गया जब फिल्मों में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए साल 2009 में उन्हें फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें बंगाल विशेष महासंगीत सम्मान से सम्मानित किया था।

कश्मीरी फर की टोपी उनकी पहचान बन गई---
मन्ना डे जब एक प्रोगाम के सिलसिले में कश्मीर गए थे तो वहां जमकर बर्फबारी हुई थी। इस बर्फबारी के कारण वे कांपने लगे थे। उनको कांपते हुए देख उनके एक प्रशंसक ने उन्हें अपना फर का टोपी गिफ्ट किया था, जो बाद में उनकी पहचान बन गई। मन्ना डे ने आटोबायोग्राफी में लिखा है कि जब वे एक कार्यक्रम के सिलसिले में दिसंबर महीने में कश्मीर गए थे तो वहां भयानक ठंड थी। उन्होंने लिखा है कि ठंड के कारण वे स्टेज पर कांप रहे थे और ठंड से निजात पाने की फिराक में लगे हुए थे। मन्ना डे ने कहा कि जब वे ठंड से कांप रहे थे तो उनके पास एक प्रशंसक आया और टोपी पहनने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने खुशी से स्वीकार कर लिया। टोपी पहनने के बाद ठंड से उन्हें राहत मिली और उन्होंने अपना कार्यक्रम पेश किया, जिसे लोगों ने काफी सराहा। इस घटना के बाद कश्मीरी फर की टोपी उनकी पहचान बन गई और वे जहां भी प्रोगाम देने के लिए जाते थे, टोपी पहनकर ही अपना गायन पेश करते थे।

श्रद्धांजलि के स्वर-

दुखद वाकया है। संगीत की दुनिया में उनकी अलग पहचान थी। कई दशकों के लिए उन्होंने भारतीय इंडस्ट्री को अपने सुरों से सजाया था। हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजली देते हैं। मनोरंजन जगत और मुल्क के लिए बड़ी क्षति है।
-मनीष तिवारी, सूचना-प्रसारण मंत्री

मन्ना डे के रूप में हमने एक महान गायक खो दिया है। उनकी अमर आवाज हमेशा जिंदा रहेगी। उनकी आत्मा को शांति मिले।
-नरेंद्र मोदी, सीएम, गुजरात

आज महान शास्त्रीय गायक और पार्श्वगायक मन्ना डे साहब जिन्हें हम सब मन्ना दा कहते थे, वो हमारे बीच नहीं रहे। मुझे जहां तक याद है मन्ना दा के साथ मैंने अनिल विश्वास जी का क्लासिकल गाना गाया था 1947-48 में। वो मेरा उनके साथ पहला गाना था। मन्ना दा बहुत हंसमुख और सरल स्वभाव के इनसान थे। अपने काम के प्रति बहुत समर्पित थे। मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि मन्ना दा की आत्मा को वो शांति दे। मैं मन्ना दा की आत्मा को प्रणाम करती हूं।
-लता मंगेशकर, गायिका

महान गायक मन्ना डे नहीं रहे। आइए उनके लिए प्रार्थना करें। उनके परिवार के लिए मेरी सांत्वना। उनका संगीत 1000 साल तक रहेगा।
-मनोज वाजपेयी, अभिनेता

मन्ना डे के साथ बिताए अपने चार दशकों को याद करते हुए कहते हैं-- वह अपनी जड़ों को नहीं भूले थे। बाहर से सख्त होने के बावजूद वह अंदर से उतने ही नर्म दिल इंसान थे। मछली पकड़ना उनका प्रिय शौक था। उनके बारे में कई लोगों को गलतफहमी थी कि वह बेहद सख्त और रूखे व्यवहार वाले हैं। असल में तो वह अंदर से बेहद नर्म दिल इंसान थे। अगर वह किसी को पसंद करते तो उसके कायल हो जाते और अगर नापसंद करते तो सख्त रहते। वह अजनबियों से घुलते-मिलते नहीं थे।
-दुर्बादल चटर्जी, वाइलिन वादक

मन्ना डे का योगदान बहुत बड़ा है। कितनी पीढ़ी के लिए उन्होंने गाने गाए। कमर्शियल सिनेमा में भी उन्होंने अपने लिए जगह बनाई। पूरे हिन्दुस्तान के म्यूजिक प्रेमियों का नुकसान है।
-मधुर भंडारकर, फिल्म निर्देशक

94 साल तक वो हमारे बीच रहे लेकिन उनकी जिंदगी के चंद आखिरी साल बहुत अकेलेपन में गुज़रे। वो मुंबई से बैंगलोर में बस गए, मुझे एक बार बैंगलोर एयरपोर्ट पर मिले थे। बोले कि उनको लगता है कि अब फिल्म इंडस्ट्री को उनकी ज़रुरत नहीं है। बहुत कम बात करते थे। जब भी वो गाना गाते थे आंखें बंद कर लेते थे। मैंने पूछा तो कहा कि जब कोई तपस्या करता है तो आंखें बंद कर लेता है। गाना मेरे लिए तपस्या है। मैं आंखें बंद करता नहीं हूं, अपने आप बंद हो जाती हैं।
-रजा मुराद, अभिनेता

मन्ना डे जैसे गायक अब नही होंगे। अलग किस्म के गायक थे।
-जावेद अख्तर, गीतकार-लेखक

लोग चले जाते हैं, समय गुज़र जाता है, ध्वनि जीवित रहती है.. अमर हो जाती है !! उनके परिवार को सांत्वना देता हूं। हैरत होती है वो किस तरह अपने गीतों से हमारे जीवन से जुड़ गए थे।
-अमिताभ बच्चन, अभिनेता

मन्ना डे! महान गायक और महान आदमी। एक महान संगीतकार इतिहास में दर्ज हो गया। उनकी आत्मा को शांति मिले
-तलत अजीज, गायक

जब आप ये जानते हैं कि कोई आपको जल्द ही छोड़कर जाने वाला है, तब भी आपका दिल टूट ही जाता है।
-प्रीतिश नंदी, प्रोड्यूसर

मन्ना डे की आवाज बिल्कुल जुदा थी। वो अपने गानों, ए मेरी जोहरा जबी, दिल का हाल सुने दिलवाला और पूछो ना कैसे मैंने से दिलों में जिंदा रहेंगे।
-शबाना आजमी, अभिनेत्री

किशोर कुमार, मो. रपी और मुकेश के बाद आखिर महान सिंगर मन्ना डे भी चले गए। एक चतुर नार से मेरे प्यारे वतन, क्या रेंज थी।
-कुणाल कोहली, निर्देशक

जिंदगी इसी तरह से आती है, जाती है। मन्ना डे ने अपनी पूजा को अपने गले से निकाला।
-निदा फाजली, गीतकार

उनके गाने हमेशा हमारे कानों में गूंजेंगे। हम उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
-महेश भट्ट, निर्माता-निर्देशक

हमारे प्यारे मन्ना दा को जो हर भारतीय के रूह में बसे हैं ...हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि। अब कैसे रैन बीतेंगे बिना मन्ना दा के जो प्यार के सागर थे, जिन्होंने खुद को संगीत जगत के लिए समर्पित किया, दादा ने तो इस वतन को माँ के दिल और नन्ही सी बेटी का प्यार दिया है, हम सभी के पहेली जैसी जिंदगी में अपने आवाज़ की उत्तम नाटकीयता से हसाया भी और करुना भरे स्वर से रुलाया भी, कैसे सजेंगे सुर बिना मन्ना दा के ,मन को पंख कैसे लगाएँगे अब सुर? कौन मीठी धुन में नथनी से टूटे मोती को खोजेगा?...........सजल हैं नयन हमारे .....हाथ दोनों जोड़े ....ससुराल को जाते मन्ना दा बाबुल का घर जो छोड़े! प्रभु मन्ना दा के परिजनों को शक्ति दें और उनके चाहने वालों को साहस की वो सब इस दुःख को सह सकें।
-शारदा सिन्हा, गायिका

अब कैसे रैन बीतेंगे बिना मन्ना दा के



-शीतांशु कुमार सहाय
जब कोई तपस्या करता है तो आंखें बंद कर लेता है। गाना मेरे लिए तपस्या है। गाते समय मैं आंखें बंद करता नहीं हूं, अपने आप बंद हो जाती हैं। भारतीय फिल्मों के महान पार्श्वगायक मन्ना डे का यह उद्गार बताता है कि गायन उनके लिए तपस्या था। कोई तभी बुलन्दी के आकाश को चूम सकता है जब अपने कार्यक्षेत्र में तपस्या की भांति मेहनत करे। तभी तो एक समय गायिकी के आकाश पर विराजमान रहे सुर के तपस्वी मन्ना डे के गाये गीत आज भी अनायास होठों पर आ जाते हैं। वास्तव में सुर को साधने वाला यह सुरसाज अब हमारे बीच नहीं रहा, चला गया अनन्त लोक की ओर जहां से कोई नहीं आता, कभी नहीं। वृहस्पतिवार को बेंगलुरु में वे इस नश्वर संसार को अलविदा कह गये और बन गये शाश्वत का अभिन्न अंग। पर, उनकी यादें हमारे पास हैं, हमारे साथ हैं। हमारे पास उनकी मधुर आवाज में सधे सुर की थाती है जिन्हें हम सुनते रहेंगे, आने वाली कई पीढ़ियां सुनकर गुनगुनाएंगी, सीखेंगी और उन्हीं की तरह तपस्या की तो बुलन्दियों को छुएंगी।
दरअसल, मन्ना डे को जो भी प्रसिद्धि मिली, उसमें उनके अथक मेहनत का ही योगदान रहा। उन्हें किसी फिल्म स्टार की सन्तान की भांति विरासत में लोकप्रियता परोसकर नहीं मिली। प्रतिभा होने के बावजूद उन्हें पर्याप्त संघर्ष करना पड़ा। हालांकि उनके चाचा कृष्ण चंद्र डे मुम्बई के न्यू थियेटर कंपनी के ख्यातिनाम गायक और अभिनेता थे। ‘मन्ना’ नाम उन्हें उनके इन्हीं चाचा ने दिया था और संगीत की प्रारंभिक शिक्षा भी दी। वैसे उस्ताद अब्दुल रहमान खान व उस्ताद अमन अली खान से भी उन्होंने शास्त्रीय संगीत की सूक्ष्मता सीखी। मोहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार की तिकड़ी का चौथा हिस्सा बनकर उभरे मन्ना डे ने 1950 से 1970 के बीच हिन्दी संगीत उद्योग पर राज किया। 5 दशकों तक फैले अपने करियर में डे ने हिन्दी, बांग्ला, गुजराती, मराठी, मलयालम, कन्नड़ और असमिया भाषाओं में 3500 से अधिक गाने गाये। उनकी आवाज का इस्तेमाल जहां-जहां हुआ, कामयाबी की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ। मन्ना डे ने 1990 के दशक में संगीत जगत को अलविदा कह दिया। 1991 में आयी फिल्म ‘प्रहार’ में गाया गीत ‘हमारी ही मुट्ठी में’ उनका अंतिम गीत था। मन्ना डे ने रफी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले और किशोर कुमार के साथ कई गीत गाये। उन्होंने अपने कई हिट गीत संगीतकार सचिन देव बर्मन, राहुल देव बर्मन, शंकर-जयकिशन, अनिल बिस्वास, रोशन, सलील चौधरी, मदन मोहन तथा एनसी रामचंद्रन के साथ दिये।
प्रबोध चंद्र डे उर्फ मन्ना डे का जन्म पिता पूर्ण चंद्र डे और माता महामाया डे के घर एक मई 1919 को कोलकाता में हुआ था। मन्ना डे ने केरल निवासी सुलोचना कुमारन से शादी की और उनकी दो बेटियां रमा और सुमिता हुईं। उनकी पत्नी का उनकी जिंदगी में बेहद महत्त्वपूर्ण रोल था और यही वजह थी कि जनवरी 2012 में सुलोचना की मृत्यु के बाद डे अपनी जिंदगी के अंतिम दिनों में एकदम उदासीन और एकांतवासी हो गये थे। वह बेंगलुरु में अकेले ही रहते थे। आत्मकथा ‘मैमोयर्स कम अलाइव’ में उन्होंने बतौर गायक उनकी प्रतिभा को पहचानने का श्रेय संगीतकार शंकर-जयकिशन की जोड़ी को दिया। फिल्मों मे उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें 1969 में फिल्म मेरे हुजूर के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक, 1971 मे बंगला फिल्म ‘निशि पद्मा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक और 1970 में प्रदर्शित फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक पुरस्कार के अलावा 1971 में पद्मश्री, 2005 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। साल 2009 में उन्हें फिल्मों के सर्वाेच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें ‘बंगाल विशेष महासंगीत सम्मान’ से सम्मानित किया था। हरिवंश राय बच्चन की अमर कृति ‘मधुशाला’ को स्वर दिया तो वर्ष 1956 में ‘वसंत बहार’ फिल्म में अपने आदर्श भीमसेन जोशी के मुकाबले में गाने से भी नहीं घबराये थे मन्ना डे। उनके निधन से हिन्दी फिल्म संगीत का एक अध्याय समाप्त हो गया।


बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

मिले हाथ, बढ़ें साथ : भारत व चीन के बीच 9 समझौते


शीतांशु कुमार सहाय
बुध का काम शुद्ध। अर्थात् बुधवार को होने वाला कार्य शुद्ध यानी अच्छा होता है। यह भारतीय कहावत बुधवार को भारत और चीन के बीच हुए समझौते पर भी लागू हो जाये तो समझौते के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कथन कि जब भारत व चीन के हाथ मिलते हैं तो दुनिया देखती है, सच साबित हो जायेगा। काफी गर्मजोशी के माहौल में दोनों देशों के नेताओं ने 9 महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किये। विश्व की 2 क्षेत्रीय महाशक्तियों के बीच के करार की पल-पल की गतिविधियों पर विश्व की नजर वास्तव में थी। भारत व चीन के एकल या साझा शत्रुओं को दोनों की गर्मजोशी फूटी आँखों नहीं सुहाती है। वैसे विश्व की आर्थिक या सामरिक महाशक्तियाँ भी नहीं चाहतीं कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश व सबसे बड़ा साम्यवादी देश आपस में हाथ मिलाये। यदि ये दोनों मिल गये, आपसी ताल-मेल को कायम रखते हुए टकराव के तमाम बिन्दुओं पर समन्वय बनाये रखें तो निश्चय ही दोनों देशों का कल्याण होगा। साथ ही विश्व का मानचित्र भी कई मायनों में बदल जायेगा।
इस बार जो व्यवहार भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति चीन ने दिखायी, वह कई मायनों में अलग है। बातचीत से लेकर भोज तक के माहौल को भारतीयता में रंगने की कोशिश की गयी। भोजन तो हमेशा मेहमान की रुचि का ही होता है पर माहौल में भी भारतीय का पुट घोला गया। बैठकों के अलावा मनमोहन सिंह के सम्मान में चीनी प्रधानमंत्री ली क्विंग के साथ ही राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भी भोज का आयोजन किया। ली द्वारा सिंह के सम्मान में दिये गये भोज में मेहमानों ने बॉलीवुड की पुराने जमाने की लोकप्रिय धुनों के बीच चीनी व्यंजनों का लुत्फ उठाया। भोज में जहाँ ‘स्पांज बैम्बू’, ‘मशरूम सूप’ व ‘बीन कर्ड’ की खुशबू महकती रही, वहीं पुरानी हिन्दी फिल्मों के गीत ‘मेरा नाम चुन चुन चू’, ‘बार-बार देखो हजार बार देखो’ और ‘गोरे-गोरे, ओ बांके छोरे’ की धुनें बजती रहीं। मनमोहन सिंह चीन के पूर्व प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के भी मेहमान थे। ऐसा बेहद कम होता है कि कोई सेवानिवृत्त चीनी नेता किसी गणमान्य मेहमान की मेजबानी करे। 57 वर्षीय ली ने सिंह को बुधवार के दिन फोरबिडन सिटी का दौरा भी कराया। यह भी एक दुर्लभ व्यवहार था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री ली क्विंग के बीच ‘ग्रेट हॉल ऑफ दी पीपुल’ में हुई गहन वार्ता के बाद सीमा, रक्षा व सहयोग के समझौते (बीडीसीए) पर हस्ताक्षर किये गये।
भारत और चीन के बीच 9 अहम करार पर हस्ताक्षर किये गये। इस अवसर पर मनमोहन सिंह ने उत्साहित अंदाज में कहा कि जब भारत व चीन के हाथ मिलते हैं तो दुनिया देखती है। उम्मीद की जानी चाहिये कि ये हाथ दोस्ती के लिए ही मिले रहें, एक-दूसरे की शक्ति को जाँचने के लिए नहीं। एक कैलेंडर वर्ष में ली व सिंह की दूसरी मुलाकात इस तथ्य के मद्देनजर काफी मायने रखती है कि 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और चाउ एन लाइ के बीच हुई मुलाकात के बाद यह इस प्रकार की पहली मुलाकात है। यह मुलाकात दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी के महत्त्व को दर्शाती है। सीमा के आसपास सैन्य क्षेत्र में आपसी विश्वास बहाली के उपायों का कार्यान्वयन जारी रखने की प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए बीडीसीए में दोनों देशों के सैन्य मुख्यालयों के बीच हॉटलाइन की स्थापना पर विचार करने की सहमति और आपसी सलाह-मशविरे से विशेष प्रबंध किये जाने का भी फैसला हुआ है। गौरतलब है कि एलएसी के बारे में अवधारणाओं में भिन्नता तथा स्पष्टता के अभाव को दोनों पक्षों द्वारा घुसपैठ के लिए मुख्य कारण माना जाता रहा है। लद्दाख के देप्सांग घाटी में चीनी सैनिकों की घुसपैठ 3 सप्ताह तक जारी रही थी और उसके बाद चीनी सैनिक अपनी मूल स्थितियों में लौट गये थे। समझौते के अनुसार, दोनों पक्ष अधिकतम संयम बरतेंगे, किसी भड़काऊ कार्रवाई से बचेंगे, दूसरे पक्ष के खिलाफ धमकी या बल प्रयोग नहीं करेंगे, एक दूसरे के साथ शिष्टाचार से पेश आएंगे और आपसी गोलीबारी या सशस्त्र संघर्ष से बचेंगे। यों ब्रह्मपुत्र व सीमा पारीय नदियों, आपसी व्यापार व निवेश से सम्बन्धित समझौते भी हुए। पर, वीजा व्यवस्था का उदारीकरण पर कोई समझौता नहीं हुआ।
भारत और चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सेना के बीच टकराव और सीमा पर तनाव को टालने के लिए बुधवार को एक व्यापक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही दोनों पक्षों ने फैसला किया कि कोई भी पक्ष दूसरे पक्ष पर हमला करने के लिए सैन्य क्षमताओं का इस्तेमाल नहीं करेगा और न ही सीमा पर गश्ती दलों का पीछा करेगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री ली क्विंग के बीच ग्रेट हॉल आफ दी पीपुल में हुई गहन वार्ता के बाद सीमा रक्षा सहयोग समझौते [बीडीसीए] पर हस्ताक्षर किए गए।  रक्षा सचिव आर के माथुर और पीएलए के डिप्टी चीफ आफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल सुन जियांग्यू द्वारा हस्ताक्षरित चार पन्नों के बीडीसीए में दस उपबंध हैं जो चार हजार किलोमीटर लंबी एलएसी पर शांति, समरसता तथा स्थिरता बनाए रखने का प्रावधान करते हैं। इसमें यह भी दोहराया गया है कि कोई भी पक्ष, दूसरे पक्ष के खिलाफ अपनी सैन्य क्षमताओं का इस्तेमाल नहीं करेगा और किसी भी सैन्य क्षमता का इस्तेमाल किसी दूसरे पक्ष पर हमले के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इस वर्ष अप्रैल में लद्दाख की देपसांग वैली में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी [पीएलए] के दखल के साथ ही कई मौकों पर चीनी घुसपैठ की घटनाओं से संबंधों में उपजे तनाव की पृष्ठभूमि में यह समझौता हुआ है। समझौता कहता है कि दोनों पक्षों को इस समझौते को एलएसी के संरेखण तथा सीमा के सवाल पर भी बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने अपने स्तर पर लागू करना होगा। बीडीसीए में वर्ष 1993 से सीमा प्रबंधन पर दोनों देशों के बीच हुए विभिन्न समझौतों की भावना तथा भारत-चीन सीमा मामलों पर समन्वय तथा विचार-विमर्श के लिए एक व्यवस्था स्थापित करने को लेकर जनवरी में किए गए हस्ताक्षर का उल्लेख किया गया है।
दोनों पक्षों के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की 2 घंटे से अधिक समय तक चली वार्ता और सिंह तथा ली के बीच इस वर्ष हुई दूसरी बातचीत के साथ ही कुल मिलाकर दोनों देशों के बीच नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए, जिनमें बीडीसीए तथा सीमा पारीय नदियों पर आपसी सहयोग को मजबूत करने संबंधी समझौता भी शामिल है। वीजा व्यवस्था का उदारीकरण किए जाने पर कोई समझौता नहीं हुआ। हालांकि चीनी पक्ष इस विषय में समझौता करने का प्रबल इच्छुक था, लेकिन भारत ने चीनी दूतावास द्वारा अरुणाचल प्रदेश के दो भारतीय तीरंदाजों को नत्थी वीजा दिए जाने के मुद्दे पर उभरे विवाद की पृष्ठभूमि में अपने कदम पीछे खींच लिए।
समक्षौते--
1. चार हजार किलोमीटर लंबी एलएसी पर शांति, समरसता तथा स्थिरता बनाए रखने का प्रावधान
2. कोई भी पक्ष, दूसरे पक्ष के खिलाफ अपनी सैन्य क्षमताओं का इस्तेमाल नहीं करेगा और किसी भी सैन्य क्षमता का इस्तेमाल किसी दूसरे पक्ष पर हमले के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
3. एलएसी के आसपास सैन्य क्षेत्र में आपसी विश्वास बहाली उपायों का क्रियान्वयन जारी रखने की प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए बीडीसीए में दोनों देशों के सैन्य मुख्यालयों के बीच हॉटलाइन की स्थापना पर विचार करने की सहमति और आपसी सलाह मशविरे से विशेष प्रबंध किए जाने का भी फैसला। उन क्षेत्रों में एक-दूसरे के गश्ती दलों का पीछा नहीं करेंगे, जिनके बारे में एलएसी पर कोई आम समक्ष नहीं है और यदि कोई शंकाग्रस्त स्थिति होती है तो स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है और यह स्थापित तंत्र के जरिए होगा। भारत और चीन ने यह सहमति भी जतायी कि यदि उनके सैनिक उन इलाकों में आमने सामने आ जाते हैं जहां एलएसी के बारे में कोई आम समझ नहीं है तो दोनों पक्ष अधिकतम संयम बरतेंगे, किसी भड़काऊ कार्रवाई से बचेंगे, दूसरे पक्ष के खिलाफ धमकी या बल प्रयोग नहीं करेंगे, एक दूसरे के साथ शिष्टाचार से पेश आएंगे और आपसी गोलीबारी या सशस्त्र संघर्ष से बचेंगे। समझौता कहता है कि दोनों पक्षों को इस समझौते को एलएसी के संरेखण तथा सीमा के सवाल पर भी बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने अपने स्तर पर लागू करना होगा।
बीडीसीए में वर्ष 1993 से सीमा प्रबंधन पर दोनों देशों के बीच हुए विभिन्न समझौतों की भावना तथा भारत-चीन सीमा मामलों पर समन्वय तथा विचार-विमर्श के लिए एक व्यवस्था स्थापित करने को लेकर जनवरी में किए गए हस्ताक्षर का उल्लेख किया गया है।
4. ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा बांधों के निर्माण को लेकर शिकायतों की पृष्ठभूमि में दोनों पक्षों ने आपसी सहमति पत्र [एमओयू] पर हस्ताक्षर।
5. सीमा पारीय नदियों पर समन्वय को मजबूत बनाने, बाढ़ के मौसम में पनबिजली आंकड़ों के प्रावधान पर विशेषज्ञस्तरीय तंत्र के जरिए समन्वय करने तथा आपदा प्रबंधन एवं साक्षा हितों से जुड़े अन्य मुद्दों पर विचारों के आदान-प्रदान पर सहमति।
6. दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि दोनों पड़ोसी देश, स्वतंत्र विदेश नीतियों का अनुसरण कर रहे हैं और ऐसे में भारत तथा चीन द्वारा अन्य देशों के साथ बरते जाने वाले संबंध एक दूसरे के लिए चिंता का विषय नहीं होने चाहिए। ऐसे काम करें जो आपसी विश्वास को बढ़ाएं, साझा हितों को विस्तार दें और आपसी समझ को गहरा करें।
7. सभी स्तरों पर पारदर्शिता बढ़ाने और रणनीतिक संवाद को मजबूती प्रदान करने पर सहमति।
8. दोनों देशों के सशस्त्र बलों के बीच संपर्क को प्रोत्साहित करने और उसे संस्थागत स्वरूप प्रदान करने का फैसला।
9. भारत में चीनी निवेश को आकर्षित करने के लिए एक चीनी औद्योगिक पार्क की स्थापना तथा व्यापार संतुलन के लिए उपाय तलाशने पर सहमति।

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

शुरू हो गयी संसद की सफाई : रशीद, लालू व जगदीश नहीं रहे सांसद


शीतांशु कुमार सहाय
विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र भारत है। विश्व में प्रथमतः लोकतन्त्र का आगाज भी यहीं हुआ। ऐसे में सदैव विश्व समुदाय का ध्यान भारतीय लोकतान्त्रिक उथल-पुथल व बदलावों पर लगा रहता है। हाल के 2 दशकों में देश की राजनीति का तेजी से अपराधीकरण हुआ तो विश्व स्तर पर काफी छीछालेदर हुई। इसके बावजूद देश को दशा-दिशा देने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं को शर्म नहीं आयी। सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने आपराधिक छवि वालों को विधान सभाओं, विधान परिषदों, लोकसभा व राज्य सभा का टिकट देना जारी रखा। लिहाजा लोकतन्त्र के मन्दिर में अपराधियों की धड़ल्ले से घुसपैठ होने लगी। कानून तोड़ने वाले कानून बनाने वाले बन बैठे। लिहाजा वर्तमान व भूतपूर्व विधायकों, सांसदों व मंत्रियों की वैसी नयी फौज तैयार हो गयी जिन पर गबन व घोटालों के मामले हैं।

लोकतन्त्र का वास्ता देकर राजनीतिक दलों ने ऐसा चुनावी दलदल तैयार किया कि उस पर खड़ा भारतीय लोकतन्त्र की नींव ही हिलने लगी। समय ऐसा भी आया कि अपराधी सीधे कारावास से ही चुनाव जीतने लगे। जनप्रतिनिधित्व कानून के सुराख का फायदा लेकर नामांकन से प्रचार तक के लिए कारावास से बाहर आने का न्यायिक आदेश भी आसानी से पा जाते थे। बाहुबल व अवैध धनबल के सहारे ऐसे लोग जनता के नेता बनते रहे हैं, जनप्रतिनिधि कहलाते रहे हैं। सच तो यही है कि इन असामाजिक चरित्रधारकों के पास न तो नेतृत्व क्षमता रही है और न ही जनप्रतिनिधि होने की पात्रता। इनसे इतर कुछ स्वच्छ छवि वाले या गरीब तबके से आने वाले भी राजनीति में आकर उद्दण्ड, अहंकारी व घोटालेबाज हो गये। यों विधायिका का ताना-बाना बुरी तरह से तहस-नहस हो गया। इसका असर कार्यपालिका पर व्यापक रूप से पड़ा। यों तमाम उच्चाधिकारी व कनीय कर्मी बेखौफ हो रिश्वतखोरी में मशगूल हो गये। विकास दीखने के बजाय कागजों में चमकने लगा। मतलब यह कि सरकार के 2 अंग विधायिका व कार्यपालिका पंगु हो गये। तब जनता की सारी अपेक्षाएँ केवल-और-केवल न्यायपालिका पर आकर सिमट गयीं। न्यायपालिका ने अपनी प्रशंसनीय भूमिका निभायी और भारतीय लोकतन्त्र की न्यायिक स्तर से सफाई में जुट गयी। परिणाम सामने आया। उच्चतम न्यायालय ने कानूनी रूप से दोषी सांसदों को संसद की सदस्यता से अयोग्य ठहराये जाने से बचाने वाले प्रावधान को निरस्त कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने 10 जुलाई को अपने आदेश में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा-8 की उप धारा-4 को समाप्त कर दिया जिसके तहत किसी विधायक या सांसद को तब तक अयोग्य नहीं करार दिया जा सकता था, जब तक उच्च अदालत में उसकी अपील लंबित हो। न्यायालय के उस फैसले के बाद 3 सांसदों की सांसदी समाप्त हो गयी।

सोमवार को दिन में काँग्रेसी सांसद रशीद मसूद को राज्यसभा की सदस्यता से अयोग्य करार दिया गया। उच्चतम न्यायालय की उक्त व्यवस्था के तहत अयोग्य ठहराये जाने वाले रशीद पहले सांसद हैं। रिश्वत के मामले में दोषी होने के कारण वे जेल में हैं। राज्यसभा की अधिसूचना के अनुसार मसूद को 19 सितंबर 2013 से सांसद के रूप में अयोग्य ठहराया गया है। उसी दिन सीबीआई न्यायालय ने मसूद को दोषी ठहराया था। वह जेल की सजा के दौरान और रिहाई के बाद 6 सालों तक अयोग्य बने रहेंगे। यों चारा घोटाले में दोषी पाये जाने के बाद कारावास में बंद राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद और जनता दल (यूनाइटेड) के नेता जगदीश शर्मा की लोकसभा सदस्यता सोमवार की रात में खत्म कर दी गयी। चुनावी नियमों के अनुसार, लालू प्रसाद को 11 सालों (5 साल जेल और रिहाई के बाद के 6 साल) के लिए अयोग्य ठहराया गया है जबकि शर्मा को 10 साल (4 साल जेल और रिहाई के बाद के 6 साल) के लिए अयोग्य ठहराया गया है। यों धीरे-धीरे संसद की सफाई शुरू हो गयी है जो आगे भी जारी रहेगी।