शनिवार, 27 जून 2015

रुडी व गोयल की उपस्थिति में केन्द्रीय कौशल विकास मंत्रालय व एनटीपीसी के बीच समझौता / Agreement Between NTPC & Central Skill Development Ministry at Patna

पटना में कौशल विकास से सम्बद्ध समझौते पर हस्ताक्षर करते एनटीपीसी व केन्द्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के अधिकारी।

-शीतांशु कुमार सहाय
कुशल भारत के निर्माण के साथ देश के हरेक युवा को सम्मानपूर्वक आजीविका से जोड़ने के लिए नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) द्वारा नेशनल स्किल्ड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन एवं नेशनल स्किल्ड डेवलपमेंट फण्ड के साथ एक समझौता-पत्र पर पटना में 26 जून 2015 को हस्ताक्षर हुए। इस अवसर पर केन्द्रीय विद्युत एवं कोयला मंत्री पीयूष गोयल और केन्द्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राजीव प्रताप रुडी उपस्थित थे।
पटना में समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद संचिकाओं के आदान-प्रदान करते केन्द्रीय कौशल विकास मंत्रालय व एनटीपीसी के अधिकारी। पीछे खड़े हैं केन्द्रीय विद्युत एवं कोयला मंत्री पीयूष गोयल और केन्द्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राजीव प्रताप रुडी।

-बिहार के लिए वरदान एनटीपीसी
इस मौके पर एनटीपीसी के अध्यक्ष अरूप राय चौधरी ने कहा कि एनटीपीसी बिहार के लिए वरदान साबित हुआ है, जहाँ अभी 4 हजार मेगावाट की बिजली का उत्पादन हो रहा है। कौशल विकास के मामले में एनटीपीसी बिहार के 25 हजार युवाओं को प्रशिक्षण देगा; ताकि ये व्यावसायिक क्षेत्र में प्रशिक्षण का लाभ उठा सकें। उन्होंने कहा कि सभी लोग को रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया जायेगा। उन्होंने केन्द्र सरकार के पहल की सराहना करते हुए कहा कि एनटीपीसी कौशल विकास के मामले में हर तरह की मदद देने को तैयार है।
पटना में समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद संचिकाओं के आदान-प्रदान करते केन्द्रीय कौशल विकास मंत्रालय व एनटीपीसी के अधिकारी। पीछे खड़े हैं केन्द्रीय विद्युत एवं कोयला मंत्री पीयूष गोयल और केन्द्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राजीव प्रताप रुडी।

-5 हजार लोग प्रशिक्षित
इस अवसर पर कौशल विकास मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुश्री ज्योत्सना ने कहा कि कौशल विकास में अभी तक 5 हजार लोग को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इस मौके पर समझौते के संबंध में एनटीपीसी द्वारा बिहार के युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। सर्टीफायड प्रशिक्षकों द्वारा टेªनिंग दी जायेगी।

देश का पहला कौशल विकास विश्वविद्यालय बिहार में : रूडी / FIRST SKILL DEVELOPMENT UNIVERSITY IN INDIA AT BIHAR

पटना में केन्द्रीय कौशल विकास मंत्रालय व एनटीपीसी के बीच समझौते के दौरान एनटीपीसी के अध्यक्ष, केन्द्रीय विद्युत एवं कोयला मंत्री पीयूष गोयल और केन्द्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राजीव प्रताप रुडी।

-शीतांशु कुमार सहाय
केन्द्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राजीव प्रताप रुडी ने शुक्रवार को पटना में 26 जून 2015 को केन्द्रीय कौशल विकास मंत्रालय व नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) के बीच समझौते के दौरान कहा कि बिहार में देश का पहला कौशल विकास विश्वविद्यालय खुलेगा। यह निर्णय अगले सत्र में केन्द्र सरकार लेगी। इसके बाद विश्वविद्यालय खोलने की तैयारी शुरू हो जायेगी। मंत्री ने कहा कि 15 जुलाई को विश्व में कौशल विकास दिवस मनाने की तैयारी है। देश में 65 साल के बाद पहली बार कौशल विकास मंत्रालय की स्थापना हुई है और इसका पहली बार वे मंत्री बने हैं।
-50 करोड़ लोग का होगा कौशल विकास   
रूडी ने कहा कि कौशल विकास के माध्यम से ही देश के युवाओं को रोजगार से जोड़ा जायेगा। इस कार्य में केन्द्र के 24 मंत्रालय जुड़े हैं। सभी 6 से 7 करोड़ रुपये इसके लिए खर्च कर रहे हैं। गुजरात में यह विभाग 15 वर्ष पहले से चल रहा है। उन्होंने कहा कि देश के 50 करोड़ लोग को कौशल विकास से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण दिया जायेगा। विश्व में कौशल विकास के मामले में पीछे है। भारत में केवल तीन प्रतिशत लोग ही कौशल विकास से जुड़े है जबकि कोरिया में 96 प्रतिशत, चीन में 46, अमेरिका में 68, जापान में 80 प्रतिशत लोग कौशल विकास से युक्त हैं।
-हर साल 50 हजार प्रशिक्षक
मंत्री रुडी ने कहा कि एनटीपीसी से जो समझौता हुआ है उससे कौशल विकास से जुड़े युवाओं को 12 सप्ताह का प्रशिक्षण दिया जायेगा। इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए हर साल सेवानिवृत्त होनेवाले 50 हजार सैनिकों को प्रशिक्षक बनाया जायेगा। देश के सभी पावर सेक्टर से कौशल विकास के लिए समझौता किया जायेगा और प्रशिक्षण देने के लिए उनसे अनुरोध किया जाएगा। देश के 543 संसदीय क्षेत्र में कौशल विकास केन्द्र खोले जायेंगे।
-रूकेगा पलायन, बनेगा नया बिहार
रुडी ने कहा कि बिहार के नौजवान रोजगार के लिए बाहर जाते हैं और छोटे-छोटे कार्य करते हैं। अब उन्हें बाहर नहीं जाना पड़ेगा। बिहार में भी दो-तीन माह के अंदर कौशल विकास विभाग की स्थापना की जायेगी। उन्होंने कहा कि बिहार में यदि विकास करना हो तो नया बिहार बनाना होगा। 

बुधवार, 24 जून 2015

'मेरा देश मेरा जीवन' : लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा में आपातकाल / 'My Country My Life' : LK Advani's Autobiography on Emergency


प्रस्तुति : शीतांशु कुमार सहाय
इतिहास में प्रत्येक युग किसी बड़ी अवधारणा का द्योतक होता है, जिसे कई वैज्ञानिकों और राजनीतिक चिंतकों ने 'सामूहिक मन' कहा है। जब यह अवधारणा अधिकांश लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाती है, तब वह इतिहास की प्रेरक शक्ति बन जाती है। इस दृष्टि से देखने पर पता चलेगा कि बीसवीं शताब्दी के अधिकांश आंदोलन परस्पर संबंधित दो बड़ी अवधारणाओं से प्रेरित थे-स्वतंत्रता और लोकतंत्र।
स्वतंत्रता की तलाश में कई परतंत्र राष्ट्रों ने उपनिवेशवादी शासन के विरुध्द संघर्ष किया। हालाँकि राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए इनमें से अधिकांश संघर्षों की शुरुआत अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में हुई, लेकिन उनके परिणाम मुख्य रूप से बीसवीं शताब्दी में प्राप्त हुए। राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ अन्य सशक्त आकांक्षाएँ भी पनपीं-जैसे राजतंत्र, सैनिक तानाशाह, निरंकुश कम्युनिस्ट पार्टी अथवा अन्य प्रकार की दमनकारी व्यवस्था के विरुध्द जनता के शासन की आकांक्षा। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष तो विदेशी शक्ति के विरुध्द करना पड़ा, किंतु लोकतंत्र के लिए संघर्ष आंतरिक शासन-व्यवस्था के विरुध्द करना पड़ा।
कई देशों में राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अभियान जितना कठिन था, लगभग उतना ही कठिन था लोकतंत्र के लिए संघर्ष-और इसे उतने ही हिंसात्मक रूप से कुचल दिया गया। भावी इतिहासकार यह दर्ज करेंगे कि दो विश्व युध्द यदि बीसवीं शताब्दी के फलक पर दाग हैं तो स्वतंत्रता और लोकतंत्र की विजय इस युग की गौरवशाली उपलब्धि हैं।
भारत में हम लोग सौभाग्यशाली रहे कि हमारे पड़ोसी देशों और विश्व के अन्य देशों की भाँति सन् 1947 में ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के बाद हमें लोकतंत्र के लिए अलग से युध्द नहीं करना पड़ा। स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र उतने ही सहज ढंग से आया जैसे कि यहाँ पर पंथनिरपेक्षता स्वाभाविक रूप से थी; जैसाकि मैं इस संबंध में आगे चर्चा करूँगा। इन दोनों अवधारणाओं की स्वाभाविक स्वीकृति मुख्य रूप से भारत की हिंदू प्रकृति के कारण हुई। मानव इतिहास में हमेशा ऐसे उदाहरण रहे हैं कि कोई अवधारणा कितनी भी उदार क्यों न हो और उसकी जड़ें देश की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक भूमि में कितनी ही गहरी क्यों न हो, किंतु ऐसा नहीं हुआ है कि वह अहंकार-प्रेरित और सत्ता की लोलुपता में मदांध लोगों के प्रहार से सदैव बच गई हो। जब ऐसे प्रहार होते हैं तो जिस अवधारणा पर प्रहार होता है, कुछ देर के लिए उसपर ग्रहण लग जाता है। लेकिन ग्रहणकाल की इसकी वेदना ही छाए हुए अंधकार को दूर करने के लिए संघर्ष हेतु और अविनाशी अवधारणा के देदीप्यमान प्रकाश को बिखेरने के लिए विशाल जनसमूह को प्रेरित करती है।
ऐसा लगता है कि राष्ट्र को उचित सीख लेने और इसके माध्यम से उस अवधारणा हेतु अपनी प्रतिबध्दता बहाल करने के लिए इतिहास जान-बूझकर ऐसी अग्नि-परीक्षा की स्थिति पैदा करता है।
ऐसा ही कुछ जून 1975 में भारत में हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत पर कू्रर आपातकालीन शासन लागू कर लोकतंत्र पर ग्रहण लगा दिया। उन्नीस माह के बाद कांग्रेस पार्टी की तानाशाही के विरुध्द भारत की जनता के गौरवशाली संघर्ष के परिणामस्वरूप यह ग्रहण छँटा। यदि आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक अंधकारमय अवधि थी तो लोकतंत्र की बहाली के लिए किया गया विजयी संघर्ष सबसे देदीप्यमान घटना। ऐसा हुआ कि मैं अपने हजारों देशवासियों की तरह आपातकाल की संपूर्ण उन्नीस माह की अवधि जेल में व्यतीत करने के कारण इसका भुक्तभोगी तथा आपातकाल के विरुध्द युध्द में विजय प्राप्त करनेवाली लोकतंत्र सेना का एक सेनानी-दोनों रूपों में था।
-जून 1975 की दो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ :
भारत की स्वतंत्रता के साठ वर्षों पर नजर डालने पर पता चलता है कि इन छह दशकों में दो तिथियाँ ऐसी हैं, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता है और ये दोनों जून 1975 से जुड़ी हुई हैं।
इनमें से एक है-12 जून। सभी राजनीतिक विश्लेषकों को अचंभे में डालते हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में इंदिरा कांग्रेस की भारी पराजय हुई। दूसरा, उसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के लोकसभा में चुने जाने को निरस्त कर दिया और इसके साथ ही चुनावों में भ्रष्टाचार फैलाने के आधार पर उन्हें 6 वर्षों के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया।
दूसरी तिथि है-25 जून। लोकतंत्र-प्रेमियों के लिए यह तिथि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे काले दिवसों में से एक के रूप में याद रखी जाएगी। इस दुर्भाग्यपूर्ण तिथि से घटनाओं की ऐसी शृंखला चल पड़ी, जिसने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को विश्व की दूसरी सबसे बड़ी तानाशाही में परिवर्तित कर दिया।
दिल्ली में जून के महीने में सबसे अधिक गरमी होती है। अतएव जब दल-बदल के विरुध्द प्रस्तावित कानून से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति ने बगीचों के शहर बंगलौर, जो कि ग्रीष्मकाल में भी अपनी शीतल-सुखद जलवायु के लिए विख्यात है, में 26-27 जून को अपनी बैठक करने का निर्णय लिया तो मुझे काफी प्रसन्नता हुई। हम दोनों-अटलजी और मैं-इस समिति के सदस्य थे, जिसके कांग्रेस (ओ) के नेता श्याम नंदन मिश्र भी सदस्य थे।
हालाँकि, जब 25 जून की सुबह मैं दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर बंगलौर जानेवाले विमान पर सवार हुआ तो मुझे इस बात का जरा भी खयाल नहीं था कि यह यात्रा दो वर्ष लंबी अवधि के लिए मेरे 'निर्वासन' की शुरुआत है, जिसके संबंध में माउंट आबू बैठक के दौरान पार्टी सांसद और प्रख्यात ज्योतिषी डॉ. वसंत कुमार पंडित ने भविष्यवाणी की थी।
लोकसभा के अधिकारियों ने बंगलौर हवाई अड्डे पर मेरे सहयात्री मिश्र और मेरी अगवानी की। राज्य विधानसभा के विशाल भवन के पास स्थित विधायक निवास पर हमें ले जाया गया। अटलजी एक दिन पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे। इस संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष थे-कांग्रेस पार्टी के दरबारा सिंह, जो बाद में पंजाब के मुख्यमंत्री बने।
26 जून को सुबह 7.30 बजे मेरे पास जनसंघ के स्थानीय कार्यालय से एक फोन आया। दिल्ली से जनसंघ के सचिव रामभाऊ गोडबोले का एक अत्यावश्यक संदेश था। वे कह रहे थे कि मध्य रात्रि के तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तारी जारी है। पुलिस शीघ्र ही अटलजी और आपको गिरफ्तार करने के लिए पहुँचने वाली होगी। मैंने यह सूचना श्याम बाबू को दी। इसके बाद हम लोग एक साथ अटलजी के कमरे में गए। इस संबंध में संक्षिप्त चर्चा के बाद हम इस निर्णय पर पहुँचे कि हम लोग गिरफ्तारी से बचने का प्रयास नहीं करेंगे।
8.00 बजे आकाशवाणी से समाचार सुनने के लिए मैंने रेडियो चलाया। मुझे आकाशवाणी समाचारवाचक की परिचित आवाज के स्थान पर इंदिरा गांधी की गमगीन आवाज सुनाई दी। यह उनका राष्ट्र के नाम किया जानेवाला अचानक प्रसारण था, इस सूचना के साथ कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल घोषित कर दिया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आंतरिक अशांति से निबटने के लिए आपातकाल लागू करना आवश्यक था।
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, जब मैंने उन्हें यह कहते हुए सुना कि विपक्ष के बहुत बड़े षडयंत्र से देश को बचाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही उनका मनगढ़ंत आरोप यह था कि कुछ ऐसे तत्त्व हैं, जो लोकतंत्र के नाम पर भारत के लोकतंत्र को मिटाने के लिए तत्पर थे और इसे रोकने की आवश्यकता थी।
अटलजी और मैंने एक संयुक्त प्रेस वक्तव्य तैयार किया, जिसमें जयप्रकाशजी और अन्य नेताओं की गिरफ्तारी की भर्त्सना की गई, आपातकाल की निंदा की गई और घोषणा की गई कि 26 जून, 1975 का वही ऐतिहासिक महत्त्व होगा, जो स्वतंत्रता पूर्व अवधि में 9 अगस्त, 1942 का है, जब महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासकों से कहा था-'भारत छोड़ो।'
हालाँकि यह वक्तव्य एक व्यर्थ प्रयास था। लोगों तक इस संदेश को पहुँचाने का कोई माध्यम ही नहीं था, क्योंकि आपातकाल की घोषणा के साथ ही सरकार ने तानाशाही की चिरपरिचित परंपरा के अनुकूल प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी। स्वतंत्रता के बाद पहली बार प्रेस पर पूर्ण सेंसरशिप लगाई गई थी।
पुलिस हम लोगों को गिरफ्तार करने के लिए सुबह 10.00 बजे आ पहुँची। प्रख्यात समाजवादी नेता मधु दंडवते भी एक अन्य संसदीय समिति की बैठक में भाग लेने के लिए बंगलौर में मौजूद थे, उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम चारों को बंगलौर सेंट्रल जेल ले जाया गया। उस दिन, मेरी डायरी में उल्लिखित है-''26 जून, 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का अंतिम दिन हो सकता है। आशा करता हूँ कि मेरा यह भय गलत सिध्द हो।'
-लालकृष्ण आडवाणी
(यह लेख वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा 'मेरा देश मेरा जीवन' से लिया गया है। प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का लोकार्पण 25 जून 2015 को भोपाल में श्रीश्री रविशंकर करेंगे)

25 जून : आपातकाल की ‘जयन्ती’ अर्थात् लोकतन्त्र की हत्या / June 25 : Emergency 'Jubilee', The Murder of Democracy


-शीतांशु कुमार सहाय
इंदिरा गाँधी को जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राजनारायण की चुनाव संबंधी याचिका पर फैसला सुनाया कि चुनाव संबंधी भ्रष्टाचार के लिए वह दोषी हैं तब उनकी लोकसभा की सदस्यता समाप्त हो गयी। इंदिरा गाँधी ने इस फ़ैसले को मानने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई। पूरे देश में लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) सहित तमाम जागरूक लोग ने 25 जून 1975 को इंदिरा गाँधी के इस्तीफे की माँग को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान की सभा में हिस्सा लिया। जेपी ने तालियों के बीच रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियाँ ‘‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’’ का उद्बोधन किया। 25 जून को ही जेपी ने घोषणा की कि इंदिरा गाँधी को इस्तीफे के लिए मजबूर करने के लिए अहिंसक प्रदर्शन और सत्याग्रह किया जायेगा। जेपी ने सेना और पुलिस को गैर-कानूनी आदेशों का पालन नहीं करने की सलाह दी। जेपी और आम जनता की आवाज तथा माँगों को कुचलने के लिये इंदिरा गाँधी ने 25 जून कीे मध्य रात्रि में बिना मंत्रिमंडल की सलाह के आंतरिक आपातकाल लगाने की प्रस्ताव पर राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद को हस्ताक्षर करने को बाध्य किया। इसके साथ ही कानून की दृष्टि से समानता का अधिकार एवं मौलिक अधिकारों के कार्यान्वयन के लिए न्यायालय में अपील करने के अधिकारों को राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 359 के अंतर्गत निरस्त करने के संबंध में आदेश जारी कर दिया। 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 मास की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था।
-मामला
मामला 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को पराजित किया था लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि रायबरेली से इंदिरा गाँधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया, तय सीमा से अधिक खर्च किए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ग़लत तरीकों का इस्तेमाल किया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया। इसके बावजूद इंदिरा गांधी टस से मस नहीं हुईं. यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी ने भी बयान जारी कर कहा कि इंदिरा का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है। आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गाँधी ने कहा, "जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील क़दम उठाए हैं, तभी से मेरे ख़िलाफ़ गहरी साजिश रची जा रही थी।"
-26 जून को आंतरिक आपातकाल की घोषणा
26 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी एवं लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नानाजी देशमुख, जॉर्ज फर्नांडिस, राजनारायण, मधु लिमये और काँग्रेसी युवा तुर्क नेता चन्द्रशेखर, रामधन, कृष्णकांत, मोहन धारिया तथा देश के वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर सहित लाखों विरोधी दल के नेता कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन के लोग एवं पत्रकार को जेल में डाल दिया, गया। अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गयी, नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को स्थगित कर दिया गया। जय प्रकाश नारायण ने अपनी-जेल डायरी में व्यथित हृदय से लिखा था, ’’लोकतंत्र के क्षितिज को विस्तृत करने की बात तो एक ओर रह गयी और मानों लोकतंत्र ही एकाएक काल का ग्रास बन गया।’’ इस प्रकार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को तानाशाही में बदल डाला गया।

-लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा में आपातकाल
''8.00 बजे आकाशवाणी से समाचार सुनने के लिए मैंने रेडियो चलाया। मुझे आकाशवाणी समाचारवाचक की परिचित आवाज के स्थान पर इंदिरा गांधी की गमगीन आवाज सुनाई दी। यह उनका राष्ट्र के नाम किया जानेवाला अचानक प्रसारण था, इस सूचना के साथ कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल घोषित कर दिया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आंतरिक अशांति से निबटने के लिए आपातकाल लागू करना आवश्यक था।'' -लालकृष्ण आडवाणी, वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व उपप्रधानमंत्री

(यह वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा 'मेरा देश मेरा जीवन' से लिया गया है। प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का लोकार्पण 25 जून 2015 को भोपाल में श्रीश्री रविशंकर करेंगे)

इटारसी में आरआरआई जलने के कारण बिहार से चलनेवाली 31 ट्रेनों का परिचालन रद्द / 31 TRAINS CANCELLED

 -शीतांशु कुमार सहाय
कुछ दिन पहले इटारसी में आरआरआई के जलने के कारण दिनांक 25, 26, 27 एवं 28 जून, 2015 को पूर्व मध्य रेल से खुलने, गुजरने, पहँुचनेवाली 31 ट्रेनों  का परिचालन रद्द किया गया है। मित्रों यदि आप इन ट्रेनों से यात्रा करनेवाले हैं तो कृपया वैकल्पिक व्यवस्था कर लें और अपना टिकट वापस कर लें।

टिकट की पूरी राशि रेलवे वापस करेगी। रद्द ट्रेनों के विवरण निम्नानुसार हैं -
(क) दिनांक 25.06.2015 को खुलनेवाली ट्रेनों जिनका परिचालन रद्द किया गया है -
1.    दिनांक 25.06.2015 को राजेन्द्रनगर टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 12142 राजेन्द्रनगर-लोकमान्य तिलक टर्मिनल एक्सप्रेस
2.    दिनांक 25.06.2015 को रक्सौल से खुलने वाली गाड़ी सं. 12545 रक्सौल-लोकमान्य तिलक टर्मिनल एक्सप्रेस
3.    दिनांक 25.06.2015 को पटना से खुलने वाली गाड़ी सं. 12792 पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस
4.    दिनांक 25.06.2015 को छत्रपति साहूमहाराज टर्मिनल कोल्हापुर से खुलने वाली गाड़ी सं. 11045 कोल्हापुर-धनबाद एक्सप्रेस
5.    दिनांक 25.06.2015 को सिकंदराबाद से खुलने वाली गाड़ी सं. 12791 सिकंदराबाद-पटना एक्सप्रेस
6.    दिनांक 25.06.2015 को लोकमान्य तिलक टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 15548 लोकमान्य तिलक टर्मिनल-जयनगर एक्सप्रेस
7.    दिनांक 25.06.2015 को पटना से खुलने वाली गाड़ी सं. 22353 पटना-बंगलोर कैंट प्रीमियम एक्सप्रेस

(ख) दिनांक 26.06.2015 को खुलने वाली ट्रेनों जिनका परिचालन रद्द किया गया है -
1.    दिनांक 26.06.2015 को मुजफरपुर से खुलने वाली गाड़ी सं. 11062 मुजफरपुर-लोकमान्य तिलक टर्मिनल पवन एक्सप्रेस
2.    दिनांक 26.06.2015 को राजेन्द्रनगर टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 13201 राजेन्द्रनगर-लोकमान्य तिलक टर्मिनल एक्सप्रेस
3.    दिनांक 26.06.2015 को लोकमान्य तिलक टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 11061 लोकमान्य तिलक टर्मिनल-मुजफरपुर पवन एक्सप्रेस
4.    दिनांक 26.06.2015 को लोकमान्य तिलक टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 12141 लोकमान्य तिलक टर्मिनल-राजेन्द्रनगर टर्मिनल एक्सप्रेस
5.    दिनांक 26.06.2015 को लोकमान्य तिलक टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 13202 लोकमान्य तिलक टर्मिनल-राजेन्द्रनगर टर्मिनल एक्सप्रेस
6.    दिनांक 26.06.2015 को अहमदाबाद से खुलने वाली गाड़ी सं. 15560 अहमदाबाद-दरभंगा एक्सप्रेस
7.    दिनांक 26.06.2015 को दानापुर से खुलने वाली गाड़ी सं. 22351 दानापुर-यशवंतपुर एक्सप्रेस


(ग) दिनांक 27.06.2015 को खुलने वाली ट्रेनों जिनका परिचालन रद्द किया गया है -
1.    दिनांक 27.06.2015 को राजेन्द्रनगर टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 12142 राजेन्द्रनगर-लोकमान्य तिलक टर्मिनल एक्सप्रेस
2.    दिनांक 27.06.2015 को हावड़ा से खुलने वाली गाड़ी सं. 12321 हावड़ा-मुंबई एक्सप्रेस
3.    दिनांक 27.06.2015 को पटना से खुलने वाली गाड़ी सं. 12742 पटना-वास्कोडिगामा एक्सप्रेस
4.    दिनांक 27.06.2015 को रक्सौल से खुलने वाली गाड़ी सं. 15267 रक्सौल-लोकमान्य तिलक टर्मिनल एक्सप्रेस
5.    दिनांक 27.06.2015 को मुंबई से खुलने वाली गाड़ी सं. 12322 मुंबई-हावड़ा एक्सप्रेस
6.    दिनांक 27.06.2015 को लोकमान्य तिलक टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 18610 लोकमान्य तिलक टर्मिनल-राँची एक्सप्रेस
7.    दिनांक 27.06.2015 को सूरत से खुलने वाली गाड़ी सं. 19047 सूरत-भागलपुर एक्सप्रेस

(घ) दिनांक 28.06.2015 को खुलने वाली ट्रेनों जिनका परिचालन रद्द किया गया है -
1.    दिनांक 28.06.2015 को राजेन्द्रनगर टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 12142 राजेन्द्रनगर-लोकमान्य तिलक टर्मिनल एक्सप्रेस
2.    दिनांक 28.06.2015 को पटना से खुलने वाली गाड़ी सं. 12296 पटना-बंगलोर संघमित्रा एक्सप्रेस
3.    दिनांक 28.06.2015 को गया से खुलने वाली गाड़ी सं. 12389 गया-चेन्नई एगमोर एक्सप्रेस
4.    दिनांक 28.06.2015 को पटना से खुलने वाली गाड़ी सं. 12792 पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस
5.    दिनांक 28.06.2015 को राजेन्द्रनगर टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 13201 राजेन्द्रनगर-लोकमान्य तिलक टर्मिनल एक्सप्रेस
6.    दिनांक 28.06.2015 को बंगलोर कैंट से खुलने वाली गाड़ी सं. 22354 बंगलोर कैंट-पटना प्रीमियम एक्सप्रेस
7.    दिनांक 28.06.2015 को लोकमान्य तिलक टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 12141 लोकमान्य तिलक टर्मिनल-राजेन्द्रनगर टर्मिनल एक्सप्रेस
8.    दिनांक 28.06.2015 को बंगलोर से खुलने वाली गाड़ी सं. 12295 बंगलोर-पटना संघमित्रा एक्सप्रेस
9.    दिनांक 28.06.2015 को सिकंदराबाद खुलने वाली गाड़ी सं. 12791 सिकंदराबाद-पटना एक्सप्रेस
10.    दिनांक 28.06.2015 को लोकमान्य तिलक टर्मिनल से खुलने वाली गाड़ी सं. 13202 लोकमान्य तिलक टर्मिनल-राजेन्द्रनगर टर्मिनल एक्सप्रेस।
(http://sheetanshukumarsahaykaamrit.blogspot.in)

मंगलवार, 23 जून 2015

रामायण में वर्णित घटनाएँ सच हैं / Ramayana is real, say experts


-शीतांशु कुमार सहाय
रामायण और महाभारत को कल्पना कहनेवालों की बातों को पहले भी झूठ करार किया जा चुका है। अब एक अनुसन्धान के आधार पर सिद्ध हुआ है कि रामायण में वर्णित घटनाएँ सच हैं। यहाँ मैं अँग्रेजी समाचार पत्र ‘डेक्कन क्रॉनिकल’ के 18 जून 2015 के इंटरनेट संस्करण का यक समाचार मूल रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।
पहले भगवान को नमन कर लूँ-
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।।
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।2।।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।।



New research carried out by anthropological scientists from the Estonian Biocentre and the University of Delhi claims that events of the mythological epic Ramayana occurred in reality thousands of years ago. Hyderabad: New research carried out by anthropological scientists from the Estonian Biocentre and the University of Delhi claims that events of the mythological epic Ramayana occurred in reality thousands of years ago. Scientists say that results of their genetic studies, with existing data, show genetic signatures of tribal groups featured in the Ramayana such as the Gonds, Kols and Bhils. Gonds are  a prominent group in Adilabad district of Telangana.

Researchers claimed that populations in the Indian subcontinent can trace their ancestors to more than 60,000 years back. Scientists say that this is proof of the authenticity and actual occurrence of the events described in Ramayana, which would have occurred more than 12,000 years ago. The Gonds, Kols and Bhils are believed to be the ancient tribal groups of the region and have found mention in the Ramayana. Authenticity of the mythological text has been questioned several times. While there have been voices proclaiming the authenticity of the Ramayana, research to prove it has increased in recent times.

Dr Vadlamudi Raghavendra Rao, professor of anthropology, University of Delhi, and one of the authors of the study, said, “Definitely, the events described in Ramayana occurred in real. Our research has showed close genetic affinity of these tribes to other ethnic groups. We have shown that there is continuity in the populations groups living here.  Other researchers are working to prove other angles of this.”

The study was carried out by Estonian Biocentre researcher Gyaneshwar Chaubey, Institute of Scientific Research on Vedas, Dr Saroj Bala and Dr Raghavendra Rao. The Bhil, Kol and Gond are three major Indian tribes that have been widely acknowledged in the epic Ramayana, particularly in the chapters Ayodhyakanda, Aranyakanda and Kishkindhakanda. Gonds are prominently found in Adilabad district and other states and number about 40 lakh.

The research study says since these tribes are inhabitants of the country since the Stone Age, their genetic affinity to existing populations show the authenticity of the Ramayana. Researchers said these tribal groups form a closed cluster with Dravidian groups, known as inhabitants of South India. 
(from Deccan Chronicle | Amar tejaswi | June 18, 2015, 02.06 am IST) link is--- http://www.deccanchronicle.com/150618/nation-current-affairs/article/ramayana-real-say-experts

रामायण के साक्ष्य

अब मैं उन वर्तमान साक्ष्यों के बारे में बता रहा हूँ जो रामायणकाल की सच्चाई उजागर कर रहे हैं। 

-हनुमान गढ़ी मंदिर में राम भक्त हनुमान ने प्रभु श्रीराम का उस वक्त तक इंतज़ार किया था जब उनका अयोध्या से निर्वासन हो गया था।

-ये जानकी मंदिर है जो कि जनकपुर नेपाल में स्थित है, जानकी माता सीता का ही एक और नाम है।

 









-वनवास काल में प्रभु श्रीराम माता सीता और लक्ष्मण ने पंचवटी में एक झोपड़ी बनायी थी जो कि वर्तमान समय मे नासिक के नजदीक है।

 









-लेपक्षी आंध्र-प्रदेश में स्थित वह स्थान है जहां सीता माता की रक्षा करते समय जटायु रावण के हमले से घायल होकर गिरे थे।

 









-हनुमान जी का ये विशालकाय पदचिह्न श्रीलंका में है।

 












-रामसेतु तैरते पत्थरों का सेतु है जो वानर सेना द्वारा लंका जाने के लिए बनाया गया था। नासा द्वारा समुद्र में खोजा गया रामसेतु ऐसे लोगों की मान्यता को और पुष्ट करता है। रामसेतु जिसे अंग्रेजी में एडम्स ब्रिज भी कहा जाता है, भारत (तमिलनाडु) के दक्षिण पूर्वी तट के किनारे रामेश्वरम द्वीप तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिमी तट पर मन्नार द्वीप के मध्य चूना पत्थर से बनी एक श्रृंखला है। भौगोलिक प्रमाणों से पता चलता है कि किसी समय यह सेतु भारत तथा श्रीलंका को भू-मार्ग से आपस में जोड़ता था। यह पुल करीब 18 मील (30 किलोमीटर) लंबा है। ऐसा माना जाता है कि 15वीं शताब्दी तक पैदल पार करने योग्य था। एक चक्रवात के कारण यह पुल अपने पूर्व स्वरूप में नहीं रहा। रामसेतु एक बार फिर तब सुर्खियों में आया था, जब नासा के उपग्रह द्वारा लिए गए चित्र मीडिया में सुर्खियां बने थे।

-रावण ने शिवजी की घोर तपस्या कर उनसे वरदान पा लिया था, इसलिए रावण ने अपना एक मंदिर बनवाया जो कि पहला ऐसा मंदिर था जो तपस्या करने वाले के लिए बनाया गया था। यह मदिर कोनेस्वरम नाम से जाना जाता है जो श्रीलंका में है।

 




-जब रावण माता सीता को लंका लाया था तब सर्वप्रथम रावण माता को कोतुवा ले गया था जो कि अब सीता कोतुवा नाम से श्रीलंका का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है।

 







-कोतुवा से वह माता को अशोक वाटिका ले गया था, जिसका यथार्थ में नाम अशोकवनम है जो कि श्रीलंका में है।

 









-यह तस्वीर उसानगोड़ा श्रीलंका की है जहां ज़मीन का कुछ हिस्सा काला है जो उस समय हुआ जब हनुमान जी ने लंका में आग लगायी थी, ये भी कहा जाता है कि इस स्थान पर ही रावण का पुष्पक विमान उतरता था।
 







-कहा जाता है कि लंकापति रावण के महल, जिसमें अपनी पटरानी मंदोदरि के साथ निवास करता था, के अब भी अवशेष मौजूद हैं। यह वही महल है, जिसे पवनपुत्र हनुमान ने लंका के साथ जला दिया था। लंका दहन को रावण के विरुद्ध राम की पहली बड़ी रणनीतिक जीत माना जा सकता है क्योंकि महाबली हनुमान के इस कौशल से वहां के सभी निवासी भयभीत होकर कहने लगे कि जब सेवक इतना शक्तिशाली है तो स्वामी कितना ताकतवर होगा। ...और जिस राजा की प्रजा भयभीत हो जाए तो वह आधी लड़ाई तो यूं ही हार जाता है। 

-सुग्रीव अपने भाई बाली से डरकर जिस कंदरा में रहता था, उसे सुग्रीव गुफा के नाम से जाना जाता है। यह ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित थी। ऐसी मान्यता है कि दक्षिण भारत में प्राचीन विजयनगर साम्राज्य के विरुपाक्ष मंदिर से कुछ ही दूर पर स्थित एक पर्वत को ऋष्यमूक कहा जाता था और यही रामायण काल का ऋष्यमूक है। मंदिर के निकट सूर्य और सुग्रीव आदि की मूर्तियां स्थापित हैं। रामायण की एक कहानी के अनुसार वानरराज बाली ने दुंदुभि नामक राक्षस को मारकर उसका शरीर एक योजन दूर फेंक दिया था। हवा में उड़ते हुए दुंदुभि के रक्त की कुछ बूंदें मातंग ऋषि के आश्रम में गिर गईं। ऋषि ने अपने तपोबल से जान लिया कि यह करतूत किसकी है। क्रुद्ध ऋषि ने बाली को शाप दिया कि यदि वह कभी भी ऋष्यमूक पर्वत के एक योजन क्षेत्र में आएगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। यह बात उसके छोटे भाई सुग्रीव को ज्ञात थी और इसी कारण से जब बाली ने उसे प्रताड़ित कर अपने राज्य से निष्कासित किया तो वह इसी पर्वत पर एक कंदरा में अपने मंत्रियों समेत रहने लगा। यहीं उसकी राम और लक्ष्मण से भेंट हुई और बाद में राम ने बाली का वध किया और सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य मिला।

जय श्री राम


रविवार, 21 जून 2015

अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस : विश्वगुरु भारत का आधुनिक अभियान आरम्भ / International Yoga Day : World Teacher India of the Modern Campaign Launched

शीतांशु कुमार सहाय
विश्व ने रविवार 21 जून 2015 को प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया। पूरे विश्व के लोग इस दिन भारतीय योगियों के आदेश पर झुकते रहे, उठक-बैठक करते रहे, हाथ-पैर मोड़ते रहे और अपूर्व शान्ति के लिए सृष्टि के प्रथम अक्षर ‘ऊँ’ का पवित्र उच्चारण कर धरती से अन्तरिक्षपर्यन्त पावनता का वातावरण कायम करते रहे। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, जब विश्वविरादरी एक साथ एक ही कार्य किया हो। ऐसा होने पर भारत की ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ (समूची धरती के लोग परिवार हैं) वाली संस्कृति भी चरितार्थ हुई। इस विश्व कीर्तिमान से हम भले ही प्रसन्न हो जायें और प्रसन्न होने का विषय भी है, पर हमसे अधिक प्रसन्नता उसे है जिसने हमें धरती पर भेजा। जगद्नियन्ता भगवान मनुष्य के इस सामूहिक प्रयास से निश्चित ही बेहद प्रसन्न हैं; क्योंकि ऐसी सकारात्मक सामूहिकता विश्वविरादरी ने इससे पूर्व कभी नहीं दिखायी। 
विश्व को ज्ञान का प्रथम प्रकाश देनेवाला भारत ‘विश्वगुरु’ के रूप में जाना जाता रहा है। अपने उसी रूप को पुनः भारत ने प्रदर्शित किया है, बिना किसी आर्थिक लाभ लिये ही विश्व को योग का अमूल्य उपहार प्रदान किया है। विश्वव्यापी अशान्ति के बीच अमोघ शान्ति का मूलमन्त्र दिया है। शस्त्रास्त्रों की होड़ को समाप्त करने का सूत्र दिया है। पतित होकर गर्त्त में गिर रहे मनुष्य को पावनता के शिखर पर पहुँचने का सोपान उपलब्ध कराया है। रिश्ते-नातों को भूलकर हर किसी से काम-पिपासा को तृप्त करनेवालों को तृप्ति का नया साधन सुलभ कराया है, जहाँ की नैतिकता कभी अनैतिकता का अवलम्बन प्राप्त नहीं करती।

मनुष्य को भगवान बनानेवाले योग के विश्व दिवस के आगाज का समय बड़ा ही पावन है। अभी विश्व में प्रचलित सबसे प्राचीन वैज्ञानिक दिनपत्री (कैलेण्डर) विक्रम सम्वत् के अनुसार 21 जून 2015 को आषाढ़ अधिमास की पंचमी तिथि है। अधिमास को मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं जिस दौरान देवाराधना का विशेष महत्त्व होता है। यों हिजरी सम्वत् 1436 का सबसे पवित्र महीना रमजान चल रहा है और प्रत्येक मुसलमान इस पूरे महीने में (योग के नियमानुसार ही) संयमित-संस्कारित जीवन व्यतीत करते हैं, अल्लाह की उपासना में समय बिताते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि योग दिवस मनाने पर जब संयुक्त राष्ट्रसंघ में मतदान हुआ तो विश्व के 177 देशों ने भारत के इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था जिनमें 47 इस्लामी देश हैं। वैसे भी सनातनी (हिन्दू) से अधिक योग मुसलमान करते हैं जो प्रतिदिन 5 बार वज्रासन में बैठकर अल्लाह की खिदमत करते हैं, नमाज पढ़ते हैं और चरण स्पर्श की मुद्रा में सिर भी झुकाते हैं। इसी तरह भारतीय निर्देशन में अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर विश्व ने असीम शान्ति के लिए परवरदीगार के सामने सिर झुकाया।
भारतीय मनीषियों द्वारा प्रदत्त अमूल्य सांस्कृतिक उपहार योग को आत्मसात् कर विश्व के सभी देश धन्य हो गये! धन्य हैं भारत के वे सभी योगी भी जिन्होंने सभी देशों में जाकर 21 जून 2015 को उन देशों के निवासियों को योग करवाया और इसके मर्म को समझाया। हालाँकि अँग्रजों ने लगभग 200 वर्षों तक भारत को न केवल लूटा; बल्कि इसके तमाम तकनीकों, उत्पादन इकाइयों, राष्ट्रीय व धार्मिक एकता को तहस-नहस किया। यों निर्यातक देश भारत आयातक बन गया। विश्वगुरु भारत दीन-हीन दीखने लगा। पर, अब स्थितियाँ बदल रही हैं, इसमें प्रत्येक भारतीय अपना सहयोग दे तो फिर से भारत विश्वगुरु बन सकता है। वैसे 21 जून 2015 को विश्वविरादरी को योग के भारतीय वरदान से अभिसिक्त कर हमने विश्वगुरु बनने की राह पर एक आधुनिक कदम आगे बढ़ा दिया है। शीघ्र ही हम आयुर्वेद के प्रति भी ऐसा ही करनेवाले हैं और उसके बाद कई और कदम बढ़ाये जायेंगे, बस सरकार के सही कदम का साथ देते जाइये। कई ऐसी बातें हैं जिन्हें बोलकर या लिखकर बताना उचित नहीं, सही समय पर सही व्यावहारिक कदम ही उठाये जायेंगे और यही उचित भी है। मैं 1991 से लगातार योग कर रहा हूँ और औषधिविहीन जीवन जी रहा हूँ। बहुत आवश्यक होने पर ही औषधि का सेवन करता हूँ। ....तो मानिये मेरी सलाह और प्रतिदिन योग करें और योग के पश्चात् श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोक अर्थ सहित अवश्य पढ़ें, शेष कार्य भगवान करते जायेंगे। इति शुभम्!


शुक्रवार, 19 जून 2015

विश्व योग दिवस : काँग्रेस को झटका, योग करते थे नेहरू, मिला शीर्षासन करता चित्र / WORLD YOG DAY : JAWAHARLAL NEHRU WAS FOLLOWER OF YOGA



विश्व योग दिवस (21 जून) के पहले पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की योग करते हुए फोटो सामने आई है। इस फोटो में नेहरू शीर्षासन की मुद्रा में हैं। नेहरू ने इस संबंध में एक किताब में लिखा है कि उन्हें शीर्षासन से फायदा होता है। योग से होने वाले फायदों को लेकर पंडित नेहरू ने लिखा था, ''शीर्षासन के दौरान सिर के बल खड़ा होना होता है।'' एक अंग्रेजी वेबसाइट के मुताबिक नेहरू ने लिखा था, ''इससे नीचे अपनी हथेलियों से सहारा देने के वजह से हाथों और उंगलियों के इंटरलॉक खुलते हैं। मेरा मानना है कि शारीरिक व्यायाम का यह सबसे अच्छा आसन है। मैं इसे पसंद करता हूं। मुझे इससे बहुत फायदा मिला है। योग करने से मेरी मानसिक शक्ति अच्छी होती है और साथ ही दिमाग शांत रहता है जिससे परेशानी के दौर में भी सहनशीलता की शक्ति विकसित होती है।'' योग करते हुए नेहरू की फोटो के सामने आने से बाबा रामदेव के दावे पर मुहर लग गई है। सोमवार 15 जून 2015 को चंडीगढ़ में रामदेव ने कहा था कि पंडित नेहरू और इंदिरा गाँधी भी योग करती थीं। रामदेव ने यह भी कहा था कि सोनिया गाँधी भी योग करती रही हैं लेकिन काँग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी योग से दूर हैं, इसलिए वह सत्ता से दूर हैं। राहुल गाँधी को योग सिखाने के लिए भी रामदेव तैयार थे। रामदेव ने काँग्रेस के नेताओं को नसीहत दी है कि वे योग के कार्यक्रम का राजनीतिक तौर पर तो विरोध कर सकते हैं लेकिन योग का विरोध न करें।
21 जून को जहाँ विश्व योग दिवस यूएन सहित दुनियाभर के तमाम देशों में मनाया जाएगा, वहीं कुछ मुस्लिम संगठन इसके विरोध में हैं। काँग्रेसशासित राज्य भी योग दिवस के विरोध में उतर आए हैं। बुधवार 17 जून 2015  को उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत ने बयान जारी कर कहा कि उत्तराखंड योग दिवस के कार्यक्रम में शामिल नहीं होगा। इसी तरह झारखंड में भी काँग्रेस ने योग दिवस का विरोध करने का फैसला लिया है। विश्व योग दिवस के मौके पर 21 जून को सरकार की तरफ से राजपथ पर हजारों लोग के साथ योग का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सरकार की ओर से काँग्रेस नेताओं को भी आमंत्रण भेजा गया है। हालांकि, अभी तक काँग्रेस के किसी बड़े नेता के ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने की पुष्टि नहीं की गई है। (शीर्षासन में पंडित नेहरू का चित्र 1950 के दशक का है।) VISIT : sheetanshukumarsahaykaamrit.blogspot.com